दशहरा कार्यक्रम में बोले मोहन भागवत- 'हिंदुत्व किसी की बपौती नहीं, इसमें सब शामिल हैं'

फोटो साभारः ट्विटर/@RSSorg
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मोहन भागवत ने कहा कि हिंदुत्व एक ऐसा शब्द है, जिसके अर्थ को पूजा से जोड़कर संकुचित कर दिया गया है. हिंदुत्व शब्द देश की पहचान है.

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  • Last Updated: October 25, 2020, 4:37 PM IST
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नई दिल्ली. विजयदशमी (Vijayadashami) के खास मौके पर नागपुर स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक (RSS) के मुख्यालय पर शस्त्र पूजन किया गया. इस दौरान संघ प्रमुख मोहन भागवत (RSS Chief Mohan Bhagwat) ने स्वयंसेवकों को संबोधित किया. दशहरे पर अपने संबोधन में मोहन भागवत ने कोरोना वायरस, सीएए, जम्मू कश्मीर से अनुच्छे 370 को हटाने और चीन के साथ गतिरोध जैसे मुद्दों पर अपनी बात रखी.

आरएसएस प्रमुख ने कहा, 'चीन ने अपने सामरिक बल के अभिमान में हमारी सीमाओं का अतिक्रमण किया, वो पूरी दुनिया के साथ ऐसा कर रहा है. भारत ने इस बार जो प्रतिक्रया दी उससे चीन सहम गया. भारत तन कर खड़ा हो गया. सामरिक और आर्थिक दृष्टि से इतना असर तो पड़ा कि चीन ठिठक गया.' भागवत ने कहा, अब चीन भी इसका जवाब देने की कोशिश करेगा. इसलिए हमें सामारिक और राजनयिक संबंध बेहतर करते रहने पड़ेंगे. अपने संबोधन में मोहन भागवत ने हिंदुत्व पर भी लंची चर्चा की. इस दौरान उन्होंने विरोधियों पर हिंदुत्व को लेकर भ्रम फैलाने का आरोप लगाया.

हिंदुत्व किसी एक भाषा का पुरस्कार करने वाला शब्द नहीं
मोहन भागवत ने कहा कि हिंदुत्व एक ऐसा शब्द है, जिसके अर्थ को पूजा से जोड़कर संकुचित कर दिया गया है. हिंदुत्व शब्द देश की पहचान है. ये आध्यात्म आधारित उसकी परंपरा के सनातन सातत्य और समस्त मूल्य सम्पदा के साथ अभिव्यक्ति देने वाला शब्द है. उन्होंने कहा, हिन्दू किसी पंथ या संप्रदाय का नाम नहीं है. किसी एक प्रांत का अपना उपजाया हुआ शब्द नहीं है, किसी एक जाति की बपौती नहीं है, किसी एक भाषा का पुरस्कार करने वाला शब्द नहीं है.
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अपनी बात पर जोर देते हुए मोहन भागवत ने कहा, 'जब हम कहते हैं कि हिंदुस्तान एक हिंदू राष्ट्र है तो इसके पीछे राजनीतिक संकल्पना नहीं है. ऐसा नहीं है कि हिंदुओं के अलावा यहां कोई नहीं रहेगा बल्कि इस शब्द में सभी शामिल हैं.' उन्होंने कहा, हिंदू शब्द की भावना की परिधि में आने व रहने के लिए किसी को अपनी पूजा, प्रान्त, भाषा आदि कोई भी विशेषता छोड़नी नहीं पड़ती. केवल अपना ही वर्चस्व स्थापित करने की इच्छा छोड़नी पड़ती है. स्वयं के मन से अलगाववादी भावना को समाप्त करना पड़ता है.'
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