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जानिए, 23 की सुबह के ‘भूले’ अजित पवार 26 की शाम होते-होते कैसे घर लौट आए

News18Hindi
Updated: November 26, 2019, 6:03 PM IST
जानिए, 23 की सुबह के ‘भूले’ अजित पवार 26 की शाम होते-होते कैसे घर लौट आए
अजित पवार की राजनीतिक स्थिति वैसे भी बहुत अच्छी नहीं बताई जाती.

एनसीपी चीफ शरद पवार (Sharad Pawar) ने फिर से जता दिया कि वो चचा हैं और उनके दांव की काट अभी भतीजे अजित पवार (Ajit Pawar) के पास नहीं है.

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  • Last Updated: November 26, 2019, 6:03 PM IST
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नई दिल्ली. सामान्य ज्ञान की किताबों में पढ़ाया जाता है कि चौधरी चरण सिंह (Chaudhary Charan Singh) देश के एकमात्र ऐसे प्रधानमंत्री थे, जिन्हें बतौर पीएम एक दिन भी संसद गए बगैर ही अपना पद छोड़ना पड़ा था. महाराष्ट्र में अजित पवार (Ajit Pawar) के उप मुख्यमंत्री बनने और फिर पद से इस्तीफा देने से एक बार पुरानी बात फिर से ताजा हो गई. हालांकि, चौधरी साहब के पीएम बनने और हटने के बीच कोई साढ़े पांच महीने का वक्त रहा. 1979 में जुलाई से 1980 के शुरुआती दिनों तक चौधरी साहब इस देश के प्रधानमंत्री रहे. कहा जाता है कि वो कांग्रेस की एक राजनीतिक चाल के झांसे में आकर प्रधानमंत्री बनने को तैयार हो गए थे. हालांकि अजित पवार का केस कुछ अलग है.

अजित पवार (Ajit Pawar) खुद महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री रह चुके हैं. वह शरद पवार (Sharad Pawar) के भतीजे के तौर पर जाने जरूर जाते हैं, लेकिन राजनीति में कोई नौसिखिया नहीं है. उनका 3 दशक से ज्यादा का राजनीतिक करियर है. उनके नाम के साथ तमाम उपलब्धियों के अलावा कई घपले-घोटाले भी जुड़े रहे हैं. ये अलग बात है कि इस बार उपमुख्यमंत्री बनने के तुरंत बाद उन्हें सिंचाई घोटाले से क्लीन चिट मिल गई थी. हालांकि उन्हें उपमुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे 79 घंटे ही हुए थे.

अपने मुख्यमंत्री के साथ उन्हें 26-11 यानी मुंबई में आतंकवादी हमले की बरसी के मौके पर शहीद हुए लोगों को श्रद्धांजलि देने जाना था. चर्नी गेट पर आयोजित इस कार्यक्रम में पहली बार मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री को साथ-साथ देखने का लोगों को मौका मिलता. लेकिन चचा पवार और दूसरे घरवालों ने मिलकर कुछ ऐसा चक्र चला कि वह इस कार्यक्रम में नहीं शामिल हो सके. पता चल रहा है कि उसी समय ट्राइडेंट होटल में सुप्रिया सुले और परिवार के दूसरे लोग उन्हें घेरकर बीजेपी का पाला छोड़ एनसीपी में लौटने की शर्तें तय कर रहे थे. इसी दरम्यान सुप्रीम कोर्ट के फैसले से भी लगने लगा कि गेम का रुख कुछ और हो गया है.

शरद पवार ने फिर से जता दिया कि वो चचा हैं और उनके दांव की काट अभी भतीजे अजित पवार के पास नहीं


अजित पवार के बेटे हार चुके हैं चुनाव
राजनीतिक विश्लेषक ये भी कह रहे हैं कि दरअसल अजित पवार को इस बात की चिंता थी कि कहीं उन्हें भी चिदंबरम और इस तरह के दूसरे नेताओं जैसी स्थिति न झेलनी पड़े. महाराष्ट्र की राजनीति के जानकार बताते हैं कि वह पहले भी चाचा से कह चुके थे कि बीजेपी के ही साथ रहना चाहिए. इस दरम्यान जब उन्हें मौका मिला तो वह अकेले ही देवेंद्र फडणवीस के साथ हो लिए. अजित पवार की राजनीतिक स्थिति वैसे भी बहुत अच्छी नहीं बताई जाती है. उनके बेटे पार्थ भी चुनाव हार चुके हैं.

शरद पवार का स्टंट मान रहे हैं कुछ विश्लेषक
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कुछ विश्लेषक इसे भी शरद पवार की राजनीतिक कुव्वत के तौर पर देख रहे हैं कि उन्होंने बेटी सुप्रिया सुले का राजनीतिक पथ साफ सुथरा रखने के लिए कांटे राह से किनारे किए हैं. माना जा रहा था कि अपनी स्थिति का फायदा उठाकर अजित पवार एक तरह से शरद पवार के राजनीतिक उत्तराधिकारी होने की भी कोशिश करते रहे हैं. जबकि सुप्रिया भी राजनीति में हैं और शरद पवार चाहते हैं कि बेटी ही उनकी राजनीतिक विरासत को आगे ले जाए.



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First published: November 26, 2019, 4:16 PM IST
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