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डॉ तडवी सुसाइड केस: जांच में देरी पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने जांचकर्ताओं को लगाई फटकार

अदालत ने बचाव पक्ष के वकील अबद पोंडा की उस दलील को भी खारिज कर दिया कि आरोपी डॉक्टरों को जमानत मिलनी चाहिए

अदालत ने बचाव पक्ष के वकील अबद पोंडा की उस दलील को भी खारिज कर दिया कि आरोपी डॉक्टरों को जमानत मिलनी चाहिए

डॉ. तडवी आत्महत्या मामले में बंबई हाईकोर्ट ने अभियोजन पक्ष को फटकार लगाई है. यह फटकार जांच में देरी के लिए लगाई गई है.

    डॉ. तडवी आत्महत्या मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने अभियोजन पक्ष को फटकार लगाई है. यह फटकार जांच में देरी के लिए लगाई गई है. मंगलवार को इस मामले में कोर्ट में सुनवाई हुई. बता दें कि कुछ महीने पहले ही अपनी ही जूनियर डॉक्टर पायल तडवी को आत्महत्या के लिए उकसाने की आरोपी तीन महिला डॉक्टरों की जमानत याचिका पर कोर्ट सुनवाई कर रही थी.

    इस मामले की सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति साधना जाधव ने अपराध शाखा को ‘अपनी जिम्मेदारी ठीक तरीके से नहीं निभाने’ के आरोप में बीवाईएल नायर अस्पताल में प्रसूति और स्त्री रोग विभाग की प्रमुख डॉ. यी चिंग लिंग के खिलाफ कार्रवाई को लेकर अनुमति मांगने की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया। तडवी (26) मेडिकल की द्वितीय वर्ष की स्नातकोत्तर की छात्रा थी, उसने बीवाईएल नायर अस्पताल में तीन डॉक्टरों की रैगिंग और जातिसूचक टिप्पणियों से तंग आकर अपने हॉस्टल के कमरे में 22 मई को कथित रूप से आत्महत्या कर ली थी।

    डॉ तडवी अनुसूचित जाति समुदाय से थीं

    तडवी की मां ने दावा किया कि हेमा आहूजा, अंकिता खंडेलवाल और भक्ति मेहर उनकी बेटी को मानसिक प्रताड़ना दे रही थीं. जिसको लेकर मेरी बेटी ने डॉ. लिंग से शिकायत की थी। ये तीनों उनके विभाग में उसकी सीनियर थीं।

    डॉ. तडवी आत्महत्या मामले में बंबई हाईकोर्ट ने अभियोजन पक्ष को फटकार लगाई है


    विशेष अदालत द्वारा 24 जून को तीनों आरोपियों की जमानत याचिका खारिज किये जाने के बाद उन्होंने उच्च न्यायालय का रुख किया था। मंगलवार को याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि मेडिकल का पेशा अब कोई आदर्श पेशा नहीं रह गया है। न्यायमूर्ति जाधव ने यह भी सुझाव दिया कि सुनवाई पूरी होने तक आरोपी डॉक्टरों का मेडिकल लाइसेंस रद्द कर देना चाहिए।

    अदालत ने बचाव पक्ष के वकील अबद पोंडा की उस दलील को भी खारिज कर दिया कि आरोपी डॉक्टरों को जमानत मिलनी चाहिए क्योंकि वे हत्या या नरसंहार के किसी मामले में आरोपी नहीं हैं। न्यायमूर्ति जाधव ने कहा कि हत्या या नरसंहार से इसकी तुलना ठीक नहीं है क्योंकि आरोपियों ने पीड़िता को ‘‘मानसिक आघात पहुंचाया’’ और अक्सर यह कहा जाता है कि मानसिक आघात से कहीं बेहतर शारीरिक आघात है क्योंकि मानसिक आघात कभी दिखता नहीं है जिससे वह इलाज से अछूता रह जाता है।

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    Tags: Mumbai, Mumbai high court, Mumbai local news, Mumbai police

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