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विधानसभा का चुनावी महासमर: राष्ट्रवाद के सामने फीके दिख रहे हैं स्थानीय मुद्दे

विधानसभा का चुनावी महासमर: राष्ट्रवाद के सामने फीके दिख रहे हैं स्थानीय मुद्दे

महाराष्ट्र और हरियाणा दोनों ही जगह चुनाव प्रचार जमकर चल रहा है. सत्ता पक्ष और विपक्ष अपने-अपने तरीके से लोगों का भरोसा जीतने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन मोटे तौर दोनों जगह राष्ट्रवाद का मुद्दा हावी दिख रहा है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

महाराष्ट्र और हरियाणा दोनों ही जगह चुनाव प्रचार जमकर चल रहा है. सत्ता पक्ष और विपक्ष अपने-अपने तरीके से लोगों का भरोसा जीतने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन मोटे तौर दोनों जगह राष्ट्रवाद का मुद्दा हावी दिख रहा है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

आम तौर पर बीजेपी (BJP) और सहयोगी पार्टियों (NDA Allies) की जीत तय लगने लगती है, जब चुनाव प्रचार राष्ट्रवाद (Nationalism) के मुद्दे के इर्द-गिर्द घूमता नजर आता है. दो राज्यों (Maharashtra and Haryana Assembly Elections 2019) में होने वाली वोटिंग के पहले कुछ ही दिन शेष हैं लेकिन दोनों राज्यों की राजनीतिक चर्चाओं में स्थानीय मुद्दे जगह नहीं बना पा रहे हैं.

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मुंबई. आम तौर पर बीजेपी (BJP) और सहयोगी पार्टियों (NDA Allies) की जीत तय लगने लगती है, जब चुनाव प्रचार राष्ट्रवाद (Nationalism) के मुद्दे के इर्द-गिर्द घूमता नजर आता है. दो राज्यों महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनाव (Maharashtra and Haryana Assembly Elections 2019) में होने वाली वोटिंग के पहले कुछ ही दिन शेष हैं, लेकिन दोनों राज्यों की राजनीतिक चर्चाओं में स्थानीय मुद्दे जगह नहीं बना पा रहे हैं. जाहिर है स्थितियां जब इस तरह करवट लेने लगें तो नतीजों की तस्वीर धुंधली नहीं रह जाती है.

हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनावी प्रचार में स्थानीय मुद्दे कमजोर
हरियाणा के विधानसभा चुनाव में जाट आरक्षण जैसे मुद्दे की गूंज खूब सुनाई पड़ेगी लेकिन बीजेपी और कांग्रेस इस मुद्दे को तवज्जो देते दिखाई नहीं पड़ रहे हैं. कभी जाट जाति के इर्द-गिर्द घूमती रही सत्ता की राजनीति अब उसके खिलाफ गोलबंदी के रूप में करवट ले चुकी है. यही वजह है कि देश की दो प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियां कांग्रेस और बीजेपी दोनों इस जाट आरक्षण के मुद्दे पर ज्यादा ध्यान देने के पक्षधर नहीं हैं.

हरियाणा में चुनाव प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के साथ बीजेपी सांसद हंस राज हंस.
हरियाणा में चुनाव प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के साथ बीजेपी सांसद हंस राज हंस.


हरियाणा की राजनीति में राष्ट्रीय मुद्दा इस कदर हावी है कि वहां के चुनाव प्रचार में बीजेपी के स्टार प्रचारक आर्टिकल 370 समेत बालाकोट एयर स्ट्राइक, ट्रिपल तलाक जैसे मुद्दे को जोर-शोर से उठा रहे हैं और जनजीवन के लिए हर वक्त जरूरी पानी की किल्लत जैसा गंभीर विषय बड़े नेताओं के भाषण में भी कहीं अंतिम में जगह पाता है. जाहिर है, बीजेपी जानती है कि चुनाव जीतने के लिए सबसे कारगर मुद्दे, जो हमेशा से ट्राइड और टेस्टेड रहे हैं, वो है राष्ट्रवाद, जो जातिवाद और स्थानीय मुद्दे पर भारी पड़ने की क्षमता रखते हैं.

महाराष्ट्र में भी कमोवेश स्थितियां वैसी ही हैं, यहां भी राष्ट्रवाद पूरी तरह चुनाव प्रचार में सिर चढ़कर बोल रहा है. किसानों की समस्या, मराठा आरक्षण, भीमा कोरेगांव मामले की गूंज नेताओं की जुबान से सुनाई तो पड़ते हैं लेकिन आरोप-प्रत्यारोप में इसकी जगह नहीं के बराबर नजर आती है. बीजेपी ने अपने घोषणा पत्र में किसान, रोजगार, सूखे की समस्या पर जोर दिया है लेकिन चुनाव प्रचार में अभी भी ये प्रमुख मुद्दों में शुमार होता दिखाई नहीं पड़ रहा है.

