मुंबई में बाढ़: अनहोनी नहीं हुई है, ये तो सबक लेने का एक और मौका है

मुंबई के जल ग्रहण क्षेत्र से बाढ़ का पानी निकालने में इस मीठी नदी की बड़ी भूमिका रही. इस नदी के उद्गम यानी झील की हालत भी वैसी नहीं बची जैसी कुछ साल पहले तक थी. मीठी के अलावा छोटी छोटी छह और बरसाती नदियां या बरसाती नाले भी आकार में सिकुड़ते ही चले गए.

Sudhir Jain | News18Hindi
Updated: July 4, 2019, 9:28 AM IST
मुंबई में बाढ़: अनहोनी नहीं हुई है, ये तो सबक लेने का एक और मौका है
सामान्य बारिश के दिनों में भी मुंबई की जल निकासी व्यवस्था ध्वस्त हो जाती है. मुंबई ही क्यों चेन्नई दिल्ली जैसे दूसरे महानगर भी इसकी चपेट में हैं.
Sudhir Jain
Sudhir Jain | News18Hindi
Updated: July 4, 2019, 9:28 AM IST
मुंबई में बाढ़ की खबरें ऐसे लिखी जा रही है जैसे अनहोनी हो गई हो. इन्हीं खबरों में इस हादसे का आगा-पीछा भी है. मसलन ऐसी ही बारिश 2005 में भी हुई थी. उससे तीन दशक पहले 1974 में भी ऐसा ही ताबड़तोड़ पानी बरस गया था. आज जैसी स्थिति तब भी बनी थी. अगर ऐसा कई बार हो चुका है तो यह अनहोनी कहां हुई? ये अलग बात है कि सामान्य बारिश के दिनों में भी मुंबई की जल निकासी व्यवस्था ध्वस्त हो जाती है. मुंबई ही क्यों चेन्नई दिल्ली जैसे दूसरे महानगर भी इसकी चपेट में हैं. यानी ये बेकार की बात है कि मुंबई किसी कुदरती कहर का शिकार हो गई. जितने तथ्य उपलब्ध हैं उनसे साबित होता है कि हमारे महानगर नगर नियोजन और लचर जल प्रबंधन के शिकार हैं.

क्या सबक लिया चेन्नई से
तीन साल पहले चेन्नई की बाढ़ के समय जलविज्ञानियों ने साफ कहा था कि चेन्नई दूसरे महानगरों के लिए भी सबक है. वैसे यह सबक सन् 2005 में मुंबई की बाढ़ से ही मिल चुका था. तब बाढ़ नियंत्रण के जो काम सोचे गए थे और शुरू हुए थे उनका आखिर क्या हुआ? मुंबई का मौजूदा हादसा यह सवाल पूछने का सबसे सही मौका है. एक बार फिर दोहराने की जरूरत है कि चेन्नई की बाढ़ के बाद जलविज्ञानियों ने साफ तौर पर आगाह किया था कि अगर चेन्नई से सबक न लिया तो दूसरे महानगर भी ऐसे ही संकट भुगतने को मजबूर होंगे. यानी सरकार या नगर नियोजकों को मुंबई की बाढ़ प्रवणता का अच्छी तरह से पता था. मुंबई में जो हुआ वह अचानक कतई नहीं है. और इसीलिए देश की आर्थिक राजधानी में जल निकासी की समस्या को लेकर अफसरों और नीतिकारों को शर्मिंदगी उठानी पड़ रही है.

आसमानी या सुल्तानी जैसी बातें ठीक नहीं

सुल्तानी कोताही छिपाने के लिए किसी समस्या को आसमानी या कुदरती बता देना आसान होता है. मुंबई में जल निकासी की बदइंतजामी का ठीकरा भी कुदरत पर फोड़ने की कोशिश हुई. प्रबंधन की पोल खुलने के बाद कहा गया कि पृथ्वी पर जलवायु परिवर्तन के कारण ऐसा हो रहा है. ऐसे अफसरों से पूछा जाना चाहिए कि 1975 और 2005 में मुंबई पर बारिश का कहर भी क्या जलवायु परिवर्तन से ही बरपा था. और अगर जलवायु परिवर्तन के सिर ही ठीकरा फोड़ना है तो नगर नियोजन और बाढ़ नियंत्रण के काम पर लगे हजारों अफसरों और पेशेवरों को अपना काम छोड़कर जलवायु परिवर्तन रोकने के सुझाव देने में ही लग जाना चाहिए. वैसे पिछले एक दशक में कुदरती कहर से बचाव और राहत के लिए आपदा प्रबंधन की व्यवस्था यूं ही नहीं बनाई गई है. देश के लगभग सभी राज्यों में बाढ़ नियंत्रण पर हर साल बीसियों हजार करोड़ रूपए खर्च हो रहे हैं.

