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OPINION: राष्ट्रपति शासन लगने से शिवसेना का होगा राजनीतिक पराभव

News18Hindi
Updated: November 12, 2019, 5:22 PM IST
OPINION: राष्ट्रपति शासन लगने से शिवसेना का होगा राजनीतिक पराभव
शिवसेना और कांग्रेस के बीच सहयोग कोई बहुत कोई नई बात नहीं है. (फाइल फोटो)

राष्ट्रपति शासन लगने पर सबसे बुरी गति शिवसेना (Shiv Sena) की होगी. बीजेपी (BJP) अपनी ताकत बढ़ाकर शिवसेना को दरकिनार करने की कोशिश करेगी.

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शीलेश शर्मा

महाराष्ट्र (Maharashtra) में राष्ट्रपति शासन (President's Rule) की स्थिति में शिवसेना (Shiv Sena) पर उत्तर भारत में प्रचलित एक कहावत सच साबित हो सकती है और कहा जाएगा कि शिवसेना न घर की हुई न घाट की. क्योंकि इधर बीजेपी (BJP) से उसका रिश्ता टूट गया, उधर राष्ट्रपति शासन लागू होने से राज्य में अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी की ही सत्ता कायम हो जाएगी. क्योंकि राज्य में राष्ट्रपति शासन का अर्थ यही है. तो ऐसी स्थिति में शिवसेना बहुत ही खराब दौर में पहुंच जाएगी. इससे शिवसेना का राजनीतिक पराभव ही होगा.

उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) ने कहीं कहा था कि शिवसेना ने तय कर लिया है कि वह अब बीजेपी की पालकी नहीं उठाएगी बल्कि खुद पालकी में बैठेगी. राष्ट्रपति शासन की हालत में निश्चित तौर पर ऐसी कोई स्थिति नहीं होगी. बल्कि बीजेपी एक बार राष्ट्रपति शासन के बाद पूरे प्रदेश में अपने जमीनी आधार को फिर से हासिल करने की कोशिश करेगी और पूरा प्रयास करेगी कि पार्टी नीचे तक इस तरह से मजबूत हो कि वो शिवसेना को किनारे कर सके. इसका बहुत कुछ प्रभाव एनसीपी (NCP) और कांग्रेस (Congress) पर नहीं पड़ेगा. बल्कि इन दोनों दलों को एक प्रकार से फायदा ही होगा. हां, निश्चित तौर पर यह शिवसेना के लिए एक बड़ा झटका होगा और भविष्य में उसे इसका राजनीतिक नुकसान भी होगा. ये नुकसान कुछ ऐसा होगा कि उसकी भरपाई कर पाना शिवसेना के लिए काफी कठिन होगा. मुझे लगता है कि इस तरह की स्थिति के बाद शिवसेना मुंबई और उसके इर्द-गिर्द सिमट कर ही रह जाएगी.

पहले भी शिवसेना से सहयोग ले चुकी है कांग्रेस 

अब कुछ लोग कह रहे हैं कि शिवसेना और कांग्रेस के मिलने पर एक अनहोली रिलेशनशिप यानी अपवित्र रिश्ता होगा. क्योंकि शिवसेना एक हिंदूवादी पार्टी के तौर पर पहचानी जाती है. साथ ही ये भी कहा जा रहा है कि शिवसेना के प्रमुख बाल ठाकरे ने कई मौकों पर सोनिया गांधी और राहुल गांधी की कई बार कड़ी आलोचना की थी, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि शिवसेना और कांग्रेस के बीच सहयोग कोई बहुत कोई नई बात नहीं होगी. बहुत से ऐसे अवसर आए हैं जब कांग्रेस ने शिवसेना का सहयोग लिया है. इसके उदाहरण के तौर पर याद दिलाना होगा कि जब कांग्रेस ने राष्ट्रपति के प्रत्याशी के रूप में प्रतिभा पाटिल का चयन किया तो उस समय शिवसेना ने बीजेपी का विरोध करके प्रतिभा पाटिल को अपना समर्थन दिया.

