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Opinion: कांग्रेस की नाराजगी के बाद भी औरंगाबाद पर दांव क्यों लगा रही शिवसेना?

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे(PTI)
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे(PTI)

भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने कांग्रेस (Congress) के साथ गठबंधन के बाद शिवसेना (Shiv Sena) के हिंदुत्व पर सवाल उठाए थे. लिहाजा शिवसेना शायद औरंगाबाद (Aurangabad) का नाम बदलकर हिंदुत्व का सबूत देना चाहती है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 4, 2021, 1:48 PM IST
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(धवल कुलकर्णी)

मुंबई. नाम में क्या रखा है? विलियम शेक्सपियर की ये बात बेशक कई मामलों में सही साबित होती है, लेकिन महाराष्ट्र (Maharashtra) के राजनेता, जो शहरों और स्थलों का नाम बदलने की विवादास्पद मांगों के लिए जाने जाते हैं; शायद ही शेक्सपियर की इस बात से इत्तेफाक रखें. महाराष्ट्र में सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील औरंगाबाद (Aurangabad) का नाम अब 'संभाजी नगर’ करने पर विचार किया जा रहा है. शहरों के नाम बदलने के इस दौर में सत्तारूढ़ सहयोगी शिवसेना और कांग्रेस एक दूसरे के खिलाफ दिखाई दे रहे हैं.

महाविकास अघाड़ी सरकार छत्रपति संभाजी महाराज के नाम पर औरंगाबाद शहर का नाम बदलने पर विचार कर रही है. छत्रपति संभाजी महाराज को 1689 में मुगल बादशाह औरंगजेब ने बुरी तरह से प्रताड़ित कर मार डाला था. औरंगजेब के नाम पर ही औरंगाबाद शहर का नाम पड़ा. उसे 1707 में खुल्दाबाद में दफनाया गया था.



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दरअसल, राज्य में पहली बार 1995-96 के दौरान भारतीय जनता पार्टी (भाजपा)-शिवसेना गठबंधन सरकार के दौरान ये प्रस्ताव लाया गया था, जिसे शिवसेना ने पुनर्जीवित कर दिया है. खुद मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे इस प्रस्ताव का समर्थन कर रहे हैं. शिवसेना मुस्लिम-बहुल शहरों जैसे औरंगाबाद और ओस्मानाबाद को क्रमश: संभाजीनगर और धाराशिव के रूप में प्रचारित करती आई है.


हालांकि, महाविकास अघाड़ी की सहयोगी पार्टी कांग्रेस ने औरंगाबाद का नाम बदलने के प्रस्ताव का विरोध किया है. कांग्रेस को लगता है कि एक प्रमुख भावना की इस अभिव्यक्ति का प्रभाव अल्पसंख्यक वोटबैंक पर पड़ेगा. अल्पसंख्यक वोटबैंक पहले से ही ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के फोकस में है. AIMIM की औरंगाबाद में मजबूत उपस्थिति है. ऐसे में राजस्व मंत्री और राज्य कांग्रेस अध्यक्ष बालासाहेब थोराट ने शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे से इस प्रस्ताव पर दोबारा विचार करने की बात की है.

प्रतिस्पर्धात्मक धार्मिक और जाति-आधारित पहचान के साथ शहरों-संस्थानों के नाम बदलने की मांग एक सामाजिक मंथन का कारण बनती है. उदाहरण के लिए, 1978 में तत्कालीन राज्य सरकार ने औरंगाबाद में मराठवाड़ा विश्वविद्यालय का नाम बदलकर डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर पर रखने का फैसला किया, जिसके बाद वहां दलित विरोधी हिंसा भड़क गई. आखिरकार वर्ष 1994 में मराठवाड़ा विश्वविद्यालय का नाम बदलकर इसे बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय कर दिया गया है.

उस समय शिवसेना ने हिंदू मध्यम-जाति के एकीकरण से भी लाभ उठाया जो मराठवाड़ा विश्वविद्यालय का नाम बदलने से नाराज़ थे.

1980 के दशक में महज़ मुंबई केंद्रित और मराठा हितों की रक्षा का दावा करने वाली पार्टी से खुद को हिन्दुत्ववादी पार्टी के रूप में पेश करने की शिवसेना की कोशिशों में औरंगाबाद का खास महत्व है. इस दौरान दिवंगत शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे भी 'हिन्दू हृदय सम्राट' बनकर उभरे जिनकी पूरे राज्य में अपील थी.


शिवसेना ने औरंगाबाद और मराठवाड़ा से शुरू होने वाले मुंबई-ठाणे क्षेत्र के बाहर भी अपने पंख फैलाए हैं. पहले ये क्षेत्र हैदराबाद के निज़ाम के अधीन था और शिवसेना की सक्रियता के बाद वहां कई  सांप्रदायिक दंगे भी हुए. इस बीच 1986 में शरद पवार की पार्टी कांग्रेस (सेक्युलर) के कांग्रेस में विलय के फैसले के बाद मराठवाड़ा में उनका कैडर शिवसेना में पलायन कर गया था.