क्या सुझाए गए हैं उपाय
फौरी उपाय सुझाने वालों की फेहरिस्त बहुत लंबी है. फौरी उपायों का इतिहास भी लंबा है. सन 1860 में अंग्रेजों ने भी मुंबई की इस समस्या के समाधान के एक परियोजना पर काम हुआ था. लेकिन 160 साल पहले की यह परियोजना उस वक्त की सीमित जरूरत के लिहाज से थी. यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि 1860 में मुंबई की क्या तो आबादी रही होगी और कितने छोटे से इलाके में बसावट होगी. फिर भी यह तो पता चलता ही है कि तब मुंबई के पास उस वक्त की जरूरतों के लिहाज से अपनी भरी पूरी जल निकासी प्रणाली बन चुकी थी.
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मुंबई के जीवन से छोटी छोटी कई बरसाती नदियां या बरसाती नाले भी जुड़े थे. अवशेष के तौर पर कई झीलें और तालाब आज भी वजूद में हैं. मसलन, मुंबई के नक्शे में अठारह किलोमीटर लंबी मीठी नदी आज भी बाकायदा नदी के तौर पर दर्ज है. भले ही आज वह एक गंदे नाले में तब्दील होती जा रही हो, और उसका पाट छोटा होता जा रहा हो, लेकिन इतिहास खंगालेंगे तो उसकी हैसियत एक नदी जैसी ही निकलेगी अठारह किलोमीटर लंबी यह नदी मुबंई की ही विहार और पवई झीलों के पानी से बनती है. और यह नदी मुंबई की ही सीमा के फौरन बाद अरब सागर में मिल जाती है.

मीठी नदी की भूमिका का आकलन
मुंबई के जल ग्रहण क्षेत्र से बाढ़ का पानी निकालने में इस मीठी नदी की बड़ी भूमिका रही. इस नदी के उद्गम यानी झील की हालत भी वैसी नहीं बची जैसी कुछ साल पहले तक थी. मीठी के अलावा छोटी छोटी छह और बरसाती नदियां या बरसाती नाले भी आकार में सिकुड़ते ही चले गए. इन सबका काम अपने जल ग्रहण क्षेत्र के पानी की निकासी करना ही था. अभिलेखागार में झाकेंगे तो पता चलेगा कि इन्ही बरसाती नदी नालों को ही मुंबई की जल निकासी प्रणाली माना जाता था. लेकिन मुंबई में अंधाधुंध इमारती फैलाव इस प्रणाली को लीलता चला गया. इसके अलावा क्या कोई और चारा हो सकता है कि मुंबई को एक सक्षम जल निकासी प्रणाली चाहिए.

कैसी प्रणाली?

जल निकासी प्रणालियों के एक से एक बढ़िया डिजाइन आज दुनिया में मौजूद हैं. लेकिन देखना ये पड़ेगा कि अपने देश के महानगरों के लिए वे कितने कारगर हो सकते हैं.
प्रबंधन प्रौद्योगिकी के विशेषज्ञ जब जल विज्ञानियों के साथ बैठेंगे तो उन्हें यह पता चलेगा कि देश के महानगर की जितनी बड़ी समस्या बाढ़ या जल निकासी की है उतनी ही बड़ी समस्या पानी की कमी और सूखे की भी है. कोई महानगर या नगर या कस्बा नहीं बचा जहां गर्मियों के महीनों में पानी के लिए हाहाकार न बढ़ता जा रहा हो. सो बारिश का पानी रोककर रखना भी उतना ही जरूरी है.

समुद्र के किनारे बसे मुंबई, महाराष्ट्र के बहुत बड़े हिस्से में पीने लायक साफ पानी की समस्या उतनी बड़ी ही है जितनी बड़ी मुसीबत देश के भौगोलिक केंद्र में बसा बुंदेलखंड इस समय झेल रहा है. सो ऐसी प्रणाली चाहिए जिसमें बाढ़ और सूखे दोनों समस्याओं के एकसाथ समाधान की गारंटी हो.


