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महाराष्ट्र: वो दो मामले जब सुप्रीम कोर्ट ने सुनाए थे ऐतिहासिक फैसले

Ravishankar Singh | News18Hindi
Updated: November 24, 2019, 5:56 PM IST
महाराष्ट्र: वो दो मामले जब सुप्रीम कोर्ट ने सुनाए थे ऐतिहासिक फैसले
सूप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के बाद सभी पक्षों को नोटिस जारी किया है. (फाइल फोटो)

शनिवार सुबह बीजेपी (BJP) नेता और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस (Devendra Fadnavis) के मुख्यमंत्री और शरद पवार (Sharad Pawar) के भतीजे अजित पवार (Ajit Pawar) के डिप्टी सीएम पद की शपथ लेने के बाद से ही राज्य की राजनीति गरमाई हुई है.

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  • Last Updated: November 24, 2019, 5:56 PM IST
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नई दिल्ली. महाराष्ट्र (Maharashtra) में शनिवार सुबह से ही राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से बदलता रहा है. रविवार को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में जस्टिस एनवी रमन्ना, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस संजीव खन्ना की बेंच ने महाराष्ट्र में राजनीतिक उलटफेर मामले में सुनवाई की. सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के बाद सभी पक्षों को नोटिस जारी किया है.

कोर्ट ने सभी पक्षों से विधायकों के समर्थन पत्र और राज्यपाल (Governor) से पूरे घटनाक्रमों पर रिपोर्ट मांगी है. अब सोमवार को सुबह 10:30 बजे इस मामले की अगली सुनवाई होगी. देखना यह है कि कोर्ट फ्लोर टेस्ट को लेकर क्या फैसला देता है? इस तरह के मामले में कोर्ट के दो फैसलों को याद किया जा रहा है. पहला, वर्ष 1994 का एसआर बोम्मई (SR Bommai Case) केस और दूसरा कर्नाटक में इसी साल बीएस येदियुरप्पा (B S Yeddyurappa) का मामला.

एसआर बोम्मई मामले में संविधान पीठ ने फ्लोर टेस्ट की अवधारणा पेश की थी.


क्‍या था 1994 में संविधान पीठ का ऐतिहासिक फैसला?

बता दें कि एसआर बोम्मई मामले में संविधान पीठ ने फ्लोर टेस्ट की अवधारणा पेश की थी.  एसआर बोम्मई मामला 1989 का है. एसआर बोम्मई अगस्त 1988 से अप्रैल 1989 के बीच जनता दल सरकार में कर्नाटक के मुख्यमंत्री थे. 1989 में राज्यपाल ने बहुमत खोने के आधार पर बोम्मई की सरकार को बर्खास्त कर दिया था और राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया. गवर्नर ने विधानसभा में बहुमत साबित करने का बोम्मई के आग्रह को भी खारिज कर दिया था. राज्यपाल के इस निर्णय के खिलाफ बोम्मई ने कर्नाटक हाईकोर्ट पहुंचे लेकिन वहां भी उनको निराशा हाथ लगी. हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी. इसके बाद बोम्मई ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. पांच साल तक चले सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संवैधानिक पीठ ने 11 मार्च 1994 को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसे आज भी याद किया जाता है.

सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने साफ किया कि राष्ट्रपति राज्य सरकार को बर्खास्त नहीं कर सकते. कोर्ट ने बोम्मई को दोबारा सरकार बनाने को कहा. कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रपति को राज्य सरकार को बर्खास्त करने का पूर्ण अधिकार नहीं है. राष्ट्रपति को अपनी शक्ति का उपयोग तभी करना चाहिए जब तक उनका शासन संसद के दोनों सदनों से मंजूर न हो जाए. पीठ का कहना था कि राज्यपाल विधानसभा को तभी भंग कर सकते हैं जब तक विधानसभा से संवैधानिक प्रावधानों को निलंबित न कर दिया जाए. अगर किसी सरकार का बहुमत साबित करना हो या सरकार से समर्थन वापस लेना हो इसके लिए विधानसभा में शक्ति परीक्षण एकमात्र तरीका है. पांच साल तक चले इस मामले को आज भी 'एस आर बोम्मई बनाम भारत सरकार' के तौर पर याद किया जाता है.

