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कहीं इन आंकड़ों में तो नहीं छुपा है शिवसेना की बेचैनी का राज

Afsar Ahmad | News18Hindi
Updated: November 6, 2019, 6:47 PM IST
कहीं इन आंकड़ों में तो नहीं छुपा है शिवसेना की बेचैनी का राज
बीजेपी से सालों की दोस्ती भी कुर्बान करने को तैयार क्यों है शिवसेना

हिंदुत्व (Hindutva) के नाम पर बीजेपी (BJP) से अटूट गठबंधन की बात करने वाली शिवसेना (Shiv Sena) की तकलीफ दरअसल महाराष्ट्र (Maharashtra) में उसकी राजनीतिक जमीन लगातार सिकुड़ते जाने को लेकर है.

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  • Last Updated: November 6, 2019, 6:47 PM IST
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नई दिल्ली. बीते 24 अक्टूबर को महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव (Maharashtra Assembly Election 2019) के नतीजे आने के बाद तस्वीर लगभग साफ हो चुकी थी. बीजेपी-शिवसेना महायुति (BJP Shiv Sena alliance) को स्पष्ट जनादेश (Clear Majority) मिल चुका था. मंच तैयार था और देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री पद (CM) की शपथ लने की औपचारिकता भर पूरी करनी थी, पर जरा रुकिए... ये सिर्फ एक तय स्क्रिप्ट भर थी. हकीकत में ऐसा हुआ नहीं. परिणाम आने के बाद से लगातार शिवसेना (Shiv sena) और बीजेपी (BJP) एक-दूसरे को आंखें तरेर रहे हैं. महाराष्ट्र (Maharashtra) का राजनीतिक मंच धीरे-धीरे टी-ट्वेंटी (T20) का हंगामेदार मैदान बन गया. शिवसेना नेता संजय राउत (Sanjay Raut) बीजेपी के हर राजनीतिक बाउंसर का जवाब सिक्सर लगा कर दे रहे हैं. यानी कोई नरमी नहीं, आखिर बात कहां बिगड़ी, जो शिवसेना इस बार बीजेपी से दशकों पुरानी अपनी दोस्ती को तिलांजलि देने को तत्पर नजर आ रही है.

भूमिकाएं कब बदलीं
इसे समझने के लिए हमें नब्बे के दौर में जाना होगा, जब महाराष्ट्र में बड़ा भाई शिवसेना हुआ करती थी और बीजेपी छोटा भाई हुआ करती थी, लेकिन समय बदलने के साथ ही दोनों की भूमिकाएं भी बदल गईं. 2014 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी शिवसेना के बीच कोई गठबंधन नहीं हो सका. बीजेपी अपने दम पर बहुमत तो नहीं लेकिन 122 जैसी अच्छी खासी संख्या लाने में कामयाब जरूर हो गई. शिवसेना का दबाव काम नहीं आया और बीजेपी ने राज्य में सरकार बना ली. ये बात और है कि बीजेपी के साथ शिवसेना बाद में सरकार में शामिल हो गई. शिवसेना को बीजेपी की बदलती स्थिति कभी नहीं भायी. यही कारण है कि शिवसेना पिछले पांच साल बीजेपी के साथ यहां सरकार में तो रही है लेकिन उसने बीजेपी को नीचा दिखाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी. फिर चाहे अपने अखबार सामना के जरिए सरकार की नीतियों पर तीखे व्यंग्य बाण छोड़ना हो या फिर उद्धव का अयोध्या पहुंच जाना.

(न्यूज़ 18 ग्राफिक्स)


शिवसेना का सिकुड़ना
हिंदुत्व के नाम पर बीजेपी से अटूट गठबंधन की बात करने वाली शिवसेना की तकलीफ दरअसल महाराष्ट्र में उसकी राजनीतिक जमीन लगातार सिकुड़ते जाने को लेकर है. शिवसेना को अंदरखाने यह लगता है कि अगर वो बीजेपी के लिए ज्यादा जमीन इसी तरह छोड़ती रहेगी को उसका अस्तिव ही कहीं खतरे में न पड़ जाए. बीजेपी और शिवसेना का वोटबैंक भी लगभग एक जैसा है. शिवसेना वर्तमान में जहां मुंबई के आसपास ज्यादा प्रभावी है और मराठा वोटबैंक पर ज्यादा भरोसा करती है. वहीं बीजेपी ने पूरे महाराष्ट्र में अपनी पकड़ बना ली है जो न सिर्फ शिवसेना बल्कि एनसीपी और कांग्रेस के लिए भी तकलीफदेह है.

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बीजेपी और शिवसेना की इस दोस्ती ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं (फाइल फोटो)

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यूं ही बेचैन नहीं है शिवसेना
दरअसल बीजेपी से 'दोस्ती' के पिछले कुछ साल ये साफ कर देते हैं कि शिवसेना यूं ही बेचैन नहीं है. वर्ष 1995 में शिवसेना ने बीजेपी से ज्यादा सीटें लाकर अपना मुख्यमंत्री बनाया था, लेकिन 2014 तक आते आते शिवसेना अपना कोई खास विस्तार नहीं कर सकी. जबकि बीजेपी पूरे महाराष्ट्र में अपना विस्तार करने में कामयाब रही. उसका वोट प्रतिशत भी बढ़ गया जबकि शिवसेना का वोट प्रतिशत अधिकतर चुनावों में 20 फीसदी या उससे नीचे रहा, साथ ही वो मुंबई के आसपास तक सिकुड़कर रह गई. शिवसेना दरअसल सीएम पद झटककर अपने कैडर और वोट बैंक में एक मजबूत संदेश भेजना चाहती है, इसलिए पार्टी 'करो या मरो' की मुद्रा में है.

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First published: November 6, 2019, 6:10 PM IST
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