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2जी आवंटन घोटाले के दाग पीएम के दामन तक पहुंचे!

2जी आवंटन घोटाले के दाग पीएम के दामन तक पहुंचे!

एक अखबार के मुताबिक 2006 में डीएमके नेता और तत्कालीन टेलीकॉम मंत्री दयानिधि मारन ने पीएम को एक चिट्ठी लिखी थी, जिसके बाद पीएम ने 2जी स्पेक्ट्रम लाइसेंस की शर्तों में ढिलाई कर दी।

एक अखबार के मुताबिक 2006 में डीएमके नेता और तत्कालीन टेलीकॉम मंत्री दयानिधि मारन ने पीएम को एक चिट्ठी लिखी थी, जिसके बाद पीएम ने 2जी स्पेक्ट्रम लाइसेंस की शर्तों में ढिलाई कर दी।

एक अखबार के मुताबिक 2006 में डीएमके नेता और तत्कालीन टेलीकॉम मंत्री दयानिधि मारन ने पीएम को एक चिट्ठी लिखी थी, जिसके बाद पीएम ने 2जी स्पेक्ट्रम लाइसेंस की शर्तों में ढिलाई कर दी।

  • News18India
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    नई दिल्ली। टेलीकॉम घोटाले के छींटे पीएम के दामन तक पहुंचने लगे हैं। एक अखबार के मुताबिक 2006 में डीएमके नेता और तत्कालीन टेलीकॉम मंत्री दयानिधि मारन ने पीएम को एक चिट्ठी लिखी थी, जिसके बाद पीएम ने 2जी स्पेक्ट्रम लाइसेंस की शर्तों में ढिलाई कर दी। ये खबर सबसे पहले आईबीएन 7 ने 18 नबंबर 2010 में ही दिखाई दी।

    आईबीएन नेटवर्क के पास मौजूद दस्तावेज ने साफ कर दिया है कि खुद प्रधानमंत्री ने 2 जी स्पेक्ट्रम की कीमतों का मामला आवंटन के लिए बने मंत्रियों के समूह के दायरे से बाहर रखा। ए राजा के पहले डीएमके के ही कोटे से टेलीकॉम मंत्री दयानिधि मारन ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर अपने वायदे की याद दिलाई थी। चिट्ठी में कहा था कि स्पेक्ट्रम की कीमत तय करने का मसला GOM के दायरे से दूर रखा जाए।
    28 फरवरी 2006 को तत्कालीन टेलीकॉम मंत्री दयानिधि मारन ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिख कर साफ कहा था कि आपने मुझे भरोसा दिलाया है कि मंत्रियों के समूह (GOM) के कामकाज का दायरा हमारी इच्छा के हिसाब से ही तय किया जाएगा। GOM सिर्फ स्पेक्ट्रम के बंटवारे की प्रक्रिया पर ही गौर करेगा। जो नया दायरा बताया गया है कि वो मंत्रालय के सामान्य कार्यों में दखल देता है। मैं शुक्रगुजार रहूंगा अगर आप हमारे हिसाब से ही COM के कामकाज के दायरे में बदलाव का निर्देश संबंधित विभाग को दे देंगे

    इस चिट्ठी के बाद सरकारी तंत्र हरकत में आ गया और कैबिनेट सचिव ने बाकायदा जीएओ के दायरे को ही बदल डाला, 7 दिसंबर 2006 को लिखी ये चिट्ठी भी आईबीएन नेटवर्क के पास है। 2007 में तत्कालीन वित्त सचिव अशोक झा ने इस फैसले पर हैरत जताते हुए इसकी शिकायत कैबिनेट सचिव से की थी। ये भी कहा था कि स्पेक्ट्रम के दाम तय करने का मुद्दा कृपया मंत्रियों के समूह से न लिया जाए। मगर कुछ न हुआ।

    2008 में स्पेक्ट्रम के लाइसेंस की नीलामी नहीं की गई बल्कि पहले आओ पहले पाओ के आधार पर बेच डाले गए - दिलचस्प बात ये है कि 2008 में 2001 की कीमत पर ये लाइसेंस बेच दिए गए औऱ सरकार को पौने दो लाख करोड़ का नुकसान उठाना पड़ा।

    Tags: 2G scam

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