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शिवसेना और कांग्रेस के गठबंधन से क्या बदल गया है सांप्रदायिकता का मुद्दा?

News18Hindi
Updated: November 30, 2019, 1:22 PM IST
शिवसेना और कांग्रेस के गठबंधन से क्या बदल गया है सांप्रदायिकता का मुद्दा?
उद्धव ठाकरे, शरद पवार और सोनिया गांधी (फाइल फोटो)

महाराष्ट्र (Maharashtra) में शिवसेना और कांग्रेस के गठबंधन के बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या सांप्रदायिकता का मुद्दा अब बदल गया? क्योंकि 2019 के लोकसभा चुनावों तक सेक्युलर बनाम गैर सेक्युलर का विवाद चलता रहा है.

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  • Last Updated: November 30, 2019, 1:22 PM IST
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एक बहुत ही पतली रेखा थी. कौन सांप्रदायिक है, कौन सेक्युलर. बीजेपी-शिवसेना जैसी कट्टर हिंदुत्व की बात करने वाली पार्टियां राजनीति में अब तक अछूत रहीं हैं. एक अरसे से कांग्रेस हो या फिर समाजवाद का धारा बुलंद करने वाली पार्टियां, सबने एक वोट बैंक बनाया था. जिसमें सेक्युलर शब्द खासा मायने रखता था. 2019 के लोकसभा चुनावों तक सेक्युलर बनाम गैर सेक्युलर का विवाद चलता रहा. लेकिन बीजेपी आगे बढ़ती गई. सोनिया गांधी, राहुल गांधी, लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, ममता बैनर्जी, चंद्रबाबू नायडू, देवगौड़ा देशभर में ऐसी लंबी लिस्ट है जिन्होंने सेक्युलरिज्म के नाम पर लंबा राज किया.

केरल में कांग्रेस मुस्लिम लीग के साथ चुनावी समझौता करती आयी थी. सवाल उठते थे लेकिन कांग्रेस के सेक्युलर होने पर सवाल नहीं उठते थे. कांग्रेस ने सेक्युलर होने का अपना झंडा बुलंद रखा. बीजेपी का गठबंधन बढ़ा तो कांग्रेस समेत तमाम दलों ने आगाह किया कि सांप्रदायिक ताकतों से साथ वो नहीं जुड़े.  अब कांग्रेस खुद ही खुलकर मैदान में आ गयी है. जिस पार्टी के साथ मंच साझा करने में मुश्किल होती थी, उसी शिवसेना के साथ हाथ मिलाकर महाराष्ट्र सरकार में शामिल हो गयी. महाराष्ट्र में बने नए गठबंधन ने इस लकीर को मिटा दिया. अब ये कहने से गुरेज नहीं कर सकते हैं सेक्युलरिज्म और गैर सेक्युलर को बांटने वाली पतली रेखा अब खत्म हो गयी.

इतिहास के पन्नों का हिस्सा बना सेक्युलर शब्द
राम मंदिर पर कोर्ट का फैसला और धारा 370 समाप्त कर बीजेपी ने कट्टरवाद के विवाद को भी हमेशा के लिए खत्म कर दिया है. हिंदुत्व और कट्टर हिंदुत्व की बात करने वाली शिवसेना को समर्थन देकर सोनिया गांधी और शरद पवार ने साफ कर दिया है कि राजनीति अब सत्ता पाने लिए ही होगी और साफ ये भी है कि अब सेक्युलर शब्द इतिहास के पन्नों का हिस्सा बन जाएगा.

अब बात करते हैं महाराष्ट्र के चारों बड़े खिलाड़ियों की. इस खेल में किसने क्या खोया और किसने क्या पाया.

उद्धव ठाकरे-शरद पवार ने शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी विधायको ंकी कराई परेड


बीजेपी ने क्या खोया क्या पाया?
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अपने दम पर बहुमत लाने का दावा करने वाली बीजेपी को पहला झटका तब लगा, जब वो 103 सीट पर ही सिमट कर रह गई. फिर शिवसेना ने झटका दिया जब वो मुख्यमंत्री के लिए अड़ गए और बीजेपी पर वादे से मुकरने का आरोप लगा दिया. फिर अजीत पवार के साथ सरकार बनाने का शो भी प्लॉप हो गया. चलो ठीक है कि सहयोगी ने झटका दे दिया, लेकिन सबक नंबर-1 ये है कि राजनीति मे जल्दबाजी और गलत आंकलन नहीं करना चाहिए. दूसरा सबक ये कि अपने प्रभारियों और राज्य में अपने नेताओं के आंकलन के अलावा भी अपने तार चारों ओर ठीक से जोड़े रखने चाहिए. यानि जनमानस और राजनीति का मिजाज भांपने के तरीकों में भी बदलाव जरुरी है. जब पार्टी के भीतर भी एक के बाद एक नेता नाराज हो रहे थे और मराठा बनाम गैर मराठा का राग जब शरद पवार ने अलापा, तब भी आलाकमान को चेताने राज्य से कोई नहीं आया. तीसरा सबक ये कि धारा 370 और राम मंदिर जैसे मुद्दे रिमोट इलाकों में नहीं चले. शीर्ष सूत्रों ने दावा किया कि कहीं कोई झटका नहीं लगा है और ना ही किसी ने कोई धोखा दिया है. बल्कि ये उम्मीद भी जतायी गयी है कि बातें सकारात्मक दिशा की ओर बढ़ रही है. आलाकमान तमाम घटनाक्रम से वाकिफ है और जल्दी ही तमाम कमियों को दूर कर लेगा.

