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15 साल पहले इस गांव में थी पानी की किल्‍लत, अब बना नीति आयोग का जल ग्राम

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Updated: October 1, 2019, 4:07 PM IST
15 साल पहले इस गांव में थी पानी की किल्‍लत, अब बना नीति आयोग का जल ग्राम
बांदा का जखनी गांव नीति आयोग का जल ग्राम बन गया है.

बांदा (banda) के जखनी गांव में आज गरीब से गरीब किसान 50 हजार की धान पैदा करता है, जिसके पास कभी साहूकार का कर्ज चुकाने के पैसे नहीं होते थे. आज उसके बैंक खाते में ठीक-ठाक पैसे होते हैं.

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  • Last Updated: October 1, 2019, 4:07 PM IST
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नई दिल्‍ली. शिरीन-फरहाद की प्रेम कहानी हम सभी ने सुनी है. साधारण सी कहानी जिसमें एक लड़का है, जिसे कभी राजकुमार बताया जाता है तो कभी एक सामान्य लड़का. उसे एक राजकुमारी से प्यार हो जाता है. चूंकि लड़की राजकुमारी है तो उसका प्यार पाना आसान नहीं है. उसके साथ एक ना पटने वाली खाई जैसी शर्त भी रखी जाती है. शर्त है कि फरहाद को पहाड़ काटकर एक नहर निकालना है. कुछ जगह इसे दूध की नदी के रूप में भी इंगित किया गया है.

सभी को लगता है कि शर्त ऐसी है कि फरहाद उसे पूरा नहीं कर पाएगा और अपने कदम पीछे हटा लेगा. लेकिन फरहाद तो जुनूनी था. तो वो शर्त मान लेता है. कहानी की खास बात यह है कि फरहाद अपनी शर्त लगभग पूरी भी कर देता है लेकिन जब राजा उसे शर्त पूरी करता हुआ पाता है तो वो उसे शिरीन के मरने की झूठी खबर पहुंचाता है. खबर सुनकर फरहाद दुखी होकर अपनी जान ले लेता है. शिरीन को जब मालूम चलता है तो वो भी अपनी जान दे देती है.

फसानों की दुनिया से जब हम हकीकत की धरती पर कदम रखते हैं तो हम 1960 के बिहार के गया के पास मौजूद गहलौर गांव में पहुंच जाते हैं. जहां एक आदमी की पत्नी पहाड़ के उस पार काम कर रहे अपने पति के लिए खाना ले जाते वक्त पहाड़ी से गिर जाती है. पहाड़ की 55 किलोमीटर की दूरी को पार करते हुए दवाओं और इलाज के अभाव में उसकी मौत हो जाती है.

अपनी पत्नी की मौत से उस आदमी के सिर पर एक जुनून सवार हो जाता है और वो गहलौर की पहाड़ी को काटकर 360 फुट लम्बा, 25 फुट गहरा और 30 फुट चौड़ा रास्ता बनाने का फैसला कर लेता है. वो भी सिर्फ एक हथौड़ी और छेनी के सहारे. लगातार 22 सालों तक लोगों की मज़ाक का साधन बनते हुए भी उस आदमी को कोई फर्क नहीं पड़ता है और एक दिन वो 55 किलोमीटर के रास्ते को घटाकर 15 किलोमीटर का कर देता है. आप जानते होंगे कि यह आदमी दशरथ मांझी था.

कहानियों की दुनिया का फरहाद हो या हकीकत की दुनिया के दशरथ, जब इन्होंने काम शुरू किया तो इनका मजाक बना. इन्हें कोई मदद नहीं मिली. बस इन पर एक जुनून सवार था. प्रेम में वो ताकत होती है कि वो हमें ऐसा जुनूनी बना देता है कि हमें बस करते रहना याद रह जाता है. कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनके लिए प्रकृति, उनकी धरती, उसी शिरीन या दशरथ मांझी की पत्नी की तरह ही है, जिससे वो बेइंतेहा मोहब्बत करते हैं और उसे मरते हुए नहीं देख सकते. खास बात ये है कि अक्सर इस तरह के काम करने वालों का काम बाद में सरकारें सराहती भी हैं और उन्हें पहचान भी देती है.

बांदा का जखनी गांव भी ऐसा ही गांव है. यहां के जुनूनी लोगों की बदौलत इस गांव में पानी के स्तर में तो अभूतपूर्व सुधार हुआ ही साथ ही गांव की सफलता इस कदर हैरान कर देने वाली है कि नीति आयोग को भी अपने जल प्रबंधन इंडेक्स में इस गांव को शामिल करना पड़ा. नीति आयोग के मुताबिक बांदा का जखनी गांव भारत के उन गांवों में से है, जिसने सामुदायिक भागीदारी की बदौलत पानी के मामले में खुद को स्वावलंबी बना लिया है.

बांदा के जखनी गांव में मेड़बंदी करती जेसीबी.

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जखनी गांव को नीति आयोग ने जलग्राम का मॉडल घोषित किया है. इसी की तर्ज पर जल संकट से जूझ रहे देश के 1030 गांवों को जखनी जैसा जलग्राम बनाने की भी घोषणा की गई है. सूखे से जूझ रहे बुंदेलखंड के बांदा जिले का जखनी गांव देशभर के लिए मिसाल बना है. जखनी ने जिस तरह खुद को बदला, उसका अध्ययन करने इजरायल के कृषि वैज्ञानिक आ रहे हैं. साथ ही नेपाल के साथ-साथ तेलंगाना, देवास (मप्र), महाराष्ट्र और बांदा विश्वविद्यालय के छात्र आ रहे हैं.

