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ANALYSIS: बहुत ताकतवर होना ही बन गया महाराष्‍ट्र में BJP की कमजोरी

Piyush Babele | News18Hindi
Updated: November 11, 2019, 2:23 PM IST
ANALYSIS: बहुत ताकतवर होना ही बन गया महाराष्‍ट्र में BJP की कमजोरी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और महाराष्ट्र सीएम देवेंद्र फडणवीस (फाइल फोटो)

महाराष्ट्र में जब एनडीए यानी बीजेपी-शिवसेना को क्रमश: 105 और 56 सीटें मिल गई और दोनों का जोड़ा बहुमत के आंकड़े 145 से अच्‍छा खासा ऊपर हो गया, तो साफ था कि यहां NDA की सरकार बनेगी. लेकिन इस साफ स्थिति के बाद चीजें धुंधली होने लगीं.

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  • Last Updated: November 11, 2019, 2:23 PM IST
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नई दिल्ली. पिछले दिनों जब महाराष्‍ट्र (Maharashtra) और हरियाणा (Haryana) में विधानसभा चुनाव (Assembly Elections) के नतीजे आ रहे थे, तो सबकी निगाहें महाराष्‍ट्र से ज्‍यादा हरियाणा पर थीं. वजह साफ थी कि हरियाणा विधानसभा त्रिशंकु गति की तरफ जा रही थी, वहीं महाराष्‍ट्र का जनादेश एकदम साफ था. यहां दो गठबंधनों के बीच मुकाबला था. एक तरफ सत्‍ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) और शिवसेना (Shiv Sena) थी, तो दूसरी तरफ कांग्रेस (Congress) और राष्‍ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) थी.

दोनों तरफ के दलों में न सिर्फ स्‍पष्‍ट गठबंधन था, बल्कि उनकी विचारधाराएं भी लगभग एक जैसी थीं. बीजेपी और शिवसेना को विचार के स्‍तर पर हिंदुत्‍व जोड़ता है, जबकि कांग्रेस और एनसीपी की विचारधारा असल में कांग्रेस की ही विचारधारा है. ऐसे में जब एनडीए यानी बीजेपी-शिवसेना को क्रमश: 105 और 56 सीटें मिल गई और दोनों का जोड़ा बहुमत के आंकड़े 145 से अच्‍छा खासा ऊपर हो गया, तो साफ था कि यहां एनडीए की सरकार बनेगी. लेकिन इस साफ स्थिति के बाद चीजें धुंधली होने लगीं.

नतीजों के बाद शिवसेना इस बात पर अड़ गई कि मुख्‍यमंत्री उसी का बनेगा. इसके अलावा यह बात भी आने लगी कि दोनों पार्टियां ढाई-ढाई साल तक अपना मुख्‍यमंत्री बना ले. यह वही प्रयोग था जो कभी उत्‍तर प्रदेश में बीजेपी और बहुजन समाज पार्टी की सरकार बनने के समय हुआ था. हालांकि इस प्रयोग का अंत उसी तरह की तिकड़मों और राजनीतिक पतन के साथ हुआ था, जिस तरह का पतन सिद्धांतविहीन गठबंधनों का अक्‍सर होता है.

बीजेपी और शिवसेना एक दूसरे के आगे झुकने को तैयार नहीं. (फाइल फोटो)


बीजेपी से आधी सीट पाने के बाद शिवसेना ने क्यों मांगा CM पद?
यहां सवाल यह है कि बीजेपी से करीब आधी सीटें पाने के बावजूद आखिर शिवसेना मुख्‍यमंत्री पद की मांग क्‍यों कर रही थी! वह भी ऐसे समय में जब पिछली सरकार में गठबंधन की तरफ से बीजेपी का ही मुख्‍यमंत्री रहा हो. यहां कोई कर्नाटक जैसी स्थिति भी नहीं थी कि जहां कांग्रेस, बीजेपी और जेडीएस अलग-अलग लड़े हों और बाद में बीजेपी को सत्‍ता में जाने से रोकने के लिए कांग्रेस ने खुद से आधी सीटों वाली जेडीएस से मुख्‍यमंत्री स्‍वीकार किया हो.

शिवसेना की समस्‍या दूसरी है. शिवसेना और बीजेपी का गठबंधन उस जमाने से है जब दोनों ही पार्टियों की न सिर्फ राष्‍ट्रीय फलक पर बल्कि महाराष्‍ट्र की राजनीति में कोई खास हैसियत नहीं थी. उस समय शिवसेना के संस्‍थापक बाल ठाकरे ही गैर-कांग्रेसवाद का चेहरा थे. वे हिंदुत्‍व और मराठी मानुष दोनों को एक साथ लेकर राजनीति कर रहे थे. उस जमाने की बीजेपी ने ठाकरे की बनाई जमीन पर ही अपनी राजनीति शुरू की और शिवसेना की सहयोगी के तौर पर महाराष्‍ट्र में पांव जमाए.
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बीजेपी में नरेंद्र मोदी युग शुरू होने के बाद काफी कुछ बदला है. (फाइल फोटो)


