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महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2019: उद्धव ने पिता से सीखा सियासत का पाठ, ऐसा रहा है सियासी सफर

Pankaj Kumar | News18Hindi
Updated: October 14, 2019, 6:52 PM IST
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2019: उद्धव ने पिता से सीखा सियासत का पाठ, ऐसा रहा है सियासी सफर
शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे (फाइल फोटो)

अपनी राजनीतिक पारी में साल 2002 में उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) को पहली बड़ी सफलता मिली, जब बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कारपोरेशन (BMC) के चुनावों में शिवसेना (Shiv Sena) को जोरदार सफलता मिली.

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  • Last Updated: October 14, 2019, 6:52 PM IST
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मुंबई. शिवसेना (Shiv Sena) महाराष्ट्र की लोकप्रिय राजनीतिक दल है. उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) शिवसेना के प्रमुख हैं. वह शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे (Bal Thackeray) के बेटे हैं. 27 जुलाई 1960 में जन्मे उद्धव ठाकरे का विवाह रश्मि ठाकरे से हुआ है और उनके दो बेटे हैं जिनका नाम आदित्य और तेजस ठाकरे हैं. आदित्य ठाकरे (Aaditya Thackeray) युवा सेना के अध्यक्ष हैं और छोटे बेटे तेजस न्यूयॉर्क में पढ़ाई कर रहे हैं.

बाल ठाकरे के राजनीति में सक्रिय रहने तक तो उद्धव राजनीतिक परिदृश्य से लगभग दूर ही रहे और शिवसेना के अखबार सामना का काम देखते थे और उसके संपादक भी रहे. साल 2000 के बाद जब बाल ठाकरे की तबियत खराब रहने लगी तब उद्धव ने पार्टी का कामकाज देखना शुरू किया.

2003 में बने पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष
अपनी राजनीतिक पारी में साल 2002 में उनको पहली बड़ी सफलता मिली, जब बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कारपोरेशन (बीएमसी) के चुनावों में शिवसेना को जोरदार सफलता मिली. इसके बाद उन्हें 2003 से पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया गया. उद्धव को खुद को राजनीति में स्थापित करने के लिए परिवार और पार्टी दोनों में लड़ाई लड़नी पड़ी. एक तरफ उन्हें बाल ठाकरे के उत्तराधिकारी माने जाने वाले अपने चचेरे भाई राज ठाकरे से लड़ाई लड़नी पड़ी, वहीं पार्टी में भी एक गुट के विरोध को सहना पड़ा.

सबसे पहले उद्धव के खिलाफ तत्कालीन शिवसेना नेता नारायण राणे ने सवाल उठाए लेकिन नारायण राणे को बाहर का रास्ता देखना पड़ा. जिसके बाद वो शिवसेना छोड़ कांग्रेस में शामिल हो गए. साल 2006 में उद्धव ठाकरे की पार्टी पर मजबूत पकड़ के चलते राज ठाकरे को पार्टी से बाहर जाना पड़ा. राज ठाकरे ने शिवसेना से निकलकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) नामक पार्टी का गठन किया और शिवसेना के नए नेता उद्धव ठाकरे पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से शब्द बाण मारने लगे.

पार्टी पर मजबूत पकड़
कहा जाता है कि उद्धव ठाकरे लोकतांत्रिक तरीके से पार्टी चलाने में यकीन रखते हैं. उद्धव पार्टी कार्यकर्ताओं के संपर्क में रहना पसंद करते हैं और यही वजह है कि कॉरपोरेटर तक से जमीनी स्तर की बातों का चर्चा करना उनका स्वभाव है. इतना ही नहीं वो दिल्ली के नेताओं से भी लगातार संपर्क में रहते हैं और महाराष्ट्र के भी हिस्सों में जाकर वो अपनी पार्टी को मजबूत करने में जुटे रहते हैं. उद्धव उग्र मराठी पॉलिटिक्स करने में बिल्कुल यकीन नहीं रखते. इसलिए साल 2006 में राज ठाकरे के अलग हो जाने के बाद राज ठाकरे ने उत्तर भारतीय के खिलाफ आंदोलन कर अपनी राजनीति को धार देने की कोशिश की और शिवसेना के वोट में साल 2009 में सेंधमारी भी की. लेकिन ये उद्धव स्टाइल की राजनीति थी जो धीरे-धीरे उनकी राजनीतिक पकड़ को मजबूत करती चली गई. ये बात और है कि बाल ठाकरे के समय में शिवसेना महाराष्ट्र की सबसे मजबूत पार्टी थी और बीजेपी के साथ ‘सीनियर पार्टनर’ के रूप में गठबंधन में थी. लेकिन बाल ठाकरे के निधन के बाद शिवसेना का वर्चस्व कम होता चला गया और आज शिवसेना बीजेपी के साथ गठबंधन में तो हैं पर ‘जूनियर पार्टनर’ के रूप में.
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बीजेपी के साथ बनते-बिगड़ते रिश्ते
साल 2014 का लोकसभा चुनाव बीजेपी के साथ शिवसेना लड़ी. वहीं विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने शिवसेना को सीनियर पार्टनर का दर्जा देने से इनकार कर दिया. 2014 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी अलग चुनाव लड़कर 122 सीटें जीतने में कामयाब रही. वहीं शिवसेना प्रदेश में 62 सीटों पर ही जीत दर्ज कर सकी. प्रदेश में कई दशक से सीनियर पार्टी की हैसियत रखने वाली शिवसेना को नहीं चाहते हुए भी बीजेपी के साथ गठजोड़ करना पड़ा और इस गठजोड़ में शिवसेना की हैसियत जूनियर पार्टनर की ही रही. मुख्यमंत्री की कुर्सी तो गई ही उपमुख्यमंत्री की कुर्सी भी बीजेपी की तरफ से उन्हें नहीं मिली इसलिए शिवसेना महाराष्ट्र की सरकार में रहकर भी केंद्र की बीजेपी सरकार के खिलाफ जहर उगलती रही.

उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में शिवसेना की हैसियत वो नहीं रही जो उनके पिता के नेतृत्व में एनडीए के कुनबे में शिवसेना की होती थी. उद्धव प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बीजेपी पर लगातार हमलावर रहे. लेकिन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी का ग्राफ इतना ऊपर जाता रहा कि शिवसेना अपने पुराने दिनों की हैसियत में फिलहाल लौटती नजर नहीं आ रही है. साल 2019 के लोकसभा चुनाव में भी गठबंधन खटाई में पड़ते-पड़ते बचा.

शिवसेना नेता संजय राउत सीटों के आवंटन को हिन्दुस्तान पाकिस्तान से भी ज्यादा पेचीदा बंटवारा बता कर गठबंधन की पेचीदगियों को ज़ाहिर कर चुके हैं. जाहिर है कि उद्धव ठाकरे मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए में शिवसेना पार्टी की छोटी हैसियत दिए जाने को लेकर सहज नहीं हैं लेकिन शायद ये राजनीतिक मजबूरी है जो उन्हें गठजोड़ में रहने के लिए विवश कर रही है. इसलिए उद्धव को अपने बेटे आदित्य ठाकरे को मैदान में उतारना पड़ा ताकि नए प्रयोग और मजबूत नेतृत्व से शिवसेना वापस ड्राइविंग सीट पर आ सके.

उद्धव ठाकरे को पसंद है फोटोग्राफी
उद्धव अपने पिता बाल ठाकरे और चचेरे भाई राज ठाकरे से बिल्कुल अलग छवि के नेता माने जाते रहे हैं. उद्धव प्रकृति से प्रेम रखते हैं और उनका शांत और सहज स्वभाव, लोगों के बीच जेंटलमैन पॉलिटिशियन के रूप में उन्हें स्थापित करता है. उद्धव के पिता अपने तीखे राजनैतिक कटाक्ष वाले कार्टून्स के लिए जाने जाते थे. वहीं उद्धव वाइल्‍डलाइफ फोटोग्राफी का शौक रखते हैं और इससे जुड़ी ढेरों प्रदर्शनियों और पर्यावरण से जुड़े कार्यक्रमों का आयोजन करते रहते हैं. उद्धव ठाकरे क्रिकेट से भी गहरा लगाव रखते हैं और क्रिकेट मैच को बड़े चाव से देखना उन्हें बेहद पसंद हैं. इतना ही नहीं, उनका हिंदी सिनेमा से भी गहरा लगाव है और सुनील शेट्टी, संजय दत्त सरीखे प्रसिद्ध कलाकार से उनकी दोस्ती के किस्से काफी मशहूर हैं.

उद्धव राजनीति में इस कदर पिता की विरासत संभालेंगे, इसकी शायद ही किसी को उम्मीद थी. लेकिन उनके बेटे आदित्य ठाकरे राजनीति में सक्रिय भूमिका में होंगे, इस बात की उम्मीद शिवसैनिक सहित आमलोगों को भी थी. फिलहाल उद्धव उन्हें वर्ली विधानसभा चुनाव मैदान में उतारकर सियासी जिम्मेदारी संभालने के लिए तैयार कर रहे हैं.

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First published: October 14, 2019, 5:16 PM IST
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