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भीमा कोरेगांव मामला: पुणे कोर्ट ने खारिज की 6 आरोपियों की जमानत अर्जी

News18Hindi
Updated: November 6, 2019, 4:44 PM IST
भीमा कोरेगांव मामला: पुणे कोर्ट ने खारिज की 6 आरोपियों की जमानत अर्जी
इसी मामले में सुधा भारद्वाज, वर्नोन गोंसाल्वेस और अरुण फरेरा की जमानत याचिका को बॉम्बे हाईकोर्ट ने पहले ही खारिज कर दिया था.

बता दें इसी मामले में सुधा भारद्वाज, वर्नोन गोंसाल्वेस और अरुण फरेरा की जमानत याचिका को बॉम्बे हाईकोर्ट (Bombay HC) ने पहले ही खारिज कर दिया था.

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  • Last Updated: November 6, 2019, 4:44 PM IST
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पुणे. पुणे सेशंस कोर्ट (Pune Sessions Court) ने बुधवार को 6 आरोपियों की जमानत अर्जी (Bail Application) खारिज कर दी. जिनके नाम रोना विल्सन, शोमा सेन, सुरेंद्र गडलिंग, महेश राउत, वरवारा राव और सुधीर धवले हैं. बता दें इसी मामले में सुधा भारद्वाज, वर्नोन गोंसाल्वेस और अरुण फरेरा की जमानत याचिका को बॉम्बे हाईकोर्ट (Bombay HC) ने पहले ही खारिज कर दिया था.




क्या थी भीमा-कोरेगांव हिंसा?
भीम-कोरेगांव महाराष्ट्र के पुणे जिले में है. इस छोटे से गांव से मराठा का इतिहास जुड़ा है. 200 साल पहले यानी 1 जनवरी, 1818 को ईस्ट इंडिया कपंनी की सेना ने पेशवा की बड़ी सेना को कोरेगांव में हरा दिया था. पेशवा की सेना का नेतृत्व बाजीराव II कर रहे थे. बाद में इस लड़ाई को दलितों के इतिहास में एक खास जगह मिल गई. बीआर आंबेडकर को फॉलो करने वाले दलित इस लड़ाई को राष्ट्रवाद बनाम साम्राज्यवाद की लड़ाई नहीं कहते हैं. दलित इस लड़ाई में अपनी जीत मानते हैं. उनके मुताबिक, इस लड़ाई में दलितों के खिलाफ अत्याचार करने वाले पेशवा की हार हुई थी.
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हर साल जनवरी में यहां क्या होता है?
हर साल जब 1 जनवरी को दुनिया भर में नए साल का जश्न मनाया जाता है उस वक्त दलित समुदाय के लोग भीमा कोरेगांव में जमा होते है. वो यहां 'विजय स्तम्भ' के सामने अपना सम्मान प्रकट करते हैं. ये विजय स्तम्भ ईस्ट इंडिया कंपनी ने उस युद्ध में शामिल होने वाले लोगों की याद में बनाया था. इस स्तम्भ पर 1818 के युद्ध में शामिल होने वाले महार योद्दाओं के नाम अंकित हैं. वो योद्धा जिन्हें पेशवा के खिलाफ जीत मिली थी.

युद्ध का 200वां साल
साल 2018 इस युद्ध का 200वां साल था. ऐसे में इस बार यहां भारी संख्या में दलित समुदाय के लोग जमा हुए थे. जश्न के दौरान दलित और मराठा समुदाय के बीच हिंसक झड़प हुई थी. इस दौरान इस घटना में एक शख्स की मौत हो गई जबकि कई लोग घायल हो गए थे. इस बार यहां दलित और बहुजन समुदाय के लोगों ने एल्गार परिषद के नाम से शनिवार वाड़ा में कई जनसभाएं की. शनिवार वाड़ा 1818 तक पेशवा की सीट रही है. जनसभा में मुद्दे हिन्दुत्व राजनीति के खिलाफ थे. इस मौके पर कई बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भाषण भी दिए थे और इसी दौरान अचानक हिंसा भड़क उठी.

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First published: November 6, 2019, 4:37 PM IST
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