जानिए शरद पवार के कुनबे को.. जिनके लिए उन्होंने बदला अपना रुख

राकांपा प्रमुख शरद पवार ने लोकसभा के ठीक पहले अपने पहले के रुख से पलटते हुए अपने परिवार की अगली पीढ़ी को मौक़ा देने की घोषणा की है. इस तरह सबकी निगाहें पार्थ पवार व रोहित पवार पर टिक गई हैं.

News18India
Updated: April 24, 2019, 5:46 PM IST
जानिए शरद पवार के कुनबे को.. जिनके लिए उन्होंने बदला अपना रुख
शरद पवार के परिवार के सदस्य
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Updated: April 24, 2019, 5:46 PM IST
अरुंधती जोशी 

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) प्रमुख शरद पवार इस बार के लोकसभा चुनाव में अपने पुराने रुख से पलटते नजर आ रहे हैं. एक माह से भी कम हुआ जब उनसे पूछा गया था कि क्या पवार ख़ानदान की तीसरी पीढ़ी के पार्थ और रोहित चुनाव लड़ेंग? इसके जवाब में शरद पवार ने कहा था, “न तो पार्थ और न ही रोहित लोकसभा चुनाव लड़ेंगे, यहां तक कि अजित पवार भी चुनाव नहीं लड़ेंगे. संदेश स्पष्ट था - शरद पवार और उनकी बेटी सुप्रिया सुले ही चुनाव लड़ेंगे. पहले के इस रुख से किनारा करते हुए अब पवार ने कहा है कि परिवार के साथ विचार-विमर्श करने के बाद हमारी यह राय बनी कि अगली पीढ़ी को मौक़ा दिया जाए.



शरद पवार ऐसे नेताओं में शुमार हैं जिन्होंने अपनी राजनीतिक ज़मीन ख़ुद तैयार की है. बहुत ही कम उम्र में उन्होंने राजनीति में क़दम रखा और 37 वर्ष की उम्र में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने. 1991 में पवार को कांग्रेस का अगला प्रधानमंत्री माना जाता था पर शायद यह कुर्सी उनके भाग्य में नहीं थी और पीवी नरसिम्हा राव को यह कमान सौंपी गई.

पवार ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि वे जो भी हैं, अपनी मां शारदाबाई की वजह से हैं. वह स्थानीय समिति की निर्वाचित प्रतिनिधि थीं और पीजेंट्स एंड वर्कर्स पार्टी ऑफ़ इंडिया (पीडब्ल्यूपीआई) में सक्रिय थीं. इस पार्टी की स्थापना केशवराव जेधे ने की थी.

आईएनसी से अलग होकर पवार ने राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी नामक अलग पार्टी बनाई और प्रधानमंत्री बनने की अपनी महत्त्वाकांक्षा कभी नहीं छिपाई. उन्होंने काफ़ी चतुराई से अपनी अगली पीढ़ी के लिए जगह बनाई. पहले उन्होंने अपने भतीजे अजित पवार को पार्टी में लाया.

अजित पवार

अजित अनंतराव के बेटे हैं और अनंतराव शरद पवार के बड़े भाई. वे 1991 में बारामती से उस समय लोकसभा के लिए चुने गए जब शरद पवार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे, पर अजित पवार ने यह सीट शीघ्र ही अपने चाचा के लिए ख़ाली कर दी जो यहां से लोकसभा चुनाव जीतकर केंद्र में मंत्री बने. इसके बाद से अजित अपने चाचा के दिशानिर्देश में राज्य की राजनीति में ही अपना ध्यान लगा रहे हैं. वर्ष 2012 में वे महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री बने पर 2014 में राज्य में भाजपा के सत्ता में आने के कारण राज्य का मुख्यमंत्री बनने का उनका सपना पूरा नहीं हुआ. अब अजित पवार पार्थ पवार को लोकसभा में लाने के लिए ज़ोर डाल रहे हैं.
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पार्थ पवार

