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#Mumbai 26/11- ‘थोड़ा बिजी हूं, बाद में फोन करता हूं, फिर कभी उनका कॉल आया ही नहीं'
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Updated: November 24, 2018, 6:08 PM IST
#Mumbai 26/11- ‘थोड़ा बिजी हूं, बाद में फोन करता हूं, फिर कभी उनका कॉल आया ही नहीं'
#Mumbai 26/11- ‘थोड़ा बिजी हूं, बाद में फोन करता हूं, फिर वो कॉल कभी आया ही नहीं

यह दर्दनाक दास्तान है 10 साल से इस दर्द को सीने में रखकर बेटियों के लिए चेहरे पर मुस्कुराहट लिए जिंदगी से दो-दो हाथ कर रही मनीषा चित्ते की.

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  • Last Updated: November 24, 2018, 6:08 PM IST
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मधुरा नेरुरकर

26 नवंबर 2008 की वो काली रात. मनीषा चित्ते अपनी तीन बेटियों के साथ घर पर अकेली थीं. रात के उस पहर में अमूमन पति के घर लौटने का वक्त होता है. तभी अचानक फोन की घंटी बजती है और दूसरी तरफ से एक आवाज सुनाई देती है. 'ड्यूटी खत्म हो गई है. फिर भी साहब के साथ जाना होगा. मुंबई में कुछ गड़बड़ हो गई है. जवाब में मनीषा सिर्फ इतना ही कह सकीं, 'खुद का ख्याल रखना.' मनीषा को फिर वो आवाज दोबारा कभी नहीं सुनाई दी.

यह दर्दनाक दास्तान है 10 साल से इस दर्द को सीने में रखकर बेटियों के लिए चेहरे पर मुस्कुराहट लिए जिंदगी से दो-दो हाथ कर रही मनीषा चित्ते की. मनीषा के पति अरुण मुंबई पुलिस में कांस्टेबल थे और जांबाज अफसर विजय सालस्कर की गाड़ी को चलाने का जिम्मा उनके पास था.

26 नवंबर की उस रात को अरुण चित्ते अपनी ड्यूटी खत्म कर घर लौट रहे थे, तभी उन्हें विजय सालस्कर का फोन आया था. मुंबई पर बड़ा हमला हुआ है और वो खुद ही अपनी गाड़ी लेकर घटनास्थल की तरफ रवाना हुए. अरुण की जगह कोई और होता है तो शायद यह सोचकर घर लौट जाता 'ड्यूटी खत्म हो गई, फिर जाने की क्या जरूरत है.' लेकिन वो किसी और ही मिट्टी के बने हुए थे. घर की तरफ बढ़ते अरुण के कदम थम गए और वो विजय सालस्कर की मदद के लिए दौड़ पड़े. उसी रात मुंबई की सड़कों पर सुरक्षा बंदोबस्त करते हुए अरुण शहीद हो गए.



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उस रात को याद करते हुए मनीषा बताती हैं, 'सालस्कर साहब के साथ जाते हुए उन्होंने मुझे रास्ते से फोन किया था. मुंबई पर आतंकी हमला हुआ है और वह साहब के साथ जा रहे हैं.' मनीषा उनसे खुद का ख्याल रखने के लिए कह रही थी तो दूसरी तरफ पत्नी के साथ बात करते हुए अरुण भीड़ को नियंत्रित कर रहे थे. इसी दौरान अजमल कसाब और अबू इस्माइल ने अंधाधुंध फायरिंग कर दी, जिसमें विजय सालस्कर, अशोक कामटे और हेमंत करकरे शहीद हो गए.

(अपनी बेटियों के साथ मनीषा)


आतंकियों का सामना करते हुए अरुण भी शहीद हो गए और एक रात चार जिंदगियों के सामने ताउम्र का अंधियारा छा गया. 10 साल पहले अरुण की सबसे बड़ी बेटी कोमल की उम्र आठ साल तो दूसरी बेटी स्नेहल की उम्र सात साल थी. उनकी तीसरी बेटी खुशी की उम्र महज चार साल थी. तीनों ही बेटियों को पता था कि उनके पिता देश के लिए शहीद हुए है, लेकिन इसके मायने किसी को भी पता नहीं थे. जिंदगी को समझने के पहले ही उनके सिर से पिता का साया उठ गया था.

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धारावी पुलिस कॉलोनी में तीनों बेटियों के साथ रहने वाली मनीषा बताती हैं, 'उस दिन आधे घंटे के भीतर उन्होंने दो-तीन कॉल किए थे. मेरे मन में ऐसा कुछ होगा इस बात की कल्पना भी नहीं थी. एक पल में हमारी जिंदगी बदल जाएगी. उनके अचानक चले जाने से मैं बेहद निराश हो गई. मुझे इस बात का यकीन ही नहीं हो रहा था कि वो हमारे साथ नहीं है.'

मनीषा ने बताया, 'बेटियों की उम्र काफी कम थी. आगे की जिंदगी अंधकारमय नजर आ रही थी. मुश्किल वक्त में परिजनों मजबूती से साथ में खड़े रहे. उनकी मदद से ही अब तक जिंदगी का सफर तय कर सकी हूं. शुरुआत में उनकी काफी याद आती थी. काफी अकेलापन महसूस होता था. मैं अपने आंसू किसी को दिखा नहीं सकती थी. मैं टूट गई तो बेटियों का क्या होगा. इस बात का ख्याल रखते हुए खुद को हर हालत से लड़ने के लिए तैयार किया.'

10 साल बाद अब बेटियां बड़ी हो गई है. जिंदगी की मुश्किलें कुछ आसान हो गई है, फिर भी कभी कोई ऐसा दिन नहीं जाता है, जब उनकी याद नहीं आती हो. घर में कोई अच्छा पल आता है तब तो उनकी गैरमौजूदगी का अहसास ज्यादा होता है.

दुनिया के लिए मनीषा आज एक शहीद की पत्नी. मुश्किलों से कभी हार न मारने वाली एक महिला और बेटियों के लिए धैर्य रखने के साथ चट्टान की तरह अडिग मां है. लेकिन मुंबई हमले में मनीषा को बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है. उनकी जिंदगी में हुई इस व्यक्तिगत क्षति की कल्पना भी कोई नहीं कर सकता है.

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First published: November 24, 2018, 2:55 PM IST
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