राष्ट्रीय मुद्दों की प्रमुखता के क्या हैं मायने ?
हरियाणा में सेना में काम करने वालों की अच्छी खासी तादाद है. इसलिए प्रधानमंत्री की लोकप्रियता और उनके नेतृत्व में सेना द्वारा प्रदर्शित किए गए पराक्रम को बीजेपी पूरे जोर-शोर से भुनाने में लगी है. इतना ही नहीं, महाराष्ट्र में भी बीजेपी ने वीर सावरकर, सावित्री बाई फूले और महात्मा फूले को भारत रत्न दिए जाने की अनुशंसा करने की बात कही है. साथ ही एक करोड़ लोगों को रोजगार और पांच साल में प्रदेश को सूखा मुक्त करने का संकल्प पत्र में ऐलान किया है.

संकल्प पत्र में स्थानीय मुद्दे पर भी चर्चा की गई है लेकिन राष्ट्रीय मुद्दों को पुरजोर उछाल कर बीजेपी लोगों को भावनात्मक रूप से जोड़ने में तत्पर दिख रही है. कांग्रेस और एनसीपी, बीजेपी और सहयोगी दल को रोजगार, आर्थिक मंदी का हवाला देकर घेरने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन मुख्य नेताओं पर भ्रष्टाचार को लेकर लगे आरोप, उनके आरोपों की धार कुंद कर रहे हैं.

इतना ही नहीं, कांग्रेस अंतर्कलह और गुटबाजी से भी इस कदर जूझ रही है कि एक नेता के बयान पर उसी पार्टी के दूसरे नेता कटाक्ष कर उसकी हवा निकाल देते हैं. ताजा उदाहरण राफेल को लेकर रक्षामंत्री द्वारा लिखे गए 'ऊं' का है, जिसमें वरिष्ठ कांग्रेसी नेता मल्लिकार्जुन खड़गे के बयान पर जोरदार प्रहार कांग्रेस के ही दूसरे नेता संजय निरूपम ने कर दिया था. वहीं हरियाणा में कांग्रेस के अशोक तंवर ने सोनिया के खास लोगों को चापलूस करार देकर पार्टी से किनारा कर लिया.

चुनाव से ठीक पहले महाराष्ट्र की राजनीति में साहेब के नाम से पुकारे जाने वाले शरद पवार आरोपों में घिर गए हैं. हालांकि उनकी पार्टी बीजेपी-शिवसेना को घेरने की कोशिश कर रही है लेकिन राष्ट्रवाद का मुद्दा ही मुख्य तौर पर अपनी जगह बनाता दिखाई दे रहा है.
चुनाव से ठीक पहले महाराष्ट्र की राजनीति में 'साहेब' के नाम से पुकारे जाने वाले शरद पवार आरोपों में घिर गए हैं. हालांकि उनकी पार्टी बीजेपी-शिवसेना को घेरने की कोशिश कर रही है लेकिन राष्ट्रवाद का मुद्दा ही मुख्य तौर पर अपनी जगह बनाता दिखाई दे रहा है.


पीएमसी घोटाले में बीजेपी शुरुआत में थोड़ी रक्षात्मक दिखी लेकिन घोटालेबाजों के साथ एनसीपी के बड़े नेता प्रफुल्ल पटेल का नाम चर्चा में आने पर बीजेपी महाराष्ट्र में एनसीपी और कांग्रेस पर आक्रामक होती नजर आ रही है. पहले ही एनसीपी के बड़े नेता शरद पवार और अजीत पवार पर ईडी कॉपरेटिव स्कैम में शिकंजा कस चुकी है. जाहिर है, बीजेपी नरेंद्र मोदी की साफ-सुथरी छवि को भुनाने में लगी है.

पार्टी जनता के बीच संदेश देना चाह रही है कि बीजेपी भ्रष्टाचार मुक्त देश बनाने की चाह रखती है जबकि विपक्ष परिवारवाद और भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहा है. गौरतलब है कि कांग्रेस के बड़े नेता पी. चिदंबरम भी आईएनएक्स मीडिया मामले में भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते जेल की हवा खा रहे हैं. वहीं प्रदेश के कई नेता भ्रष्टाचार को लेकर मुकदमा झेल रहे हैं.

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Tags: BJP, Congress, Devendra Fadnavis, Haryana Assembly Election 2019, Maharashtra Assembly Election 2019, NCP, Sharad pawar, Shiv sena

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