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ANALYSIS: द विंची कोड- क्या उद्धव की शपथ में छिपा है वो गहरा रहस्य?

Afsar Ahmad | News18Hindi
Updated: November 28, 2019, 1:22 PM IST
ANALYSIS: द विंची कोड- क्या उद्धव की शपथ में छिपा है वो गहरा रहस्य?
उद्धव ठाकरे आज महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद की शपथ तो ले रहे हैं लेकिन इसमें एक गहरा रहस्य छिपा हुआ है. (News18 Creative)

आज शाम शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे (Shiv Sena Chief Udhav Thackeray) महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं. यह वाक्य सीधा, सरल और स्पष्ट है. आप कह सकते हैं, हां. तो इसमें अजीब क्या है. सब कुछ तो साफ है. हां, यह सच भी है. सब कुछ साफ है, लेकिन इतना भी नहीं.

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  • Last Updated: November 28, 2019, 1:22 PM IST
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नई दिल्ली. आज शाम शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं. ये वाक्य सीधा, सरल और स्पष्ट है. आप कह सकते हैं, हां, तो इसमें अजीब क्या है. सब कुछ तो साफ है. हां, यह सच भी है. सब कुछ साफ है लेकिन इतना भी नहीं. आज का दिन एक बड़ा राजनीतिक रहस्य अपने अंदर समेटे हुए है, जिसे अभी भी कई राजनीतिक पंडितों के लिए समझना मुश्किल हो रहा है और वो रहस्य है- LOCAL.

दरअसल, देश में बीते चार दशकों से एक राजनीतिक घर्षण चल रहा है. वो है- क्षेत्रीय बनाम राष्ट्रीय. इसकी खूबी यह है कि ये कभी लाभ के लिए एक दूसरे के खिलाफ होते हैं तो कभी एक दूसरे के साथ. कमोबेश यही नजारा पूरे भारत में लंबे वक्त से नजर आ रहा है. राष्ट्रीय पार्टियां जैसे बीजेपी और कांग्रेस हमेशा से चाहती रही हैं कि क्षेत्रीय पार्टियां या तो उनमें समा जाएं या फिर उनका हिस्सा बन जाएं. राष्ट्रीय पार्टियों के लिए क्षेत्रीय पार्टियों का अस्तित्व अस्वीकार्य है और यही सच है.

स्वीकारना पड़ रहा है क्षेत्रीय पार्टियों का अस्तित्व
याद करिए कांग्रेस का दो दशक पहले का पचमढ़ी सम्मेलन. कांग्रेस का तब मूल मंत्र बना था क्षेत्रीय पार्टियों का सहारा कम करते जाना और अपना विस्तार करना. हकीकत यह है कि कांग्रेस ने लंबे वक्त तक इस नीति पर चलने की कोशिश भी की लेकिन दरकते जनाधार ने उसे समझा दिया कि इस देश में यह राजनीतिक मृग मरीचिका से कम नहीं है. आज कांग्रेस का उद्धव के साथ कंधे से कंधा मिलाना इसी बात का प्रमाण है, वो मान चुके हैं लेफ्ट हो या राइट, सरकार जिसकी बने सिकंदर वही है. यानी क्षेत्रीय पार्टियों का अस्तित्व उन्हें हाल के कुछ दिनों में शिद्दत से स्वीकारना पड़ा है.

अपने ही सहयोगी बीजेपी से रूठे हुए हैं
अब जरा बीजेपी की नीति पर गौर करिए. कभी अस्सी के दशक में सिर्फ दो सांसदों वाली बीजेपी जब तक सदन में पूर्ण बहुमत में नहीं आई थी, तब तक एक के बाद एक क्षेत्रीय पार्टियों से तालमेल करती रही, लेकिन जैसे ही उसे लगा कि अकेले चलना संभव है, उसने साथियों के प्रति उदासीन रवैया अपनाना शुरू कर दिया. एनडीए के अंदर ही उसके कई क्षेत्रीय घटक दल अब उससे रूठे हुए हैं.

Narendra Modi And Rahul Gandhi
राष्ट्रीय पार्टियों खासकर कांग्रेस और बीजेपी की कोशिश क्षेत्रीय दलों को अपने में समा लेने की रही है. (नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी की फाइल फोटो)

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क्षेत्रीय दलों और नेताओं से मिल रही बीजेपी को टक्कर
सवाल यह है कि यह बीजेपी की सत्ता की खनक है या फिर उसकी नीतिगत मजबूरी, क्योंकि अब वो कांग्रेस की देशभर में जमीन घेर चुकी है या फिर उसके मुकाबले मजबूती से खड़ी है, तो फिर आगे क्या? यकीनन उसे सीधी टक्कर अब दिल्ली में केजरीवाल और पश्चिम बंगाल में ममता से मिल रही है. वह नहीं चाहती कि उसके सहयोगियों के पास भी ज्यादा राजनीतिक जमीन रहे. आप इसे बीजेपी की साजिश नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय पार्टी की स्वाभाविक जरूरत कह सकते हैं.

'सीएम का पद इस पूरी बिसात का एक मोहरा भर था'
यही कारण है कि बीते तीन दशक से जिस महाराष्ट्र में शिवसेना और बीजेपी का याराना पूरे देश में माना जाता था, वहां बीजेपी मुश्किल से हासिल हुई बड़े भाई की भूमिका को कतई नहीं छोड़ना चाहती थी. वहीं, शिवसेना समझ चुकी थी कि छोटा भाई बनना यानी धीरे-धीरे अपनी राजनीतिक जमीन छोड़ना, जो सीधे उसके अस्तित्व के लिए संकट था. सीएम का पद दरअसल इस पूरी बिसात का एक बड़ा मोहरा भर था.

उलझन वही है कि महत्वाकांक्षाएं सिर्फ राष्ट्रीय ही नहीं हैं, क्षेत्रीय भी हैं. जब तक राष्ट्रीय पार्टियां क्षेत्रीय उम्मीदों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने में इसी तरह नाकामयाब होती रहेंगी तब तक उद्धव, केजरीवाल और ममता जैसे दिग्गज उभर कर आते रहेंगे और उन्हें अपनी जिम्मेदारियों का अहसास कराते रहेंगे. यही कई तहों में छिपा सच है.


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First published: November 28, 2019, 12:45 PM IST
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