भारत की सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती धारावी ने जगाई कोरोना के खिलाफ आशा की किरण
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भारत की सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती धारावी ने जगाई कोरोना के खिलाफ आशा की किरण
मामलों में आई गिरावट ने झुग्गीवासियों और सरकार दोनों को राहत दी है.

मुंबई के धारावी (Dharavi) में कोरोना वायरस (Coronavirus) फैलने की वजह से प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए थे. लेकिन स्वास्थ्य अधिकारियों की दो महीने की लगातार मेहनत अब रंग दिखाने लगी है.

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मुंबई. दुनिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती में शुमार मुंबई (Mumbai) के धारावी (Dharavi) में कोरोना वायरस (Coronavirus) के  खिलाफ एक आशा की किरण जगी है. करीब 5000 लोगों, जिनमें डॉक्टर, नर्स, मुनसिपैलिटी कर्मचारी और वॉलंटियर शामिल हैं, की बीते दो महीने की मेहनत रंग लाती दिखने लगी है. इन सभी का बस एक मकसद कोरोना का हॉटस्पॉट बने धारावी को सामान्य स्थिति में लाना है. और धीमी ही सही लेकिन अब सफलता नजदीक आने लगी है.

मई में तेजी से आए मामले
धारावी में उस वक्त खलबली मच गई थी, जब मई महीने में तकरीबन 1,400 मामले सामने आए. अप्रैल में आए मामलों के मुकाबले यह आंकड़ा 380 प्रतिशत ज्यादा था. हिंदुस्तान टाइम्स में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, धारावी में मई महीने में जहां आने वाले नए मामलों की दर 47 थी. वहीं जून में घटकर यह 27 रह गई. वर्ली धारावी में संक्रमण दर क्रमशः घटकर 1.9 प्रतिशत और 1.7 प्रतिशत हो गई है. यह दर यहां पर कोरोना संक्रमण की शुरुआत से लेकर अब तक सबसे कम है.

अप्रैल में 369 कोरोना (coronavirus) संक्रमण के मामले धारावी में सामने आए तो यह आंकड़ा मई आखिर तक बढ़कर 1,771 हो गया. पूरे शहर में कुल मामलों में सिर्फ 4.4 प्रतिशत केवल धारावी के ही थे. धारावी में न केवल कोविड संक्रमण के सबसे ज्यादा मामले सामने आए, बल्कि मई आखिर तक यहां कोरोना ने 70 लोगों की जान भी ली, जबकि अप्रैल में मौतों का यह आंकड़ा 18 था.
व्यापक प्रयास हैं सफलता की असली वजह


इसके बाद ही बीएमसी ने तेजी के साथ कार्रवाई शुरू की और तेज रफ्तार टेस्टिंग के साथ लोगों को आइसोलेट करना शुरू किया गया. बीएमसी के मुताबिक बीते दो महीने के दौरान इलाके में साढ़े छह लाख लोगों की स्क्रीनिंग की जा चुकी है. बीएमसी के एक अधिकारी के मुताबिक-हमारी क्लीनिक्स, मोबाइल डिस्पेंसरी और डोर टू डोर सर्वे लगातार जारी है. इससे हमें उन लोगों तक पहुंचने में मदद मिली जिन पर कोरोना का संकट मंडरा रहा था. सबसे बड़ी मुश्किल ये थी कि हमें ऐसे लोगों को समझाना था जो बहुत-पढ़े लिखे और जागरूक नहीं हैं. हमने इसे अपनी जिम्मेदारी समझी और व्यापक स्तर पर लोगों को जागरूक किया गया. हम लोगों को योग करवा रहे हैं. उन्हें खुश रहने के तरीके बूात रहे हैं. हम चाहते हैं कि वो लॉकडाउन के दौरान सामान्य महसूस करें और घबराएं नहीं. हम लोगों ने अब कोरोना के मामलों में कमी करनी शुरू कर दी है. अब हमारी कोशिश रंग दिखाने लगी है.

(राधिका रामास्वामी की स्टोरी से इनपुट के साथ)

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