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अब यहां घंटों होती है लगातार बारिश... अंटार्कटिका पहुंचे भारतीयों ने जलवायु परिवर्तन को देखकर जताई हैरानी

अब यहां घंटों होती है लगातार बारिश... अंटार्कटिका पहुंचे भारतीयों ने जलवायु परिवर्तन को देखकर जताई हैरानी

अंटार्कटिका में भारतीयों ने देखी जलवायु परिवर्तन की झलक. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

अंटार्कटिका में भारतीयों ने देखी जलवायु परिवर्तन की झलक. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

Climate Change News: ब्रिटिश खोजकर्ता रॉबर्ट स्वान के नेतृत्व में '2041 क्लाइमेट फोर्स अंटार्कटिक' अभियान के तहत 39 देशों के 150 से अधिक लोग अंटार्कटिका पहुंचे. इनमें 18 भारतीय नागरिक भी शामिल थे. यात्रा के दौरान इन सभी ने अंटार्कटिका पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों करीब से देखा.

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(सृष्टि चौधरी)
नई दिल्ली. बेमौसम बारिश… वक्त से पहले ज्यादा गर्मी और फिर ठंड के दौरान तापमान में भारी उतार-चढ़ाव… दुनिया भर के वैज्ञानिक इन दिनों जलवायु परिवर्तन को लेकर हैरान हैं. अब इसका असर अंटार्कटिका में भी दिखने लगा है. ग्लोबल वार्मिंग के चलते यहां बर्फ की चादरें तेजी से पिघलने लगी है. साथ ही यहां मार्च के महीने में भी बारिश देखी जा रही है. पिछले दिनों इस बड़े बदलाव को समझने के लिए 39 देशों के 150 से अधिक लोग अंटार्कटिका पहुंचे थे. इस टीम में 26 लोग भारत के भी थे. यहां से लौटने के बाद इन लोगों ने जलवायु परिवर्तन को लेकर जो बातें सामने रखी हैं, वो हैरान कर देने वाली हैं.

दिल्ली की रहने वाली रोजिता सिंह भी इस टीम का हिस्सा थी. उन्होंने कहा कि मार्च के महीने में यहां बारिश को देखकर वो हैरान और निराश रह गईं. यूनाइटेड नेशनंस डेवलपमेंट प्रोग्राम (UNDP) के एक्सेलेरेटर लैब की सोल्यूशन मैपिंग के प्रमुख के तौर पर काम करने वाली रोजिता सिंह ने कहा.  ‘हम अक्सर ग्लोबल वार्मिंग और इसके प्रभाव के बारे में बात करते हैं, लेकिन इसका प्रभाव अंटार्कटिका में बहुत तेजी से पड़ रहा है, जोकि परेशान करने वाली बात है.’

बता दें कि रोजिता सिंह उन 26 भारतीयों में शामिल थीं, जिनमें से 18 को ‘महासागर विजय’ अभियान में शामिल होने का मौका मिला. वह 17 मार्च को अर्जेंटीना से 12 दिनों के लिए अंटार्कटिका की यात्रा पर गई थीं. ब्रिटिश पोलर खोजकर्ता रॉबर्ट स्वान के नेतृत्व में ‘2041 क्लाइमेटफोर्स अंटार्कटिक’ अभियान में 39 देशों के 150 से अधिक लोग अंटार्कटिका पहुंचे थे. अभियान के लिए प्रत्येक का चयन कई साक्षात्कारों के बाद एक लंबी प्रक्रिया के तहत हुआ था. 30 वर्षों से लगातार महाद्वीप का दौरा कर रहे स्वान ने कहा कि एक दिन द्वीप पर घंटों बारिश हुई. यह असामान्य था और बारिश वहां लगातार बढ़ रही थीं.

वहीं, रोजिता सिंह ने कहा कि मार्च में अंटार्कटिका में बर्फबारी होती है. लेकिन पिछले दशकों में वैश्विक तापमान में वृद्धि ने महाद्वीप पर बर्फ की बारिश को कम कर दिया है. हाल के अध्ययनों से पता चलता है कि यहां ग्लोबल वार्मिंग के मद्देनजर इस तरह की घटनाओं की अधिक संभावना है. चिंता की बात यह है कि इससे बर्फ की चादरें तेजी से पिघलेंगी और इको सिस्टम को बाधित करेंगी.

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अंटार्कटिका में भारतीयों ने देखी जलवायु परिवर्तन की झलक

उन्होंने कहा, ‘हमें यह भी बताया गया था कि एक द्वीप से इतनी बर्फ पिघल गई है कि अब वह द्वीप समुद्र से सिर्फ डेढ़ फीट ऊंचा है.’ वह जोर देकर कहती हैं कि ये बदलाव हो रहे हैं, और बहुत तेजी से हो रहे हैं, इसलिए हमें 2041 संधि की रक्षा के लिए हर कदम उठाना होगा.’