बाढ़ का समाधान सूखे से छुटकार भी है

किसी भी किस्म के विशेषज्ञ हों अगर वे मुंबई में बाढ़ या जल निकासी की समस्या का समाधान ढूंढने निकलेंगे तो यही बताएंगे कि मुंबई के जल ग्रहण क्षेत्र में बरसे पानी को मुंबई में ही रोककर रखने का इंतजाम किए बगैर गुजारा नहीं हो सकता. आखिर मुंबई को गर्मियों और सर्दियों के लिए पर्याप्त पानी का इंतजाम भी तो चाहिए. गौरतलब है कि देश के 20 से ज्यादा शहरों पर पानी की कमी का संकट भी मंडरा रहा है. नीति आयोग बता चुका है कि इन शहरों का भूजल लगभग खत्म होने को है. सब जानते हैं कि भूजल का स्तर बनाए रखने के लिए बारिश का पानी ही रिस कर जमीन में जाता है. अगर जलाशयों बांधों में पानी रोककर रखा जाता है तो वह भूजल को भी रिचार्ज करता है और गर्मियों सर्दियों में काम आता है. नए जलाशयों की जरूरत है ही. जल भंडारण के लिए जलाशयों का इंतजाम बढ़ाने का एक मतलब शहरों में भूजल का पुर्नभंडारण करना भी है.

मुंबई की बाढ़ से फौरी सबक
मुंबई में बाढ़ ने दो सबक दिए हैं. पहला कि मुंबई को अपनी ज़मीन पर गिरे पानी को सुरक्षित ढंग से रोककर रखने के लिए एक सुरक्षित भंडारण व्यवस्था चाहिए. इसके लिए उसे मुंबई में ही हजारों हैक्टेअर जमीन जलाशय बनाने के लिए चाहिए. दूसरा काम उससे भी बड़ा है. वह ये कि विरासतन मुंबई के पास जितने तालाब या झीलें थीं उन सभी का पता लगाया जाए. उनके डूब क्षेत्र में अगर इमारतें या बाजार बन गए हों तो उसका पूरा दस्तावेजीकरण हो. उस जगह फिर से झीलें या तालाब बनाने के सिवाय और कोई तरीका फिलहाल तो नहीं सूझता. अव्वल तो नए जलाशय और पुरानी झीलों और तालाब बाढ़ का पूरा पानी रोककर रख सकते हैं. और अगर कभी इससे ज्यादा पानी बरस गया तो मीठी और दूसरी बरसाती नदियां आसानी से उस पानी को अरब सागर में छोड़ आया करेंगी.

बुंदेलखंड में चंदेलों की राजधानी में जल प्रबंधन की यही व्यवस्था थी. लगातार तीन साल तक मौसमी सूखा पड़ने पर भी चंदेलों की राजधानी निश्चिंत थी और किसी साल तीन साल जितनी बारिश होने पर भी राजधानी बाढ़ को लेकर निश्चिंत थी. जिस भी सरकार या जिस भी योजनाकार या जिस भी विशेषज्ञ को देश की आर्थिक राजधानी को बचाने की चिंता हो उसे नौंवी सदी के चंदेल शासकों के जलप्रबंधन पर एक नज़र डाल लेनी चाहिए. उनके जल प्रबंधक के दुर्लभ उदाहरण पुरातात्विक विरासत के तौर पर चंदेलों की राजधानी महोबा में आज भी मौजूद हैं.

फौरन करने को क्या काम है हमारे पास
अगर मुंबई में बाढ़ हमें वाकई चिंतित कर रही है तो हमें मुंबई की पारंपरिक जल निकासी प्रणाली के दस्वावेज ढूंढने पर लग जाना चाहिए. अभिलेखागारों में कई झीलें और तालाबों के ब्योरे दर्ज मिलेंगे. भले ही इनके डूब क्षेत्र और जल ग्रहण क्षेत्र के आंकड़े खुर्दबुर्द किए जा चुके हों लेकिन जांच पड़ताल से सब पता चल सकता है. पता चलेगा कि बीसियों झीलें और तालाब विकास की भेंट चढ़ गए.

विहार, पवई, बांद्रा तलाव, पाली, उपवन, तानसा और तुलसी जैसी झीलें और तालाब आज भी वजूद में हैं. कई झीलें बांध में तब्दील होकर मुंबई में जल आपूर्ति कर रही हैं. लेकिन पक्के तौर पर यह नहीं पता है कि मूल दस्तावेजों में इन जल निकायों का वास्वतिक जल ग्रहण क्षेत्र और डूब क्षेत्र कितना था? यानी यह नहीं पता कि इन झील तालाबों का हिस्सा विकास की वासना की भेंट चढ़ गया. और उन बैशकीमती धरोहर की मूल आकार में वापसी कैसे संभव है. कुछ करने के पहले संसाधनों का भी प्रबंध सोचना पड़ता है. जल प्रबंधन के लिए सबसे बड़ा संसाधन भूमि को ही माना जाता है.

(लेखक जल से जुड़े मामलों के विशेषज्ञ हैं)

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First published: July 3, 2019, 7:40 PM IST
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