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Explained: महाराष्ट्र में अब क्या होगी राज्यपाल की भूमिका? फ्लोर टेस्ट कानून पर है हर किसी की नज़र

अब हर किसी की निगाहें महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी पर टिकी हैं (फ़ाइल फोटो)

अब हर किसी की निगाहें महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी पर टिकी हैं (फ़ाइल फोटो)

Maharashtra Political Crisis अब हर किसी की निगाहें महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी पर टिकी हैं. क्या वो विधानसभा को भंग करने का फैसला लेंगे? या फिर पूरा मामला फ्लोर टेस्ट तक पहुंचेगा. आईए विस्तार से राज्यपाल और विधानसभा के स्पीकर के अधिकार को समझते हैं...

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नई दिल्ली. महाराष्ट्र में राजनीतिक घटनाक्रम तेज़ी से बदल रहा है. मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की कुर्सी खतरे में पड़ गई है. शिवसेना के बागी नेता एकनाथ शिंदे ने 40 से ज्यादा विधायकों के समर्थन का दावा किया है. ऐसे में इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि ठाकरे की सरकार अब अल्पमत में आ गई है. लिहाज़ा अब हर किसी की निगाहें महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी पर टिकी हैं. क्या वो विधानसभा को भंग करने का फैसला लेंगे? या फिर पूरा मामला फ्लोर टेस्ट तक पहुंचेगा. आईए इस कानूनी दांव-पेच को विस्तार से समझते हैं.

राज्यपाल के अधिकार को समझने से पहले सबसे पहले जान लेते हैं कि आखिर फ्लोर टेस्ट क्या है. ये एक ऐसी प्रक्रिया होती है, जिससे ये फैसला किया जाता है कि मौजूदा सरकार या मुख्यमंत्री के पास पर्याप्त बहुमत है या नहीं. यहां राज्यपाल किसी भी तरह से कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकते हैं. लेकिन इस मामले में राज्यपाल और विधानसभा स्पीकर के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है.

राज्यपाल कब कर सकते हैं विधानसभा भंग?
संविधान का अनुच्छेद 174 (2) (बी) राज्यपाल को कैबिनेट की सलाह पर विधानसभा को भंग करने का अधिकार देता है. लेकिन राज्यपाल खुद भी इसका इस्तेमाल कर सकते हैं. खास कर तब जबकि उन्हें लगता है कि मौजूदा मुख्यमंत्री के पास विधायकों का समर्थन कम है. जैसा कि इस वक्त उद्धव ठाकरे के साथ देखा जा रहा है.

क्या कहा था सुप्रीम कोर्ट ने?
अनुच्छेद 174 (2) (बी) में भी कई कानूनी दांव पेच हैं. 2020 में भी सुप्रीम कोर्ट ने इसको लेकर कई अहम टिप्पणियां की थीं. ये मामला मध्यप्रदेश विधानसभा और शिवराज सिंह चौहान को लेकर था. सुप्रीम कोर्ट ने स्पीकर के फ्लोर टेस्ट के लिए बुलाने के अधिकार को बरकरार रखा था. कोर्ट ने कहा था कि अगर प्रथम दृष्टया उन्हें लगता है कि सरकार ने अपना बहुमत खो दिया है तो वो फ्लोट टेस्ट के लिए बुला सकते हैं. साथ ही जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और हेमंत गुप्ता की दो-जजों की बेंच ने कहा था, ‘राज्यपाल को फ्लोर टेस्ट का आदेश देने की शक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता है. अगर राज्यपाल को लगता है कि सरकार के पास सदन में संख्या बल कम है तो वो चाहें तो फ्लोट टेस्ट के लिए बुला सकते हैं.’

मध्य प्रदेश में भी ऐसे ही बने थे हालात
अनुच्छेद 175 (2) के तहत राज्यपाल भी सदन को फ्लोर टेस्ट साबित करने के लिए बुला सकते हैं. एक विस्तृत फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल की शक्ति के दायरे और फ्लोर टेस्ट के बारे में बताया था. 2020 में मध्य प्रदेश के राज्यपाल को भी ऐसी ही स्थिति का सामना करना पड़ा था. ज्योतिरादित्य सिंधिया खेमे के विधायक भाजपा में शामिल हो गए थे और तत्कालीन कांग्रेस के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने राज्यपाल से विधानसभा भंग करने के लिए कहा था. राज्यपाल ने इसके बजाय फ्लोर टेस्ट का आह्वान किया.

कौन ले सकता है फ्लोर टेस्ट का फैसला?
कानून ये भी कहता है कि जब सदन का सत्र चल रहा हो तो फिर विधानसभा अध्यक्ष फ्लोर टेस्ट के लिए बुला सकते हैं. लेकिन जब सत्र नहीं चल रहा हो तो अनुच्छेद 163 के तहत राज्यपाल फ्लोर टेस्ट के लिए बुला सकते हैं. याद रहे कि महाराष्ट्र में इस वक्त सत्र नहीं चल रहा है.

विधायकों तक पहुंचने के अधिकार पर भी चर्चा 
2020 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने एक राजनीतिक दल के ‘बंदी’ बनाए गए विधायकों तक पहुंचने के अधिकार पर भी चर्चा की थी. जिन्हें एक रिसॉर्ट में रखा गया था. हालांकि कोर्ट ने इस तरह के अधिकार की अनुमति नहीं दी, लेकिन यह रेखांकित किया कि विधायक “खुद के लिए ये तय करने के हकदार हैं कि क्या उन्हें राज्य में मौजूदा सरकार में विश्वास की कमी होने पर सदन का सदस्य बने रहना चाहिए.’ लेकिन, कोर्ट ने कहा, ये सदन के पटल पर किया जाना है.

Tags: Bhagat Singh Koshyari, Uddhav thackeray

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