बीजेपी में नरेंद्र मोदी युग आने के बाद बदलीं स्थितियां
जब दोनों पार्टियों का कद बढ़ा, तो शिवसेना को बड़े भाई की भूमिका मिली और मुख्‍यमंत्री उसी पार्टी का बना. शिवसेना बीजेपी को छोटा भाई या पिछलग्‍गू ही समझती रही. लेकिन बीजेपी की राजनीति में नरेंद्र मोदी युग शुरू होने के बाद स्थितियां बदलने लगीं. नरेंद्र मोदी एक ऐसी राष्‍ट्रीय ताकत के तौर पर उभरे, जिन्‍होंने न सिर्फ बीजेपी विरोधी दलों की जमीन खिसका दी, बल्कि बीजेपी के सहयोगियों की जमीन भी सिकोड़ दी. राजनीति का प्रवाह कुछ ऐसा हुआ कि जो दल कभी अपने जन्‍म के समय बीजेपी के सहयोग से आगे बढ़े थे, उनका मुकाबला भी सीधे बीजेपी से हो गया.

जैसे ओडिसा में पिछले 20 साल से सत्‍तारूढ़ नवीन पटनायक का बीजू जनता दल (BJD) कभी बीजेपी का सहयोगी हुआ करता था, लेकिन आज दोनों आपने सामने हैं. पश्चिम बंगाल की मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी कभी अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री थीं, लेकिन आज बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के बीच सीधा और जबरदस्‍त मुकाबला है. पंजाब में बीजेपी और अकाली दल का रिश्‍ता चल रहा है, लेकिन इसकी गर्माहट भी अब पहले जैसी नहीं रह गई. बिहार में नीतीश कुमार बीजेपी के पुराने साथी हैं, लेकिन बीच में वे बीजेपी से खिलाफ हुए और इस समय फिर साथ हैं. लेकिन बीजेपी और जेडीयू के रिश्‍ते सहज नहीं कहे जा सकते.

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संजय राउत और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे (फाइल फोटो)


बीजेपी के सहयोगियों में वोट बैंक जाने का भय
इन सब नजीरों का क्‍या मतलब है. मतलब यह है कि बीजेपी जब तक उत्‍तर भारत की पार्टी थी और तकरीबन हर राज्‍य में गठबंधन के सहारे आगे बढ़ती थी तब तक इन क्षेत्रीय दलों के हित बीजेपी के साथ थे. लेकिन अब बीजेपी इतनी बड़ी पार्टी हो गई कि वह अपने दम पर कहीं भी सरकार बनाने की बात सोचती है. उसका बढ़ता हुआ वोट बैंक अपने सहयोगियों के वोट बैंक को भी निगलता जा रहा है. शिवसेना इसी बात से डरी है. शिवसेना को डर है कि अभी वह बड़े भाई से छोटे भाई की भूमिका में आई है. बहुत संभव है कि बीजेपी के तेज प्रवाह में अगले चुनाव तक उसका कुछ और वोट बैंक बह जाए और तब बीजेपी को उसके सहयोग की सिर्फ सांकेतिक जरूरत रह जाए.

जो डर शिवसेना का है, वहीं डर महाराष्‍ट्र में एनसीपी और कांग्रेस का है. इस लोकसभा चुनाव से पहले बड़े पैमाने पर कांग्रेस और एनसीपी के नेता बीजेपी में शामिल हुए थे. जिस गति से कांग्रेस और एनसीपी के विधायक बीजेपी में शामिल हुए थे, उससे लगता था कि ये दोनों पार्टियां इस चुनाव में बुरी तरह ढेर हो जाएंगी. चुनाव के ठीक पहले जिस तरह शरद पवार को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच का सामना करना पड़ा, उससे भी लगा कि अब शरद पवार ढह जाएंगे. लेकिन उन्‍होंने बरसते पानी में न सिर्फ चुनावी सभाएं कीं, बल्कि ईडी को चुनौती भी दी. एक तरह से उन्‍होंने ही एनसीपी के साथ कांग्रेस को भी चुनाव लड़वाया. इस तरह कांग्रेस-एनसीपी की सीटें 90 का आंकड़ा पार कर सकीं.

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देवेंद्र फडणवीस फिलहाल महाराष्ट्र के कार्यवाहक मुख्यमंत्री हैं. (फाइल फोटो)


बहुत ताकतवर हो जाना मुसीबत बन जाता है
बीजेपी की इस जबरदस्‍त ताकत ने शिवसेना को डरा दिया. साथ ही एनसीपी और कांग्रेस भी डर गए. संयोग से अंकों का गणित ऐसा आ गया जो जनादेश की एक ऐसी व्‍याख्‍या करा सकता है, जो जनता के मन में था ही नहीं. भारी भरकम बीजेपी इन तीनों दलों को निगल न जाए, इसलिए ये दल साथ आने के मुहाने पर आ गए हैं.

किसी राजनीतिक दल का बहुत ताकतवर हो जाना भी उसके लिए मुसीबत बन जाता है. बीजेपी के साथ यही हो रहा है. पंडित नेहरू और इंदिरा गांधी के जमाने में कांग्रेस के साथ भी ऐसा ही होता था. इन दलों के इतने बड़े आकार और कद्दावर नेताओं के कारण विरोधी अपनी विचारधारों को ताक पर रखकर एक साथ आ जाते हैं. जाहिर है यह साथ लंबा नहीं चलता, लेकिन ऐन वक्‍त पर शेर का शिकार करने के काम तो आ ही जाता है.

 

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First published: November 11, 2019, 2:16 PM IST
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