कोर्ट ने की कड़ी टिप्प्णी, कहा-लगता है अदालतों में टाइम मशीन है, मुकदमें खत्म ही नहीं होते

किराया नियंत्रण अधिनियम से संबंधित एक मामले में अदालत ने शुक्रवार को कहा कि यह मुकदमा 1986 में शुरू हुआ था. इसके बाद कई अपील, आवेदन और याचिकाएं दायर हुईं, लेकिन मामला फिर भी नहीं सुलझा, जबकि वास्तविक भू-स्वामी और किरायेदार अब जीवित नहीं रहे हैं.

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Updated: September 8, 2019, 2:02 AM IST
कोर्ट ने की कड़ी टिप्प्णी, कहा-लगता है अदालतों में टाइम मशीन है, मुकदमें खत्म ही नहीं होते
जज दामा एस नायडू ने कहा कि कई मामलों में दोनों पक्षों के वादियों की मृत्यु हो जाती है, लेकिन मुकदमेबाजी बाद की पीढ़ियों द्वारा की जाती है. (Demo Pic)
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Updated: September 8, 2019, 2:02 AM IST
भारतीय अदालतों में मुकदमों को समाप्त होने में काफी समय लगने का जिक्र करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट (Bombay High Court) ने कहा कि ऐसा लगता है कि अदालतों में 'टाइम मशीन' (Time MAchine) है, जहां मामले अनिश्चितकाल तक चलते रहते हैं. किराया नियंत्रण अधिनियम से संबंधित एक मामले में अदालत ने शुक्रवार को कहा कि यह मुकदमा 1986 में शुरू हुआ था. इसके बाद कई अपील, आवेदन और याचिकाएं दायर हुईं, लेकिन मामला फिर भी नहीं सुलझा, जबकि वास्तविक भू-स्वामी और किरायेदार अब जीवित नहीं हैं.

जज दामा एस नायडू ने कहा कि कई मामलों में दोनों पक्षों के वादियों की मृत्यु हो जाती है, लेकिन मुकदमेबाजी बाद की पीढ़ियों द्वारा की जाती है. ये याचिका रुक्मणीबाई द्वारा दायर की गई थी. याचिका में उसने अपनी संपत्ति से कुछ किरायेदारों को बाहर किए जाने का अनुरोध किया था.

मामले के दौरान उसकी मौत हो गई और उसके वारिसों ने इस मामले को संभाल लिया. किरायेदारों के खिलाफ 1986 में संपत्ति खाली कराये जाने की कार्रवाई शुरू की गई थी और निचली अदालत तथा हाईकोर्ट ने संपत्ति मालिकों के पक्ष में फैसला दिया था. वर्ष 2016 में किरायेदारों ने बदली परिस्थितियों का हवाला देते हुए फिर से हाईकोर्ट का रुख किया था.

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First published: September 7, 2019, 11:08 PM IST
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