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महाराष्ट्र में क्यों आसान जीत की तरफ बढ़ते दिख रहे हैं BJP-शिवसेना

Pankaj Kumar | News18Hindi
Updated: October 10, 2019, 6:30 PM IST
महाराष्ट्र में क्यों आसान जीत की तरफ बढ़ते दिख रहे हैं BJP-शिवसेना
महाराष्ट्र चुनाव से पहले ही बीजेपी-शिवसेना ने एनसीपी-बीजेपी पर मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल कर ली है.

महाराष्ट्र चुनाव (Maharashtra Assembly Election 2019) में एक तरफ तो बीजेपी-शिवसेना (BJP-Shiv Sena) पूरे जोश के साथ चुनाव मैदान में हैं तो वहीं कांग्रेस-एनसीपी (Congress-NCP) के हौसले पस्त होते दिख रहे हैं.

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  • Last Updated: October 10, 2019, 6:30 PM IST
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मुंबई. महाराष्ट्र चुनाव (Maharashtra Assembly Election 2019) में एक तरफ तो बीजेपी-शिवसेना (BJP-Shiv Sena) पूरे जोश के साथ चुनाव मैदान में हैं तो वहीं कांग्रेस-एनसीपी (Congress-NCP) के हौसले पस्त होते दिख रहे हैं. पूर्व गृह मंत्री और दिग्गज कांग्रेसी नेता सुशील कुमार शिंदे का बयान तो कुछ इसी तरफ इशारा कर रहा है.

शिंदे ने चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस-एनसीपी के विलय की बात कर राजनीतिक कयासबाजियों को हवा दे दी है. इस बात को भी कि कांग्रेसी नेता पार्टी में मची भगदड़ से निराश महसूस कर रहे हैं. हालांकि महाराष्ट्र की राजनीति में 'साहेब' के नाम से मशहूर शरद पवार ने शिंदे के बयान पर आपत्ति जाहिर कर दी है. उन्होंने कहा कि शिंदे मेरी पार्टी की तरफ से बयान देने वाले कौन होते हैं? शरद पवार कुछ भी कहें, शिंदे का बयान कांग्रेस और एनसीपी की असली हकीकत बयां करने के लिए काफी है.

चुनाव से पहले कई दिग्गज तोड़ चुके हैं कांग्रेस और एनसीपी से नाता
गौरतलब है कि कांग्रेस और एनसीपी के कई नेता पार्टी छोड़ चुके हैं और उनमें से कई नेता पार्टी के स्टार प्रचारक भी रह चुके हैं. इन नेताओं में कृपाशंकर सिंह, नारायण राणे, उर्मिला मातोंडकर समेत कई वर्तमान विधायक हैं जो साल 2014 में कांग्रेस और एनसीपी के टिकट पर विधानसभा चुनाव जीत पाने में कामयाब रहे थे.

आलम यह है कि मराठवाड़ा के लोकप्रिय नेता और शिवाजी के वंशज उदयनराजे ने भी एनसीपी का साथ छोड़कर बीजेपी का दामन पकड़ लिया है. कांग्रेस और एनसीपी की छीछालेदर होती देख नितिन गडकरी चुटकी लेते हुए कह चुके हैं कि जहाज जब डूबने वाला होता है तो चूहे सबसे पहले उसे छोड़कर भाग खड़े होते हैं. प्रदेश में कांग्रेस और एनसीपी की इतनी पतली हालत पहले शायद कभी नहीं दिखी, इसलिए साल 2019 का विधानसभा चुनाव बीजेपी-शिवसेना के लिए केक वॉक (बेहद आसान) माना जा रहा है.

जमीनी स्तर पर गहरी पैठ बनाने में बीजेपी हुई कामयाब


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पिछले बीस साल के दौरान हुए चुनाव पर नजर डालें तो विधानसभा चुनाव का परिणाम लोकसभा चुनाव के परिणाम से बिल्कुल मेल खाता है. इसलिए पहले संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में जनता जिसको पसंद करती है, उसे ही विधानसभा चुनाव में भी जीत का सेहरा पहना राज्य की सत्ता की बागडोर संभालने का मौका देती है. वैसे साल 1999 का चुनाव एक अपवाद रहा है जिसमें लोकसभा चुनाव का परिणाम विधानसभा चुनाव के परिणाम से भिन्न था. इसलिए साल 2019 में लोकसभा चुनाव में में 48 में से 41 सीटें जीत चुकी बीजेपी और शिवसेना विधानसभा चुनाव में भी बेहद मजबूत मानी जा रही हैं.