शिवसेना ने प्रणब मुखर्जी को भी दिया था समर्थन
उसके बाद प्रणब मुखर्जी के समय में भी बीजेपी के उम्मीदवार पीए संगमा का समर्थन ना करके प्रणब मुखर्जी का समर्थन किया था. प्रणव मुखर्जी ने अपनी किताब में लिखा है कि सोनिया गांधी ने बालासाहेब ठाकरे से मिलने से इनकार किया था, ''लेकिन मैंने इसकी परवाह न करते हुए यह तय किया कि जो पार्टी उनका समर्थन कर रही है खासतौर से अपने पुराने सहयोगी के उम्मीदवार को छोड़कर, उसके प्रमुख से जाकर मिलना ही चाहिए.'' उसके बाद मुखर्जी जाकर शिवसेना प्रमुख से मिले थे. इस घटना के पहले जब एआर अंतुले महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने थे तब भी शिवसेना ने उनका समर्थन किया था. महाराष्ट्र की ऐसी बहुत सी नगरपालिकाएं और निकाय हैं जहां चेयरमैन के चुनाव में शिवसेना और कांग्रेस के बीच सहयोग होता रहा है. इस तरह के कई मौके आए हैं जब कांग्रेस और शिवसेना के बीच राजनीतिक तालमेल हुए हैं और उसके जरिए अपने प्रत्याशियों को जिताने में कामयाब हुए हैं.शिवसेना को लेकर कांग्रेस के अंदर विरोधाभास
अगर इस मामले में कांग्रेस की बात की जाए तो एनसीपी और शिवसेना को मिलाकर सरकार बनाने पर कांग्रेस के अंदर बहुत आंतरिक विरोधाभास है. कांग्रेस में एके एंटोनी, वेणुगोपाल और गुलाम नबी आजाद जैसे नेता शिवसेना के साथ किसी तरह के संबंध रखने का विरोध कर रहे हैं. इसके लिए वे तर्क दे रहे हैं कि केरल में जब पार्टी चुनाव के लिए जाएगी तो बीजेपी का मुकाबला कैसे किया जाएगा. क्योंकि हिंदूवादी पार्टी माने जाने वाली शिवसेना से उसका तालमेल होगा. केरल में उसे गैरहिंदुओं के वोट भी चाहिए. इस लिहाज से केरल की राजनीति से जुड़े केंद्रीय नेता और प्रदेश इकाई दोनों इसके विरोध में हैं. जबकि अहमद पटेल और खड़गे जैसे नेता दलील दे रहे हैं कि बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के लिए किसी छोटी बुराई से संबंध बनाया जा सकता है. यानी कि शिवसेना का समर्थन करके बीजेपी को सत्ता से दूर रखा जाए. ऐसे नेताओं का मानना है कि यह एक ऐसा अवसर है जब कांग्रेस बीजेपी की राजनीति को विफल कर सकती है.

विधायकों को टूटने से बचाने के लिए कांग्रेस ने अपने विधायकों को जयपुर में रखा है. मेरी जानकारी के मुताबिक कांग्रेस के 30 विधायकों ने कहा है कि अगर महाराष्ट्र में साझा सरकार का गठन नहीं कराया जाता है तो वे विद्रोह कर देंगे और एनसीपी में शामिल हो जाएंगे. कांग्रेस चेतावनी को लेकर गंभीर है. कार्यसमिति की बैठक में भी यह मुद्दा उठ चुका है. पता चला है कि बैठक में एंटोनी और वेणुगोपाल ने शिवसेना को समर्थन न देने की बात की जबकि खड़गे ने साफ तौर पर कहा कि अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो कांग्रेस टूट सकती है.

(शीलेश शर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं और महाराष्ट्र  पर बारीक  नजर रखते हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)

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First published: November 12, 2019, 4:12 PM IST
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