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RSS से प्रभावित डॉक्टर धनंजय को मिला पद्मश्री, मसीहा मानते हैं कि केरल के वायनाड जिले के आदिवासी

डॉ. धनंजय को इस पद्मश्री पुरस्कार के लिए चुना गया है. (तस्वीर-twitter-TomVadakkan2)
डॉ. धनंजय को इस पद्मश्री पुरस्कार के लिए चुना गया है. (तस्वीर-twitter-TomVadakkan2)

चालीस साल पहले एमबीबीएस करने के बाद 24 की उम्र में ही धनंजय (Dr. Dhananjay Diwakar Sagdeo) ने ठाना था कि वो गरीब आदिवासियों की सेवा करेंगे. इसके लिए उन्होंने केरल के वायनाड इलाके को चुना जहां राज्य की सबसे ज्यादा आदिवासी आबादी रहती है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 28, 2021, 8:59 PM IST
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मुंबई. चिकित्सा के पेशे में मानव सेवा को सर्वोपरि माना गया है. हम अक्सर ऐसे चिकित्सकों के बारे में पढ़ते हैं जिन्होंने मानव सेवा में अपना जीवन लगा दिया है. ऐसे ही एक डॉक्टर हैं नागपुर के रहने वाले डॉ. धनंजय दिवाकर सग्देव (Dr. Dhananjay Diwakar Sagdeo). तकरीबन चालीस पहले एमबीबीएस करने के बाद 24 की उम्र में ही धनंजय ने ठाना था कि वो गरीब आदिवासियों की सेवा करेंगे. इसके लिए उन्होंने केरल के वायनाड इलाके को चुना जहां राज्य की सबसे ज्यादा आदिवासी आबादी रहती है. डॉ. धनंजय को इस साल उनकी सेवाओं के लिए पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया है.

'जो कुछ मैंने सीखा है वो सब कुछ वायनाड के आदिवासियों की सेवा में इस्तेमाल करूंगा'
टाइम्स इंडिया में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक धनंजय बताते हैं- 'मैं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से प्रभावित था. मुझे वायनाड के मुत्तिल में स्वामी विवेकानंद मेडिकल मिशन द्वारा चलाए जा रहे छोटे से अस्पताल के बारे में जानकारी मिली. तभी मैंने तय कर लिया था कि जो कुछ मैंने सीखा है वो सब कुछ वायनाड के आदिवासियों की सेवा में इस्तेमाल करूंगा.'


लोगों को आधुनिक चिकित्सा पद्धति पर भरोसा दिलाने का चैलेंज


गौरतलब है कि वायनाड जिले को अब भी हेल्थ केयर सुविधाओं के मामले में काफी कमजोर माना जाता है. 1980 में जब धनंजय ने अपने करियर की शुरुआत की तब यहां नाममात्र के अस्पताल थे. धनंजय बताते हैं कि शुरुआत में गरीबी और कुपोषण के अलावा ये बात भी चैलेंज थी कि लोगों को आधुनिक चिकित्सा पद्धति पर भरोसा कैसे दिलाया जाए. इसके बाद हमने मोबाइल मेडिकल केयर यूनिट शुरू कीं. लोगों की परेशानियां उनके बीच जाकर सुनना शुरू किया और उनका इलाज किया. जब लोगों को भरोसा हुआ तो वो खुद अस्पताल आने लगे और दवाएं लेना शुरू कीं.

सिकल सेल एनिमिया बीमारी पर विशेष काम
डॉ. धनंजय का सबसे बड़ा योगदान जिले में सिकल सेल एनिमिया बीमारी पर किए गए काम को माना जाता है. यह बीमारी मुख्य रूप से इस जिले के आदिवासी लोगों में प्रभावी है. उन्होंने इस बीमारी पर काम किया और इसके बाद एम्स दिल्ली की टीम ने चार सालों तक जिले में इस पर स्टडी की.

आदिवासी उन्हें बेहद सम्मान की दृष्टि से देखते हैं
64 वर्षीय डॉ. धनंजय इस वक्त स्वामी विवेकानंद मिशन के चीफ मेडिकल ऑफिसर हैं. ये मिशन हजारों आदिवासी लोगों को फ्री में दवा सप्लाई करता है. धनंजय आदिवासियों का इलाज करने के लिए मीलों पैदल सफर करते रहे हैं. उन्होंने आम लोगों को दिक्कतें समझने के लिए मलयालम सीखी. साथ ही एक स्थानीय बोली पनिया भी उन्हें अच्छी तरह से आती है. धनंजय की चालीस वर्षों की अथक मेहनत के कारण जिले के आदिवासी उन्हें बेहद सम्मान की दृष्टि से देखते हैं.
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