जमीनी स्तर पर बीजेपी की पकड़ किस कदर मजबूत हुई है इस बात का अंदाजा साल 2017 के जिला परिषद और म्यूनिसपलिटी चुनाव के परिणाम से लगाया जा सकता है. इस चुनाव में बीजेपी का परफॉरमेंस शिवसेना और एनसीपी से कहीं ज्यादा बेहतर रहा है. बीजेपी साल 2009 से लगातार शिवसेना के साथ 2019 तक के चुनाव में शहरों में 55 फीसदी से भी ज्यादा मत हासिल करने में कामयाब रही है.

आंकड़ों के मुताबिक मराठों पर भी बीजेपी और शिवसेना की पकड़ मजबूत हुई है. 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी-शिवसेना मराठों का 39 फीसदी मत पाने में कामयाब रहे थे, वहीं कांग्रेस-एनसीपी 28 फीसदी मत हासिल कर पाने में सफल हुए थे. कांग्रेस की पकड़ मराठों के अलावा दलित मतदाताओं पर भी ढीली पड़ चुकी है. बीजेपी दलित मतदाताओं पर भी पकड़ बनाने में कुछ हद तक कामयाब हुई है. वहीं प्रकाश अंबेडकर की पार्टी वंचित बहुजन अगाडी भी दलित वोट को अपनी तरफ मोड़ पाने में कामयाब रही है. जाहिर है कांग्रेस और एनसीपी के पारंपरिक वोटों में बीजेपी की सेंधमारी विधानसभा चुनाव में उसकी जीत की नींव रख चुकी है

उद्यमियों से लेकर किसानों तक पैर पसारने में कामयाब
विदर्भ और मराठवाड़ा वेस्टर्न महाराष्ट्र की तुलना में पिछड़े इलाके हैं. जहां लोगों का मुख्य पेशा खेती है. इन इलाकों में किसानों की आत्महत्या की बातें भी सामने आई हैं, लेकिन 'प्रधानमंत्री किसान योजना' और 'गन्ने का उचित मूल्य' सरकार द्वारा दिलाए जाने की विशेष पहल बीजेपी और उसके सहयोगी दल की स्थिति मजबूत करने में कारगर रही है.

विदर्भ से देवेंद्र फडणवीस का चुना जाना एक और वजह है, जिसके कारण बीजेपी पहले से कहीं ज्यादा मजबूत स्थिती में दिखाई पड़ रही है.



आर्टिकल 370 बन सकता है गेमचेंजर
बीजेपी आर्टिकल 370 के कई प्रावधानों को हटाकर जम्मू-कश्मीर की स्वायत्ता को खत्म कर चुकी है. आर्टिकल 370 की धार को पूरी तरह से कुंद कर लगभग पूरे विश्व का समर्थन जुटा पाने में कामयाब रही बीजेपी अपनी कामयाबी को भुनाने के लिए तैयार दिख रही है. आलम यह है कि बीजेपी के प्रखर राष्ट्रवाद के सामने विपक्ष के तमाम मुद्दे निरर्थक दिखाई पड़ते नजर आए हैं. वैसे आंकड़ों पर नजर डाले तो 2017-2018 में बेरोजगारी दर राज्य में 5 फीसदी थी जो देश बेरोजगारी दर से 1 फीसदी कम थी. वहीं 15-29 साल के उम्र के युवाओं के बीच बेरोजगारी दर 15 फीसदी थी जो देश की तुलना में 3 फीसदी कम रही है.

जाहिर है ये सभी आंकड़े आने वाले चुनाव में सत्ताधारी दल के लिए जीत का सेहरा पहनने के लिए कागरगर हथियार के तौर पर देखे जा रहे हैं. वैसे कुछ मुद्दों पर शिवसेना का पुरजोर विरोध सत्ताधारी गठबंधन के बीच गहरे मतभेद जाहिर कर रहा है लेकिन इस मतभेद को भुना पाने की स्थिति में विपक्ष कतई नहीं है.
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First published: October 10, 2019, 5:50 PM IST
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