गठबंधन के पेंच में फंसता नजर आ रहा है महाराष्ट्र का विधानसभा चुनाव

अमित शाह का प्रस्तावित मुंबई दौरा रद्द किया जाना इस बात का सूचक है कि अभी भी बीजेपी और शिवसेना में सीटों के तालमेल को लेकर रस्साकशी ज़ारी है.
अमित शाह का प्रस्तावित मुंबई दौरा रद्द किया जाना इस बात का सूचक है कि अभी भी बीजेपी और शिवसेना में सीटों के तालमेल को लेकर रस्साकशी ज़ारी है.

बीजेपी और शिवसेना एक साथ चुनाव लड़ेंगे या मुकाबला त्रिकोणीय होगा, इसको लेकर अभी भी तस्वीर साफ नहीं है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 26, 2019, 5:58 PM IST
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(पंकज कुमार)

मुंबई. महाराष्ट्र (Maharashtra) की राजनीति (Politics) में गठबंधन का पेंच अभी भी फंसा हुआ है. 26 सितंबर यानी गुरुवार को बीजेपी (BJP) अध्यक्ष अमित शाह (Amit Shah) का प्रस्तावित मुंबई दौरा रद्द किया जाना इस बात का सूचक है कि अभी भी बीजेपी और शिवसेना में सीटों के तालमेल को लेकर रस्साकशी ज़ारी है. गठबंधन का पेंच सिर्फ बीजेपी-शिवसेना ही नहीं बल्कि कांग्रेस एनसीपी (NCP) और अन्य दलों के बीच भी फंसा है. वैसे कांग्रेस और एनसीपी के बीच 125-125 सीटों पर चुनाव लड़ने को लेकर सहमती बन चुकी है, लेकिन सीटों के आवंटन को लेकर जबर्दस्त गतिरोध जारी है.

बीजेपी और शिवसेना के गठबंधन में कहां फंसा है पेंच ?
दरअसल शिवसेना राज्य में बराबर सीटों की मांग कर लगातार दबाव बनाए रखना चाहती है. पिछले दिनों पार्टी नेता संजय राउत और शिवसेना नेता दिवाकर रावटे ने कहा था कि सीएम और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के सामने जो 50-50 फीसदी सीटों पर चुनाव लड़ने की बात हुई थी उसका सम्मान होना चाहिए. सूत्रों के मुताबिक बीजेपी 120 से 125 सीटें शिवसेना को आवंटित करना चाहती है वहीं शिवसेना, लोकसभा चुनाव के तय समीकरण के तहत सीटों के आवंटन पर जोर देकर अपनी बातों पर अड़ी है. इतना ही नहीं एनडीए की एक और घटक दल रिपब्लिक पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई) राज्य में दस विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा पेश कर गठबंधन की मुश्किलें और बढ़ा रही हैं.
सीनियर पार्टनर की भूमिका में रहना चाहती है बीजेपी


दरअसल साल 2019 लोकसभा चुनाव में बीजेपी 25 सीटों में 23 लोकसभा सीटें जीतने में कामयाब रही थी वहीं इसको 28 फीसदी मत प्राप्त हुए थे. शिवसेना को आवंटित 23 लोकसभा सीटों में 18 जीतने में कामयाबी मिली थी और उसका मत प्रतिशत 23 फीसदी था. इतना ही नहीं बीजेपी सरकार द्वारा कश्मीर में धारा 370 के ज्यादातर प्रावधानों को निष्क्रिय कर दिए जाने के बाद बीजेपी पार्टी और उसके मुखिया नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को जोरदार तरीके से भुनाना चाहती है.

बीजेपी को अकेले भी चुनाव लड़ना पड़े तो उसे लड़ना चाहिए
पार्टी, साल 2014 के विधानसभा चुनाव में आए नतीजों के मद्देनजर 122 सीटें जीती थी वहीं शिवसेना 63. इसलिए बीजेपी अपनी मजबूत पकड़ को बराबर की हिस्सेदारी देकर कमजोर नहीं करना चाहती है. ऐसे में पार्टी के अंदर एक बड़ा हिस्सा है जो मानता है कि बीजेपी को अकेले भी चुनाव लड़ना पड़े तो उसे लड़ना चाहिए, लेकिन गठबंधन में बड़े भाई की भूमिका से हटना नहीं चाहिए.

एनसीपी के नेताओं की लंबी फौज बीजेपी की ओर
बीजेपी इस बात से भी आत्मविश्वास से भरी है कि ज्यादातर नेता जो एनसीपी और कांग्रेस को छोड़ रहे हैं वो बीजेपी का दामन थामने को तैयार हैं. इनमें से प्रमुख हैं उदयन राजे भोंसले जो शिवाजी के वंशज हैं और इनके आने से बीजेपी, मराठों में भी अपनी पैठ मजबूत कर पाने में कामयाब होगी, इसका उसे पूरा भरोसा है. वैसे खुद प्रदेश के मुखिया देवेंद्र फडणवीस के हाल के बयान पर नजर डालें तो उन्होंने साफ तौर पर कहा है कि कांग्रेस और एनसीपी के नेताओं की लंबी फौज है जो बीजेपी की ओर रुखसत होना चाहती है. कांग्रेस और एनसीपी और उसके घटक दलों के बीच भी पेंच सुलझता दिख नहीं रहा है.

सीटें चिह्नित किए जाने को लेकर तनातनी बरकरार 
सोमवार को एनसीपी अपने घोषणा पत्र को जारी करने वाली थी, लेकिन ऐन वक्त पर उसे टाल दिया गया. सूत्रों के मुताबिक एनसीपी और कांग्रेस एक साथ घोषणा पत्र जारी करने की योजना बना रहे हैं. लेकिन दोनों दलों के बीच सीटों की संख्या को लेकर भले ही सहमति हो चुकी हो, लेकिन सीटें चिह्नित किए जाने को लेकर तनातनी बरकरार है. सूत्रों की मानें तो एनसीपी राज्य के सभी जिलों में सीटों की मांग कर रही है जहां उसका आधार मजबूत नहीं है.

एनसीपी मुंबई में 36 में कम से कम दर्जन सीट पर चुनाव लड़ना चाह रही है. वहीं विदर्भ जहां एनसीपी का कोई प्रभाव नहीं है वहां भी अपने खाते में सीटों की मांग कर रही है. फिलहाल इस बात को लेकर भी असमंजस की स्थिति है कि 38 सीटों पर वाम दल सहित समाजवादी पार्टी और अन्य दलों को समाहित कैसे किया जा सकेगा और इसमें महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना भी सम्मिलित होगी या नहीं इसको लेकर असमंजस की स्थिति बरकरार है.

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