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बीएचयू विवाद: संस्‍कृत की विद्वान डॉ. सलमा महफूज ने कहा - ज्ञान की राह में आड़े नहीं आता धर्म

संस्‍कृत में पीएचडी करने वाली दुनिया की पहली मुस्लिम महिला डॉ. सलमा महफूज का  मानना है कि मजहब अपनी जगह है और तालीम अपनी जगह.

संस्‍कृत में पीएचडी करने वाली दुनिया की पहली मुस्लिम महिला डॉ. सलमा महफूज का मानना है कि मजहब अपनी जगह है और तालीम अपनी जगह.

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) से संस्‍कृत में पीएचडी (PhD) कर चुकीं पहली मुस्लिम महिला डॉ. सलमा महफूज (Salma Mahfooz) ने कहा कि मैं बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में संस्कृत पढ़ाने के लिए नियुक्त किए जा रहे मुस्लिम प्रोफेसर के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शन की वजह नहीं समझ पा रही हूं. सलमा महफूज की थीसिस संस्‍कृत साहित्‍य में नायिकाओं का वर्गीकरण पर थी. वह अब तक 15 स्‍टूडेंट्स की पीएचडी में गाइड (Guide) भी रह चुकी हैं.

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    इरम आगा

    नई दिल्‍ली. संस्‍कृत का प्राचीन व्‍याकरण पाणिनि (Panini) का अष्‍टाध्‍यायी (Ashtadhyayi) कुछ लोगों को जटिल लग सकता है, लेकिन अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) की संस्‍कृत की विद्वान (Sanskrit Scholar) सलमा महफूज इससे कभी परेशान नहीं हुईं. संस्‍कृत को लेकर उनकी सहजता कई विद्वानों को आश्‍चर्य में डाल सकती है. डॉ. सलमा महफूज (Dr. Salma Mahfooz) ने संस्‍कृत साहित्‍य में नायिकाओं के वर्गीकरण (Categorization) पर पीएचडी (PhD) की. एएमयू के प्रोफेसर रहे राम सुरेश त्रिपाठी ने उस समय घोषणा करते हुए कहा था, 'भारत नाट्य शास्‍त्र के नायिका भेद, डॉ. सलमा महफूज स्‍वयं विदुषी और विश्‍व की प्रथम मुस्लिम महिला हैं, जिन्‍होंने संस्‍कृत में पीएचडी प्राप्‍त की है.'

    'वेद, उपनिषद पढ़ाने से मेरी नमाज और रोजा पर नहीं पड़ा असर'
    डॉ. महफूज संस्‍कृत के कारण कभी मुश्किल में नहीं फंसीं, लेकिन बनारस हिंदू विश्‍वविद्यालय (BHU) में एक मुस्लिम को संस्‍कृत का प्रोफेसर नियुक्‍त किए जाने को लेकर हो रहे विरोध से पसोपेश में हैं. वह कहती हैं कि मैं इस विवाद को समझ नहीं पा रही हूं. सिर्फ इतना ही कह सकती हूं कि समय का इंतजार करिए. मैं नहीं जानती कि किसी के धर्म का किसी भाषा (Language) के ज्ञान से क्‍या लेनादेना है. मैं दुनिया की पहली मुस्लिम महिला हूं, जिसने संस्‍कृत में पीएचडी की. मैंने गीता, वेद, उपनिषद और संस्‍कृत की दूसरी किताबें पढ़ाईं, लेकिन इससे मेरे हज, उमरा, नमाज और रोजा पर कोई फर्क नहीं पड़ा.

    'संभव है कि समय बदल गया हो या हम अलग ही दौर में हैं'
    सलमा महफूज बताती हैं कि मैंने न सिर्फ हिंदू स्‍टूडेंट्स को, बल्कि मुस्लिम छात्रों को भी संस्‍कृत पढ़ाई है. मेरा मानना है कि मजहब (Religion) अपनी जगह है और तालीम (Education) अपनी जगह. फिलहाल संस्‍कृत के प्रोफेसर विवादों से दूर ही रहते हैं. उन्‍होंने कहा कि उम्र तो हो गई है मेरी...मैं इस मुद्दे पर ज्‍यादा कुछ नहीं कहना चाहती. लेकिन ये हो सकता है कि अब समय बदल गया हो और हम अलग ही दौर में हैं. अगर ऐसा नहीं है तो वहां एक भाषा पर इतना हंगामा क्‍यों हो रहा है. बता दें कि डॉ. महफूज को पंडित अयोध्‍या दास ने छठी तक संस्‍कृत पढ़ाई. इसके बाद वह संस्‍कृत पढ़ती गईं. एएमयू में प्रोफेसर राम सुरेश त्रिपाठी ने उन्‍हें संस्‍कृत में पीएचडी करने के लिए प्रोत्‍साहित किया.

    अलीगढ़ रत्‍न और विद्या रत्‍न से किया जा चुका है सम्‍मानित
    डॉ. सलमा कहती हैं कि अगर बचपन में पंडित अयोध्‍या दास ने मुझे अच्‍छे से संस्‍कृत पढ़ाई तो मेरी पीएचडी में सर सैयद अहमद खान की भी बड़ी भूमिका है. सर सैयद अहमद खान (Sir Syed Ahmad Khan) ने ही एएमयू में संस्‍कृत विभाग (Center for Learning Sanskrit) की स्‍थापना की थी. इसीलिए मैं संस्‍कृत में अपनी रुचि को पीएचडी तक ले जा पाई. डॉ. महफूज ने बिजनौर कॉलेज में पढ़ाया. वहीं, वह हिंदुत्‍व (Hinduism) और इस्‍लाम (Islam) के तुलनात्‍मक अध्‍ययन (Comparative Study) के लिए इराक (Iraq) भी गई थीं. वह एएमयू की चेयरपर्सन भी रहीं. यहां रहकर उन्‍होंने दारा शिकोह पर काम किया. उन्‍हें 2015 में अलीगढ़ रत्‍न से सम्‍मानित किया गया. इसके अलावा उन्‍हें विद्या रत्‍न से भी नवाजा गया.

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