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सरकार ने रात में पेड़ों को काटकर किया पाप, देना पड़ेगा हिसाब : शिवसेना

News18India
Updated: October 7, 2019, 12:26 PM IST
सरकार ने रात में पेड़ों को काटकर किया पाप, देना पड़ेगा हिसाब : शिवसेना
शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना में आरे कॉलोनी में पेड़ कटाई पर लेख लिखा है. (फाइल फोटो)

शिवसेना (Shiv Sena) ने अपने मुखपत्र 'सामना' (Saamana) में एक संपादकीय (Editorial) लिखा है, जिसमें आरे कॉलोनी (Aarey Colony) में पेड़ों की कटाई के लिए सरकार (Government) और न्यायलय (Court)पर सवाल उठाया है.

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  • Last Updated: October 7, 2019, 12:26 PM IST
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मुंबई. आरे कॉलोनी (Aarey Colony) में पेड़ों को काटने के मामले में शिवसेना (Shiv Sena) ने अपने मुखपत्र 'सामना' (Saamana) में एक संपादकीय लिखा है. इसमें महाराष्ट्र सरकार (Maharashtra Government) और न्यायालय (Court) पर जमकर निशाना साधा है. शिनसेना ने अपने संपादकीय में लिखा, 'सरकार ने रात के अंधेरे में पेड़ों को काटकर पाप किया है, उसे इसका हिसाब देना पड़ेगा'

शिवसेना ने लिखा कि पेड़ (Tree) मूक हैं लेकिन पेड़ों के लिए प्रदर्शन करनेवाले सैकड़ों लोग मूक नहीं हैं. लोगों का आक्रोश न्यायालय (Court) तक पहुंचा इसके बावजूद एक प्रकार की शून्यता देखने को मिली. संपादकीय में लिखा कि पेड़ों को वोट देने का अधिकार नहीं है तो क्या उनको काट देना चाहिए.

कविता के माध्यम से साधा निशाना
शिवसेना (Shiv Sena) ने संपाकीय (Editorial) में लिखा, ‘मेरा घर मेरे लिए ही दुखदायी हो गया’, यह एक कविता की पंक्ति है. इसमें बताया गया कि दरिद्रता के कारण अपना घर दुखदायी हो जाता है. वैसे ही मुंबई में आरे का जंगल दुखदायी हो गया है क्योंकि वो विकास के आड़े आ रहा है. इसमें बताया कि घर दुखदायी होने पर उसे कोई जलाता नहीं, लेकिन आरे के जंगल को नष्ट किया जा रहा है.

न्यायालय के आदेश पर उठाये सवाल
सामना (Saamana) में संपादकीय (Editorial) में लिखा, 'न्यायालय ने पेड़ों को काटने का आदेश दिया. वहींं न्यायालय (Court) के आदेश की स्याही सूखने से पहले ही सरकार ने पेड़ों का कत्ल शुरू कर दिया. रात के अंधेरे में आरे को श्मशान कर दिया. जैसे न्यायालय का क्या निर्णय आएगा, ये इन्हें पहले से ही पता हो. गोरेगांव (Goregaon) के आरे कॉलोनी में मेट्रो कारशेड (Metro Carshed) के लिए 2647 पेड़ काटे जाने हैं.

न्यायालय का आदेश जिस शाम आया, उसी रात में 1,500 पेड़ काट दिये गये. लोगों ने इसका विरोध किया तो धारा-144 लागू कर विरोधियों को जेल में डाल दिया गया. यह कानून का राज है क्या? 100 अपराधी छूटें तब भी चलेगा, लेकिन एक भी निरपराध को सजा नहीं होनी चाहिए, ऐसा हमारे कानून का सिद्धांत है लेकिन पेड़ों को बोलना नहीं आता है. न्यायालय के दरवाजे पर खड़ा रहना नहीं आता है.
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पेड़ वोट नहीं दे सकते तो उनकी हत्या करोगे क्या
संपादकीय में लिखा कि पेड़ों को वोट देने का अधिकार नहीं है तो क्या इसलिए उनके कत्ल का आदेश दे देना चाहिए? ये कैसा न्याय है! आमतौर पर संवेदनशीलता दिखानेवाला हमारा न्यायालय 2500 पेड़ों की हत्या पर गूंगा-बहरा बनकर देख रहा है. यही नहीं, उन्हें जड़ से उखाड़ फेंको, ऐसा आदेश देता है. ऐसा कृत्य न्याय व्यवस्था के दायरे में बैठकर किया गया.

सरकार पर साधा निशाना
आरे का जंगल बचाने के लिए आंदोलन किसी यूरोपियन देश, अमेरिका में हुआ होता तो इसके लिए हमारी कितनी प्रशंसा हुई होती. विदेश में किसी जंगल में आग लगती है तो आग के चटके से लोगों को रोना आता है लेकिन हमारी आंखों के सामने ही पूरा जंगल काटा जा रहा है, उसके लिए ना तो प्रधानमंत्री को रोना आया और ना ही मुख्यमंत्री परेशान हुए. भाजपा और संघ परिवार में भी पर्यावरण के लिए काम करनेवाले कई लोग हैं. विभिन्न सामाजिक और पर्यावरण संबंधी कार्यों में वे अग्रसर रहते हैं. ऐसे कार्यों में निडरता से हिस्सा लेते हैं लेकिन मुंबई की प्राण वायु कही जानेवाली सबसे बड़ी जमीन उखाड़ी जा रही है, ऐसे समय में ये लोग मौन रहे.

(रिपोर्ट- रमाकांत)

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First published: October 7, 2019, 10:33 AM IST
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