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येदियुरप्पा को विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए राज्यपाल ने 15 दिनों का वक्त दिया था. (फाइल फोटो)

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जबकि, कर्नाटक के ही एक और मामले में जब राज्यपाल ने येदियुरप्पा को विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए 15 दिनों का वक्त दिया था. उस वक्‍‍त सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल के फैसले को बदल कर 48 घंटे के अंदर यानी 19 मई 2018 की शाम चार बजे तक फ्लोर टेस्ट का वक्त दिया था. बीएस येदियुरप्पा ने 17 मई को सीएम पद की शपथ ली थी.

बता दें कि शनिवार सुबह बीजेपी (BJP) नेता और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस (Devendra Fadnavis) के मुख्यमंत्री पद और शरद पवार (Sharad Pawar) के भतीजे अजित पवार (Ajit Pawar) को डिप्टी सीएम पद की शपथ लेने के बाद से ही राज्य की राजनीति मे बवाल मचा हुआ है. राज्य में बीजेपी के सरकार गठन के बाद से ही एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार काफी एक्टिव हो गए हैं. राज्य की राजनीति में एनसीपी सुप्रीमो का लगातार एक्टिव होना और एक-एक कर अपने विधायकों को इकट्ठा करना महाराष्ट्र की राजनीति में चल रहे संग्राम की कहानी खुद बयां करता है.

क्‍यों कहते हैं संविधान के जानकार
संविधान और कानून के जानकारों का मानना है कि 24 घंटे के अंदर फ्लोर टेस्ट का आदेश देना संभव नहीं है. साथ संविधान विशेषज्ञों मानना है कि तुरंत बहुमत साबित करने का आदेश इसलिए भी नहीं दिया जा सकता, क्योंकि सबसे पहले प्रोटेम स्पीकर का चुनाव होगा. उसके बाद मैजूदा विधानसभा चुनाव में जीत कर आए सभी विधायकों को शपथ दिलाई जाएगी. इन दोनों संवैधानिक प्रक्रिया में कम से कम दो से तीन दिनों का वक्त लगेगा. इसके बाद नए विधानसभा का पहला सत्र भी बुलाना होगा, जिसके बाद ही फ्लोर टेस्ट संभव हो पाएगा.

जानकारों का मानना है कि 24 घंटे के अंदर फ्लोर टेस्ट का आदेश देना संभव नहीं है.


राज्यपाल के इस फैसले पर संविधान विशेषज्ञों ने अपनी-अपनी राय रखी है. देश के जाने-माने संविधान विशेषज्ञ (Constitutional Experts) और लोकसभा (Lok Sabha) के पूर्व महासचिव सीके जैन (CK Jain) न्यूज 18 हिंदी के साथ बातचीत में कहते हैं, 'राज्यपाल अमूमन तीन से 10 दिन के भीतर बहुमत साबित करने के लिए वक्त दे देते हैं. यह एक आदर्श स्थिति है, लेकिन संविधान में ऐसा स्पष्ट नहीं लिखा गया है कि राज्यपाल को एक बहुमत साबित करने के लिए एक निश्चित अवधि के दौरान ही वक्त देना होता है. यह राज्यपाल का विशेषाधिकार और स्वविवेक है कि वह 3 दिन का समय दे या फिर उससे ज्यादा का. महाराष्ट्र में अगर राज्यपाल ने फ्लोर टेस्ट के लिए समय नहीं दिया है तो विपक्षी पार्टियों को राज्यपाल से मिलकर सदन बुलाने के लिए कहना चाहिए.'

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First published: November 24, 2019, 3:09 PM IST
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