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Opinion| आखिर राहुल ने गांधीगिरी के लिए वर्धा को ही क्यों चुना...
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संदीप सोनवलकर | News18Hindi
Updated: September 24, 2018, 4:31 PM IST
Opinion| आखिर राहुल ने गांधीगिरी के लिए वर्धा को ही क्यों चुना...
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी (फाइल फोटो)

राहुल गांधी विनोबा भावे के पवनार आश्रम से सेवाग्राम आश्रम तक करीब 12 किलोमीटर का सद्भावना मार्च निकालेंगे और सद्भावना रैली को संबोधित भी करेंगे.

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राहुल गांधी अगले महीने यानी 2 अक्टूबर को खुलकर गांधीगिरी करेंगे. जिस दिन पीएम मोदी स्वच्छता अभियान का नारा लगाएंगे, उस दिन राहुल गांधी सद्भावना का मुद्दा उठाएंगे. ज़ाहिर है कि राहुल गांधी वर्धा के आश्रम से मोदी को जवाब देना चाहते हैं. बता दें कि राहुल गांधी यहां अकेले नहीं आएंगे, बल्कि पूरी कांग्रेस को साथ लाएंगे. ज़ाहिर है मोदी की गांधी बनाम कांग्रेस की गांधी की लड़ाई चुनाव आते-आते और भी तेज़ होगी. राहुल गांधी पहले भी महात्मा गांधी की हत्या के लिए आरएसएस की विचारधारा को जिम्मेदार ठहराते रहे हैं और इसे  लेकर भिवंडी कोर्ट में उनके खिलाफ केस चल रहा है.

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आज़ाद भारत के इतिहास में पहली बार कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक वर्धा में होगी. अब सवाल यही है कि राहुल गांधी ने चुनाव की तैयारी के पहले ही वर्धा को क्यों चुना. इसकी दो-तीन बड़ी वजहें हैं. पहली ये कि दो अक्टूबर को गांधी जयंती है और राहुल उसी दिन बताना चाहते हैं कि गांधीगिरी का मतलब क्या है. दूसरी वर्धा नागपुर से महज 50 मील दूर है और नागपुर संघ का मुख्यालय है. उसी के पास से राहुल बताएंगे कि सद्भावना का क्या मतलब है?



राहुल गांधी विनोबा भावे के पवनार आश्रम से सेवाग्राम आश्रम तक करीब 12 किलोमीटर का सद्भावना मार्च भी करेंगे और एक रैली को संबोधित भी करेंगे. जाहिर है राहुल खुद को गांधी का असली वारिस बताने का कोई मौका नहीं चूकना चाहते. इसी बहाने वह सद्भावना और मोदी सरकार के दौरान अल्पसंख्यक और दलितों को निशाना बनाए जाने का मुददा भी उठाएंगे. राहुल की इस यात्रा का असर चुनावी मोड़ पर खड़े मध्य प्रदेश में भी होगा, क्योंकि राज्य की सीमा भी नागपुर से लगी हुई है.



गांधीजी के साबरमती से सेवाग्राम पहुंचने की कहानी भी काफी रोचक है. 12 मार्च 1930 को प्रसिद्ध नमक सत्याग्रह के लिए साबरमती आश्रम से अपने 78 साथियों के साथ महात्मा गांधी 'दांडी यात्रा' पर निकले थे. वहां से चलते समय उन्होंने संकल्प लिया था कि स्वराज लिए बिना आश्रम में नहीं लौटूंगा. 6 अप्रैल 1930 को गुजरात के दांडी समुद्र तट पर गांधीजी ने नमक कानून तोड़ा और 5 मई 1930 को उन्हें गिरफ्तार कर बिना मुकदमा चलाए यरवदा जेल में डाल दिया गया.

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1933 में जेल से रिहा होने के बाद गांधीजी देश व्यापी हरिजन यात्रा पर निकल गए. स्वराज मिला नहीं था, इसलिए वे वापस साबरमती लौट नहीं सकते थे. इसलिए उन्होंने मध्य भारत के एक गांव को अपना मुख्यालय बनाने का निश्चय किया. 1934 में जमनालाल बजाज और अन्य साथियों के आग्रह से वे वर्धा आए और मगनवाड़ी में रहने लगे. 30 अप्रैल 1936 को गांधीजी पहली बार मगनवाड़ी से सेगांव (सेवाग्राम) रहने चले आए.

आज के सेवाग्राम का नाम शुरू में सेगांव था. इसी क्षेत्र में नागपुर-भुसावल रेलवे लाइन पर शेगांव नाम के रेलवे स्टेशन वाला एक बड़ा गांव होने से गांधीजी की डाक में बहुत गड़बड़ी होती थी. इस कारण सुविधा के लिए 1940 में गांधीजी की इच्छा और सलाह से 'सेगाँव' का नाम 'सेवाग्राम' कर दिया गया.

सेवाग्राम में कई कुटियाएं हैं जहां स्वयं गांधीजी एवं उनके सहयोगी रहा करते थे. यहां बापू के अलावा प्यारेलाल जी, संत तुकड़ोजी महाराज, खान अब्दुल गफ्फार खान के साथ दूसरे आश्रमवासी तथा मेहमान ठहरते थे. गांधीजी से मिलने आने वाले सब नेता भी उनसे यहीं मिलते थे. 'भारत छोड़ो आंदोलन' की प्रथम सभा 1942 में इसी जगह हुई थी. 1940 के व्यक्तिगत सत्याग्रह की प्राथमिक तैयारी भी इसी जगह हुई थी.

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राहुल गांधी भी इसी आदि निवास के पास रात गुजारेंगे और आश्रम के लोगों के साथ गांधीजी के दर्शन और विचारों पर बात करेंगे. जाहिर है राहुल इस बार भारत छोड़ो के बजाय यहां से मोदी हटाओ का नारा देंगे.
First published: September 24, 2018, 3:11 PM IST
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