इसलिए कांग्रेस से गठबंधन के बाद हिन्दुत्व के मुद्दे पर बीजेपी द्वारा लगातार कठघरे में खड़ी की जी रही शिवसेना औरंगाबाद का नाम संभाजी नगर करने जैसे मुद्दे के जरिये खुद की पुरानी छवि बनाए रखने की कोशिश करती रहेगी.

हालांकि, यह कांग्रेस को एक बड़ा झटका देने जैसा होगा, जो शिवसेना के साथ गठबंधन के कारण पहले से ही मुश्किलों में है. कांग्रेस इसके साथ ही दूसरी सहयोगी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) से भी अस्तित्व का खतरे का सामना कर रही है, क्योंकि एनसीपी धीरे-धीरे उसके वोटर बेस में संधे लगा रही है.


राज्य में मुसलमानों की संख्या सबसे अधिक मराठवाड़ा में है, इसलिए शहर का नाम बदलने से जाहिर है कि कांग्रेस से इन वोटरों को दूर ही करेगा.

औरंगाबाद का नाम बदलकर 'संभाजीनगर' करेगी उद्धव सरकार, कांग्रेस कर रही है विरोध

एआईएमआईएम, जो पहले हैदराबाद के पुराने शहर तक सीमित थी; 2012 में मराठवाड़ा के जरिए महाराष्ट्र में प्रवेश कर चुकी है. 2019 के लोकसभा चुनावों में AIMIM के इम्तियाज जलील महाराष्ट्र से चुने जाने वाले अपनी पार्टी के पहले सांसद थे. उन्होंने औरंगाबाद से शिवसेना के चंद्रकांत खैरे को हराया था. 2014 में पूर्व पत्रकार इम्तियाज जलील मराठवाड़ा शहर से विधानसभा के लिए चुने गए थे.

औरंगाबाद का नाम बदलने से निजाम के शासन से लेकर शिवसेना-एआईएमआईएम के बीच वोटों के ध्रुवीकरण समेत कई पुरानी कड़वी यादें भी ताजा हो सकती हैं. जो कांग्रेस के पहले से सिकुड़ते आधार को और प्रभावित कर सकता है.

महाविकास अघाड़ी सरकार के इस कदम से औरंगाबाद नगर निगम (एएमसी) के चुनाव भी प्रभावित हो सकते हैं. शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने लगभग तीन दशकों तक नागरिक निकाय को नियंत्रित किया है. अब बीजेपी से अलग होने के बाद शिवसेना के पास शहर में बहुत कुछ दांव पर लगा है, जो हिंदुत्व का मुद्दा ही मुखर करता है.


बता दें कि अप्रैल 2020 में नगर निकाय का कार्यकाल समाप्त हो गया, लेकिन कोविड महामारी के कारण चुनाव स्थगित कर दिए गए. अभी औरंगाबाद म्युनिसिपल कॉरपोरेशन प्रशासन द्वारा चलाया जा रहा है.

इम्तियाज जलील जैसे शिवसेना के आलोचकों का मानना ​​है कि औरंगाबाद में अपने 30 साल के लंबे नियंत्रण को लेकर भगवा पार्टी के पास दिखाने के लिए बहुत कम चीजें हैं. शहर को हर आठ दिनों में एक बार पानी मिलता है. सड़कों पर गड्ढे ज्यादा दिखाई देते हैं और किनारे कचरे से पटे हैं. संयोग से चंद्रकांत खैरे, प्रदीप जायसवाल, अंबादास दानवे (शिवसेना) और भागवत कराड, किशनचंद तनवानी (भाजपा) जैसे नेता औरंगाबाद म्युनिसिपल कॉरपोरेशन की राजनीति से ही उभरे हैं.

जब राजनीतिक दल नाम बदलने और कुलदेवताओं के इर्द-गिर्द केंद्रित राजनीति का खेल खेलते हैं, तब वास्तविक मुद्दों से हट जाते हैं. उदाहरण के लिए, शुष्क मराठवाड़ा क्षेत्र कृषि संकट और भूजल के बड़े पैमाने पर उपयोग के कारण राज्य के 'धूल के कटोरे' के रूप में तेजी से उभर रहा है. संयोग से औरंगाबाद की समृद्ध पुरातत्व विरासत राज्य और राजनीतिक संरक्षण की कमी के कारण ढह रही है.


औरंगाबाद का इतिहास दूसरी शताब्दी के ईसा पूर्व से है, लेकिन आज भी इसकी ऐतिहासिक विशेषताओं जैसे महलों, दरगाहों, मंदिरों, दुर्गों और मुगल और आसफ जही युग के स्मारकों की उपेक्षा की जाती है. संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) के 'वर्ल्ड हेरिटेज सिटी' टैग के साथ महाराष्ट्र के पहले शहर के रूप में औरंगाबाद को नामित करने की राज्य सरकार की परियोजना अब तक एक नॉन-स्टार्टर रही है.

(Disclaimer: धवल कुलकर्णी मुंबई के जर्नलिस्ट हैं और 'द कजन्स ठाकरे' किताब के लेखक हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)
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