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कौन है उद्धव ठाकरे की शपथ पहले ही देख लेने वाला ये ‘संजय’?

संजय राउत की जितनी नजदीकी शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे से थी उतनी ही उनके बेटे उद्धव से भी है

संजय राउत की जितनी नजदीकी शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे से थी उतनी ही उनके बेटे उद्धव से भी है

क्राइम रिपोर्टिंग से करियर शुरू करने वाले संजय राउत को बाल ठाकरे का भरोसा हासिल था अब वो उद्धव के भी बेहद करीबी हैं. साथ ही वो पहले अल्पसंख्यकों के विरोध में कड़े बयानों के लिए भी चर्चा में रह चुके हैं.

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नई दिल्ली. गुरुवार को उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) जब मुंबई (Mumbai) के शिवाजी मैदान (Shivaji Maidan) में जनता के अभिवादन के लिए जमीन पर झुके तो करीब एक लाख लोगों से भरे मैदान में शरद पवार (Sharad Pawar) के अलावा जो शख्स सबसे ज्यादा खुश था वो था संजय राउत (Sanjay Raut). यह कहना सही नहीं होगा कि संजय ने ही बीजेपी (BJP) से शिवसेना (Shiv Sena) की बगावत की स्क्रिप्ट लिखी. लेकिन यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि वो संजय राउत ही थे जिन्होंने पूरी स्क्रिप्ट ‘उद्धव सरकार राज’ को मूर्त रूप दिया.

बगावत की पूरी पटकथा में जितने भी बड़े डॉयलाग थे वो संजय राउत के मुंह से निकले. हो सकता है इच्छा उद्धव की ही रही हो, लेकिन उसे अमलीजामा संजय ने ही पहनाया. शिवसेना के मुखपत्र सामना (Saamna) के जरिए वैसे भी संजय ने बीजेपी पर हमला करने में कभी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी, और बीते एक महीने में उन्होंने कभी ट्विटर से तो कभी सामना से तो कभी टीवी के जरिए ताबड़तोर बाउंसर मारे. जाहिर है सामने बीजेपी थी और देवेंद्र फडणवीस की खिसियाहट साफ देखी जा सकती थी, राउत यहीं नहीं रुके उन्होंने सीधे दिल्ली में बैठे बीजेपी नेताओं पर भी ताबड़तोड़ हमले किए.





शिवसेना के रथ को यहां तक लाकर खड़ा कर देने वाले संजय राउत आखिर हैं कौन. यह जानना बड़ा रोचक है. दरअसल संजय राउत नब्बे के दशक में एक पब्लिकेशन में क्राइम रिपोर्टर हुआ करते थे. वर्ष 1992 में वो सामना से जुड़े. बाला साहेब ठाकरे के अंदाज और इरादों को समझ, उन्होंने उसे सामना के शब्दों में ढालने का काम लंबे वक्त तक किया. सामना के शिवसेना का मुखपत्र होने के चलते ठाकरे तक संजय राउत की सीधी पहुंच थी और यही करीबी उनकी बाल ठाकरे के जाने के बाद उद्धव से भी बनी हुई है. बाल ठाकरे के बाद जब शिवसेना के असली वारिस की बात आई तो संजय के लिए यह मुश्किल वक्त था क्योंकि उनकी राज ठाकरे से करीबी किसी से छिपी नहीं थी. लेकिन पार्टी के बाकी लोगों की तरह ही संजय ने उद्धव का साथ दिया और पिता का जो विश्वास उन पर था वो उन्हें बेटे से भी मिला.

मुंबई के शिवाजी मैदान में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद समर्थकों और जनता के सामने नतमस्तक होते उद्धव ठाकरे (फोटो: पीटीआई)


संजय राउत मंझे हुए लेकिन लापरवाह से दिखने वाले शख्स

संजय राउत को करीब से जानने वाले और उन्हें रोजाना कवर करने वाले पत्रकारों की नजर में वो एक मंझे हुए लेकिन लापरवाह से दिखने वाले शख्स की तरह हैं जो जानता है कि मीडिया को क्या और कितना, साथ ही किस तरह बताना है. पार्टी की नाराजगी को तंज के रूप में कैसे बयान करना है ये भी संजय को पता है. संजय ने बीते दिनों कई शायराना ट्वीट किए जो बीजेपी के लिए नश्तर की तरह थे.





हालांकि लगातार तीसरी बार राज्यसभा सांसद बने संजय राउत इतने भी मिस्टर क्लीन नहीं हैं. कई बार उन्होंने भड़काऊ बयान भी दिए हैं. अप्रैल 2015 में उन्होंने मुसलमानों के वोटिंग राइट छीन लिए जाने की बात कही थी जिस पर काफी हंगामा हुआ था. उनका तर्क था कि वोट बैंक की राजनीति के चलते ऐसा करना जरूरी है. वहीं सरकार बनने पर आज वो बयान दे रहे हैं कि बाला साहब मुसलमानों के खिलाफ नहीं थे. साफ है कि संजय की नजर शुद्ध रूप से पार्टीलाइन पर रही है न कि किसी ठोस विचारधारा पर है.

आज संजय राउत जरूर मना करें कि उन्हें चाणक्य न कहा जाए लेकिन शिवसेना के लिए तो वो किसी चाणक्य से कम नहीं हैं. जिसने तकरीबन असंभव से दिख रहे गठजोड़ को शरद पवार के साथ मिलकर हकीकत में बदल दिया.

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