गौरतलब है कि 2041 फाउंडेशन की शुरुआत स्वान द्वारा की गई थी, जो उत्तर और दक्षिण दोनों ध्रुवों पर पहुंचने वाले व्यक्तियों में से एक थे. उनका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन को कम करने के लिए निश्चित कार्रवाई को प्रेरित करना और अंटार्कटिका की कमजोर स्थिति पर ध्यान आकर्षित करते हुए संधि की रक्षा के लिए समर्थन जुटाना है.

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मानसिक बाधाओं को तोड़ा
2011 बैच की भारतीय वन सेवा (IFS) अधिकारी दीप जगदीप कॉन्ट्रैक्टर भी इस अभियान का हिस्सा थीं. उनके लिए यह खुद को चुनौती देना और जलवायु संकट को समझने का एक अवसर था. दीप एपेंडिसाइटिस सहित स्वास्थ्य चुनौतियों का सामना कर चुकी थी. वर्तमान में उप वन संरक्षक के रूप में तैनात दीप ने कहा कि एक महिला के रूप हम बहुत सारी मानसिक बाधाओं से जूझते हैं, और उन चीजों को छोड़ देते हैं, जो हमें लगता है कि हम नहीं कर सकते, लेकिन मुझे खुशी है कि इसने मुझे उस सब से आगे निकलने का मौका दिया.

दीप के पास अब प्रेजेंटेंशन के लिए जलवायु परिवर्तन की एक श्रृंखला है. वह इसकी मदद से आईएएस/आईएफएस अधिकारियों और यूपीएससी उम्मीदवारों के साथ जलवायु समाधान पर चर्चा करेंगी.
दीप का कहना है कि एक छोटा झींगा जैसा प्राणी, क्रिल, ग्रह पर सबसे प्रचुर समुद्री प्रजातियों में से एक है, फिर भी बर्फ पिघलने के कारण उनको आबादी में भारी गिरावट का सामना करना पड़ रहा है. यह अंटार्कटिका में खाद्य श्रृंखला की एक रीढ़ है, और इसकी घटती संख्या का पेंगुइन, सील, व्हेल और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की आबादी पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है.

उन्होंने कहा, ‘अगर हम कुछ नहीं करेंगे, तो हम इस वन्यजीव को खो देंगे. बर्फ को नुकसान पहुंचना बुरी खबर है. अभी कुछ हफ्ते पहले हमें एक विशाल बर्फ शेल्फ के बारे में पता चला जो पूर्व में गिर गया था.’

वैश्विक संकट के लिए व्यक्तिगत समाधान
अक्सर लोग हर मौजूद समस्या के बारे में जागरूक होते हैं, लेकिन इसे कम करने के उपायों को लागू नहीं करते हैं. बेंगलुरु के प्रैक्टिशनर अविनाश नारायणस्वामी के लिए यह अभियान उन व्यक्तिगत कार्यों के प्रभाव को देखने के बारे में था, जिसे वह स्वयं वर्षों से कर रहे थे. नारायणस्वामी ने अभियान को लेकर कहा, ‘अंटार्कटिका में बारिश हो रही थी. हमने इसके बारे में कभी नहीं सुना. तापमान उतना कम नहीं था, जितना हम आम तौर पर उम्मीद करते हैं. यह उससे कहीं ज्यादा ठंडा होना चाहिए था. क्रिल की घटती आबादी, और पेंगुइन का इधर-उधर भागना- उस पारिस्थितिकी तंत्र को खुली आंखों से देखना विनम्र था. साथ ही यह विचलित करने वाला भी था.’

तुरंत कार्रवाई की जरूरत
रोजिता सिंह का कहना है कि बर्फ से बंधे महाद्वीप पर गर्मी के विनाशकारी प्रभावों को देखने के बाद अभियान में शामिल लोग अब अपनी-अपनी कहानी बताने के लिए वापस आ गए हैं. वह जलवायु परिवर्तन के संदेश को हर घर पहुंचाना चाहते हैं. उनका कहना है कि दुनिया पहले से ही 1.2 डिग्री सेल्सियस गर्म है, और इसके प्रभाव पहले से अधिक तेज हो रहे हैं.

उन्होंने कहा कि अंटार्कटिका पर जलवायु परिवर्तन की छाप देखना हमारे लिए बेहद कठिन था. हम इस सीख को घर वापस ले जाना चाहते हैं और जलवायु परिवर्तन पर कार्रवाई के लिए टीम बनाना चाहते हैं, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर हम इस पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के लिए कुछ करना चाहते हैं, तो लोगों के बीच यह समझ पैदा करनी होगी कि हमारे व्यक्तिगत कार्य और जीवन शैली जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए सबसे अहम है.

Tags: Climate Change, Global warming

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