कांग्रेस ने क्या खोया क्या पाया?
जब शिवसेना के साथ सरकार बनाने की कवायद शुरु हुई थी तब सोनिया गांधी ने अपने नेताओं को चेताया था कि कोई एडवेंचर ना करें. लेकिन बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने की चाह ने उन्हें अपनी विचारधारा तक से समझौता करने को मजबूर कर दिया. कांग्रेस भूल गयी की शिवसेना ने सावरकर को भारत रत्न देने की मांग की है. कांग्रेस ये भूल गयी कि गोड़से को शिवसेना देश भक्त बताती थी. कांग्रेस को ये भी याद नहीं रहा कि शिवसेना 6 दिसंबर को अयोध्या के मसले पर जश्न मनाती है. ये बात और है कि प्रतीभा पाटिल को समर्थन देने के मसले पर हो या फिर कलाम का विरोध करने के मसले पर शिवसेना उनसे मिलकर आगे बढ़ती रही. शिवसेना को उत्तर भारतीयों के खिलाफ हिंसा के लिए कांग्रेस ने हमेशा निशाने पर रखा है. लेकिन अब कुछ याद नहीं है. शिवसेना अब उन्हें कट्टर नजर नहीं आ रही. समाजवादियों ने तो बीजपी का हाथ थाम कर सेक्युलरिज्म की परिभाषा बदल दी थी. लेकिन अब कांग्रेस ने जो झंडा बुलंद किया है अब तो ये विवाद खड़ा करने के लिए कोई भी पार्टी नहीं बची. साफ ये भी नहीं है कि कांग्रेस अपने तमिलनाडू, केरल और कर्नाटक के वोटरों को क्या सफाई देगी. वैसे भी सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मनमोहन सिंह ने मुंबई ना जाकर ये साफ कर दिया है कि वो मंच साझा नहीं करेंगे. यानि विवाद हुआ तो कम से कम पल्ला झाड़ कर खड़े तो वे हो ही जाएंगे. देखें कब तक शिवसेना खामोश रह पाती है और कांग्रेस के सब्र का बांध कब टूटता है.

शिवसेना- क्या खोया क्या पाया?
शिवसेना ने जिद पकड़ी और महाराष्ट्र की सत्ता तो पा ली. लेकिन इसके लिए उन्हें अपना रंग बदलना पड़ा है. बीजेपी के साथ वो एक ऐजेंडा और एक विचारधारा पर चलते थे. सबसे पुराने सहयोगी भी रहे. लेकिन पूरे महाराष्ट्र में बीजेपी के बढ़ते असर ने उन्हें चौंकन्ना जरूर कर दिया. उन्हें लग रहा था कि कहीं उनकी राजनीति मुंबई से ठाणे के बीच सिमट ना जाए. ऐसे में राजनीतिक दुश्मनों का हाथ भी थामना पड़ा. कम से कम अपने कोर ऐजेंडा हिदुत्व से उन्हें दूर रहना पड़ेगा. कांग्रेस के साथ बनी कोई भी सरकार देश में अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई है, ऐसे में उन्हें हर कदम फूंक-फूंककर रखना होगा. बीजेपी अब पूरे राज्य में हिंदुत्व की अकेली पुरोधा बनकर उभरेगी. इसे संभालना शिवसेना के लिए मुश्किल होगा. क्योंकि दोनों का वोट बैंक यही है. कांग्रेस और एनसीपी की पूरी कोशिश रहेगी कि शिवसेना को और बढ़ने ना दे. इसलिए पार्टी का विस्तार चिंता का विषय तो रहेगा ही. कुल मिलाकर इस जंग में वो अकेले ही फंसे नजर आ रहे हैं.

एनसीपी- क्या खोया क्या पाया?
कुल मिलाकर शरद पवार एक मजबूत स्तंभ बन कर उभरे हैं. सवाल उठने लगे थे कि शरद पवार के बाद कौन एनसीपी के नेता होंगे. ऐसे में वो किंग मेकर के रूप में उभरे. भतीजे अजित पवार को शांति से पटरी पर लाए. बेटी सुप्रीया सुले को अघोषित उत्तराधिकारी बना दिया. माराठा वोट बैंक वापस खींचा और महाराष्ट्र में सत्ता की चाभी अपने पास रख ली. साथ ही ये भी संदेश दे दिया कि बीजेपी आलाकमान की चालों का तोड़ भी वो जानते हैं. जवाब देना कांग्रेस और शिवसेना को भारी पड़ेगा, लेकिन फिलहाल एनसीपी की तो चल निकली है. लेकिन मुश्किल ये है कि अजित पवार शांति से मान भले ही गए हों, लेकिन मंत्रीमंडल के गठन और हाशिए पर भेजे जाने की स्थिति में कितने शांत रहेंगे ये अभी साफ नहीं है. तभी तो उपमुख्यमंत्री और मंत्रीमंडल का विस्तार रोक दिया है. संकेत हैं कि ये अब सदन में बहुमत परीक्षण के बाद ही होगा. साथ ही उनकी पार्टी के आला नेताओं पर चल रहे भ्रष्टचार के मामलों पर आगे क्या होगा ये भी साफ नहीं है.

जाहिर है मंथन जारी रहेगा और किसके हाथ विष लगता है और किसके हाथ अमृत ये साफ होने में देर नहीं लगेगी.

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First published: November 30, 2019, 1:19 PM IST
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