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बाला साहब ठाकरे की दोस्ती का कर्ज उतारना भूल गए शरद पवार, ये है कहानी

News18Hindi
Updated: October 24, 2019, 6:13 PM IST
बाला साहब ठाकरे की दोस्ती का कर्ज उतारना भूल गए शरद पवार, ये है कहानी
शिवसेना ने सुप्रिया सुले खिलाफ कोई उम्मीदवार खड़ा नहीं किया था

राजनीति में ऐसा कम होता है कि लोग दुश्मनी भूल जाएं, लेकिन ये अक्सर होता है कि लोग अच्छी बातें और अहसान भूल जाते हैं. ऐसा यहां भी हुआ, ये और बात है कि यहां उसकी उम्मीद कम थी. इस कहानी के अहम किरदारों में शामिल थे बाला साहब ठाकरे (Bala sahab Thackeray) और एनसीपी (NCP) सुप्रीमो शरद पवार (Sharad Pawar).

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  • Last Updated: October 24, 2019, 6:13 PM IST
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नई दिल्ली. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) चीफ शरद पवार (NCP Chief Sharad Pawar) के पास 13 साल बाद शिवसेना (Shiv Sena) के संस्थापक बाला साहब ठाकरे (Bal Thackeray) का कर्ज़ उतारने का मौका आया था. लेकिन कहते हैं कि राजनीति (Politics) में न कोई दोस्त होता है और न दुश्मन. हर कोई अहसान भूलने की जल्दबाज़ी में होता है. शरद पवार भी बाला साहब ठाकरे की दोस्ती का कर्ज़ भूल गए और वो एक भूल कर गए, जिसका उन्हें कभी भविष्य में मलाल हो सकता है.

ठाकरे परिवार का पहला चुनाव
दरअसल, बाला साहब ठाकरे के पोते आदित्य ठाकरे वर्ली सीट से चुनाव मैदान में उतरे. ठाकरे परिवार की तरफ से पहली दफे किसी सदस्य ने चुनाव लड़ा. आदित्य ठाकरे की जीत सुनिश्चित करने के लिए उनके चाचा राज ठाकरे ने अपनी पार्टी मनसे की तरफ से कोई भी उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारा. ऐसी ही उम्मीद एनसीपी से भी की जा रही थी कि शायद वर्ली सीट से एनसीपी अपना कोई उम्मीदवार नहीं खड़ा करेगी. लेकिन इस बार वर्ली से आखिरी मौके पर एनसीपी ने वकील सुरेश माने को मैदान में उतार दिया. पवार ने एक बार भी नहीं सोचा कि अपने नाती की उम्र के शिवसेना उम्मीदवार आदित्य ठाकरे के खिलाफ कोई उम्मीदवार न उतारा जाए क्योंकि इसके पीछे की एक कहानी के वो गवाह रहे हैं.

ये है सुप्रिया सुले के पहले चुनाव की कहानी

दरअसल, साल 2006 में भी राजनीतिक हालात कुछ ऐसे ही थे. उस वक्त एनसीपी की तरफ से शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले पहली बार राज्यसभा का चुनाव लड़ी थीं. तब बाला साहब ठाकरे ने सुप्रिया सुले खिलाफ कोई उम्मीदवार खड़ा नहीं किया था. ठाकरे का कहना था कि ये गर्व की बात है कि महाराष्ट्र की बेटी दिल्ली जा रही है. ठाकरे ने इस तरह से राजनीति की उस स्वस्थ परंपरा का निर्वहन किया था जो कि आज के दौर में बहुत कम दिखाई देती है. लेकिन एनसीपी बाला साहब ठाकरे की उस भावनात्मक पहल को भूल गई. पवार के पास 13 साल बाद राजनीतिक हालातों के चलते एक मौका आया था जिससे वो एक नज़ीर पेश कर सकते थे. लेकिन ऐसा हो न सका. आज यदि बाला साहब होते तो उन्हें शरद पवार के इस फैसले से थोड़ा दुख तो ज़रूर होता.

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First published: October 24, 2019, 5:46 PM IST
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