पार्थ पवार अजित पवार के बड़े बेटे हैं  और 28 वर्ष के हैं. पिछले एक साल से वे मावल संसदीय क्षेत्र में जनता के बीच सक्रिय हैं. पुणे के नज़दीक पिंपरी चिंचवड़ का बड़ा हिस्सा इस संसदीय क्षेत्र का हिस्सा है. पिछले वर्ष अक्टूबर से पार्थ के इस क्षेत्र से लोकसभा के लिए उम्मीदवार होने की चर्चा चल रही है. अक्टूबर 2018 में शरद पवार ने घोषणा की थी कि वे इस बार लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे. दिलचस्प यह है कि पीडब्ल्यूपीआई पार्टी पार्थ पवार की मावल क्षेत्र से 2019में उम्मीदवारी का समर्थन कर रही है. मावल क्षेत्र को अजित पवार का गढ़ माना जाता है. इस समय मवाल संसदीय क्षेत्र पर शिवसेना का क़ब्ज़ा है और उसके सांसद श्रीरंग बार्ने दूसरी बार यहां से चुनाव जीते हैं.

रोहित पवार

33 साल के रोहित पवार इस पवार परिवार की तीसरी पीढ़ी के दूसरे प्रमुख नेता हैं. रोहित अप्पासाहेब पवार के पौत्र हैं और अजित पवार के भतीजे हैं. यानी शरद पवार के बड़े भाई के बेटे हैं. रोहित के माता-पिता राजेंद्र और सुनंदा पवार हैं. पिछले पांच साल से अधिक से रोहित राजनीति में सक्रिय हैं. नई पीढ़ी के मज़े हुए नेता के रूप में रोहित मीडिया और अपनी पार्टी के ज़मीनी कार्यकर्ताओं के साथ अच्छा संबंध बनाने में सफल रहे हैं. वे पुणे ज़िला परिषद के चुने हुए प्रतिनिधि हैं और विधानसभा का चुनाव लड़ने के बारे में अपनी इच्छा को उन्होंने कभी भी नहीं छिपाया है. उन्होंने कहा है, "मैं चुनाव लड़ना चाहूंगा, पर इसके बारे में निर्णय परिवार लेगा और साहेब का निर्णय ही हम सब के लिए अंतिम होगा.

जब शरद पवार ने चुनाव नहीं लड़ने के अपने निर्णय की घोषणा की तो रोहित ने फ़ेसबुक पर एक पोस्ट लिखा. उन्होंने आग्रह किया, “साहेब, चुनाव नहीं लड़ने के अपने निर्णय पर कृपया पुनर्विचार कीजिए. " उनकी इस टिप्पणी को इस तरह भी देखा जा रहा है कि पवार परिवार में मतभेद है, पर रोहित ने तुरंत ही यह भी लिखा, “परिवार में किसी तरह का कोई मतभेद नहीं है. परिवार में किसी भी तरह की समस्या को हमेशा ही बातचीत से सुलझाया गया है."

पवार का कुनबा 13 साल बाद एक बार फिर वही स्पष्टीकरण दे रहा है. इस बात की अटकलें लगाई जा रही थीं कि वर्ष 2006 में सुप्रिया सुले के राजनीति में आने के बाद अजित पवार पार्टी में अपनी स्थिति को लेकर पूर्णतया असुरक्षित महसूस करते हैं. उस समय अजित पवार ने ख़ुद कहा था, “कोई मतांतर नहीं है, चाचा इस बारे में अंतिम निर्णय लेंगे”. यानी गेंद अब दादा जी के पाले में है.

लोकसभा चुनाव की अधिसूचना जारी हो चुकी है और महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना का गठबंधन हो चुका है. ऐसे में महाराष्ट्र के ताकतवर नेता शरद पवार अपनी राजनीतिक विरासत को अपनी तीसरी पीढ़ी को हस्तांतरित करके सत्ता की कुर्सी तक पहुंचाने में किस हद तक कामयाब हो पाते हैं यह आने वाला समय ही बताएगा.

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