किसी वक्त सूखाग्रस्त रहे इस गांव में आज जहां वॉटर टेबल 20 फीट पर आ गया है. वहीं ना सिर्फ यहां मौजूद 5 पुराने तालाब आज लबालब भरे हैं बल्कि और नए तालाब भी खोदे गए हैं. इनमें भी बरसात के बाद पानी आ गया है. बांदा जिले में मुख्यालय से महज 14 किलोमीटर की दूरी पर महुआ ब्लॉक के इस गांव की आबादी 3200 के करीब है. यहीं पर कृषि भूमि करीब 2172 बीघा है. गांव में 33 कुएं हैं, 25 हैंडपंप हैं और करीब छह तालाब हैं.

आखिर ये हुआ कैसे
आज से करीब दस साल पहले गांव के कुछ जागरूक लोगों ने सर्वोदय आदर्श जल ग्राम स्वराज अभियान समिति का गठन किया. समिति ने लोगों को पानी बचाने को लेकर जागरूक करने की शुरुआत की, साथ ही गांव के घरों की नालियों से बहकर बर्बाद होते पानी को दूसरी नालियां बनाकर उसका रुख खेतों की तरफ कर दिया गया. ये पानी जब खेतों में पहुंचा तो सिंचाई के लिए उपयोग किया जाने लगा.

जखनी के समाजसेवी उमाशंकर पांडेय बताते हैं कि हमने कुछ नया काम नहीं किया बल्कि पुराने कामों को फिर से जीवित किया. उनका कहना है कि बुंदेलखंड में जब हरबोला किसानों ने काम किया तो उन्होंने खेत पर मेड़ बनाई, हम ये बात जानते थे कि अगर खेत में पानी रुकेगा तो वो मेड़ बनाकर रुकेगा. जिस खेत पर मेड़ होगी, मेड़ पर पेड़ होगा, पानी वहीं रुकेगा, पानी रुकेगा तो उसमें बासमती आसानी से ऊगेगा, लोगों को आय भी होगी और भूजल स्तर भी बढ़ेगा.

आज जखनी गांव में गरीब से गरीब किसान 50 हजार की धान पैदा करता है, जिसके पास कभी साहूकार का कर्ज चुकाने के पैसे नहीं होते थे. आज बैंक में उसके पास खुद का एक लाख रुपया पड़ा हुआ है. यहां तीन बीघे खेत वाले किसान के पास भी ट्रैक्टर है, हार्वेस्टर मशीन पूरे बांदा जिले में यहीं के किसान मामून खां के पास ही है.

गांव के ही गजेन्द्र त्रिपाठी अपने गांव के कलुआ नाम के व्यक्ति के बारे में बताते हैं जो अनुसूचित जाति से थे. त्रिपाठी बताते हैं कि कलुआ जब रास्ते में कहीं गड्ढा देखते थे तो प्रधान के पास जाकर नहीं बोलते थे कि गड्ढा है, वो खुद ही फावड़ा से मिट्टी खोद कर चार तसले मिट्टी उसमें डाल दिया करते थे, इसी तरह उन्हें जहां भी जमीन मिलती थी तो वो वहां पर पेड़ लगा दिया करते थे. कलुआ कहते थे कि छोटे मोटे काम तो हम खुद ही कर सकते हैं, हर काम के लिए किसी का मुंह क्यों ताका जाए. गजेंद्र बताते हैं कि कलुआ ने कहा था जिस दिन वह नहीं रहे, उस दिन ये पेड़ उनका नाम बताएंगे, अब वो जिंदा नहीं है लेकिन वो पेड़ बहुत बड़े और अच्छी हालत में है.

‘सौ के चाहे पचासे ही कीन्हे, पर ऊंची राखे आरी, तऊं देव ना देऊ तो घाघ को देओ गारी’

इस कहावत का मतलब है 100 की जगह भले ही 50 बीघे पर खेती करो लेकिन आरी यानि मेड़ ऊंची रखो, उसके बाद भी अगर देवता कुछ न दे तो घाघ को गाली दे सकते हैं. ये घाघ वही लोग हैं, जिन्हें पानी का देवता भी कहा जाता है, जो बरसों से गांव में पानी की उपलब्धता कहां होगी उसकी सटीक जानकारी दिया करते थे. ये घाघ आज से एक सदी पहले ये बात कह कर चले गए थे कि खेत पर मेड़ बन जाने से पानी का प्रबंधन किया जा सकता है. बस जखनी के गांववालों ने अपनी परंपराओं को फिर से जीवित करके अपनी जमीन को पानी से सराबोर कर दिया है.

मेड़बंदी किए हुए तालाब.


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र की ओर से न्यूयॉर्क में जलवायु परिवर्तन को लेकर आयोजित शिखर सम्मेलन में दुनिया के देशों को भरोसा दिलाते हुए कहा था कि अगले कुछ सालों में भारत जल संरक्षण को लेकर करीब 50 अरब डॉलर खर्च करेगा. दरअसल हमें ये समझना बेहद जरूरी है कि जल संरक्षण पैसा खर्च करने से होगा या अपनी कोशिशें, अपना जुनून खर्च करने से होगा. दशरथ मांझी के पास सिर्फ हथौड़ा और छैनी थी. जखनी गांव के पास सिर्फ एकजुटता थी और उन्हें अपने गांव से प्यार है. जहां प्यार होता है वहां पैसे की जरूरत ही नहीं पड़ती है. जखनी इस बात की एक सशक्त मिसाल है जो यह बताती है कि देश में फरहाद या दशरथ मांझी की कमी नहीं है. बस जरूरत है उन्हें पहचानने की.

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First published: October 1, 2019, 3:50 PM IST
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