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जिंदगी ने रुलाया फिर भी इन दोनों ने नहीं मानी हार, हार्ट ट्रांसप्लांट के बाद अब दुनिया फतह करने को हैं तैयार

हार्ट अटैक की वजह से दो 
रोगी छोड़ने चले थे खेल, मगर 'दिल बदला' तो चले हैं दुनिया फतह करने

हार्ट अटैक की वजह से दो रोगी छोड़ने चले थे खेल, मगर 'दिल बदला' तो चले हैं दुनिया फतह करने

फुटबॉलर नंदा ने उस पल को याद करते हुए कहा कि दिल्ली के फोर्टिस एस्कॉर्ट्स अस्पताल के डॉक्टरों ने एकमात्र समाधान के रूप ...अधिक पढ़ें

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नई दिल्ली: साल था 2015 और महीना था दिसंबर. शनिवार की सर्द सुबह 42 वर्षीय करहुन नंदा के लिए आम दिनों की तरह सामान्य थी. वह सुबह-सुबह फुटबॉल खेलने निकले थे, मगर वह नहीं जानते थे कि फुटबॉल खेलते हुए चंद पलों में उनकी जिंदगी बदलने वाली है. दरअसल, करहुन नंदा को दिसंबर 2015 में दिल का दौरा पड़ा था. नंदा ने News18 से बातचीत में कहा, ‘मैंने 12 साल की उम्र में फुटबॉल खेलना शुरू किया था… मैंने हमेशा राष्ट्रीय स्तर की चैंपियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व करने का सपना देखा था. दुर्भाग्य से मैं अपने फुटबॉल गेम को राज्य स्तर से आगे नहीं बढ़ा सका और फिर मैंने इंजीनियरिंग करने का फैसला किया. लेकिन मैंने खेलना नहीं छोड़ा.’

लेकिन वह सुबह उनकी जिंदगी की सबसे खराब सुबह थी. नंदा जब फुटबॉल खेल कर वापस आए तो वह तेज दर्द से कराह रहे थे. उन्होंने कहा, ‘आधे घंटे बाद मैं दर्द से कराहता हुआ लेटा हुआ था.’ उनका परिवार उनके फैमिली डॉक्टर के क्लिनिक में ले गया, जहां पता चला कि उन्हें गंभीर दिल का दौरा पड़ा है. उन्हें एक ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा जिसे ‘सडेन कार्डियक डेथ’ के रूप में जाना जाता है, जिसके कारण अंततः उनका हार्ट फेल हो गया. मेडिकल रिपोर्टस में बताया गया कि उन्हें आइडियोपैथिक कंडिशन के कारण दिल का दौरा पड़ा, जिसका अर्थ है एक ऐसी बीमारी या स्थिति जो खुद से उत्पन्न होती है और जिसका कारण अज्ञात होता है.

Nanda

फुटबॉल खेलने के दौरान ही नंदा को हार्ट अटैक आया था.

फुटबॉलर नंदा ने उस पल को याद करते हुए कहा कि दिल्ली के फोर्टिस एस्कॉर्ट्स अस्पताल के डॉक्टरों ने एकमात्र समाधान के रूप में हृदय प्रत्यारोपण (हार्ट ट्रांसप्लांट) का सुझाव दिया. नंदा के हृदय प्रत्यारोपण ने उन्हें न्यूकैसल में वर्ल्ड ट्रांसप्लांट गेम्स 2019 में गोल्फ में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करने का एक अनूठा अवसर दिया. यह डब्ल्यूटीजी हार्ट ट्रांसप्लांट करवा चुके एथलीटों के लिए एक अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजन है, जो अब 2023 में ऑस्ट्रेलिया के पर्थ में फिर से होने वाला है. डब्ल्यूटीजी यानी वर्ल्ड ट्रांसप्लांट गेम्स उन प्रतियोगियों के लिए है, जिन्होंने कम से कम 1 वर्ष के लिए अंग प्रत्यारोपण प्राप्त किया है और जिनका ग्राफ्ट कंफ्शन स्टेबल है.

नंदा अब आगामी इवेंट में भी भाग लेने की तैयारी कर रहे हैं. नंदा ने कहा कि पहले मैं पदक हासिल करने के लिए खुद को सक्षम नहीं मानता था क्योंकि मैंने तुरंत ही इस कठिन खेल को खेलना शुरू किया था. हालांकि, अब कुछ बेस्ट खिलाड़ियों द्वारा प्रशिक्षित होने के बाद मुझे लगता है कि अगले खेलों में पदक जीतने की स्थिति में आने के लिए मैंने पर्याप्त प्रशिक्षण पा लिया है. मैं पर्थ में डब्ल्यूटीजी 24 में भाग लेने और भारत का झंडा उठाने के लिए काफी उत्साहित हूं.

हालांकि, परिस्थितियों को मात देकर और अपने मजबूत इरादे से एक नया जीवन पाने वाले नंदा इस रेस में अकेले नहीं हैं. राहुल प्रजापति का स्पोर्ट्स स्टार बनने का सपना तब टूट गया, जब वह सिर्फ 19 साल के थे, क्योंकि वह बिना थके और असहज हुए पांच कदम भी नहीं चल पा रहे थे. लगातार पसीना निकलना और सांस फूलना उनकी सामान्य शिकायत बन गई थी. राहुल ने न्यूज18 को बताया कि मैं हैरान था कि मेरा शरीर इतना असामान्य कैसे व्यवहार कर रहा था. मुझे पसीना क्यों आ रहा था?

Rahul Prajapati

राहुल का भी हार्ट ट्रांसप्लांट हुआ है.

उत्तर प्रदेश में उनके पैतृक गांव बागपत में स्थानीय डॉक्टर ने उनका इकोकार्डियोग्राम (ईसीजी) किया और उन्हें दिल्ली स्थित एम्स यानी अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान जाने को कहा. एम्स जाने को कहना, यह संकेत देने के लिए पर्याप्त था कि राहुल के साथ कुछ तो बहुत बुरा हुआ है. एम्स में पूरी तरह से टेस्ट और एग्जामिनेशन्स के बाद उन्हें डाइलेटेड कार्डियोमायोपैथी (डीसीएमपी) का पता चला था. डीसीएमपी एक ऐसी स्थिति है, जिसके कारण हृदय के चैंबर पतले और खिंचाव वाले हो जाते हैं, जिससे हृदय के लिए रक्त को प्रभावी ढंग से पंप करना मुश्किल हो जाता है. राहुल का एम्स से इलाज चलने लगा.

साल 2012 से वह एक नई जिंदगी जी रहे थे, मगर 2017 आते-आते एक बार फिर से जिंदगी में भूचाल आया. राहुल अभी पूरी तरह से खुद को संभाल पाते कि उन्हें पारालाइटिक अटैक मार गया. वह तो रिकवर हो गए, मगर उनके हार्ट को काफी नुकसान हुआ. उन्होंने उस पल को याद करते हुए बताया कि डॉक्टर ने मेरे परिवार को कहा कि ट्रांसप्लांट के अलावा अब कोई विकल्प नहीं है और इसके बाद फिर हार्ट डोनर्स की तलाश शुरू हुई.

उन्हें अभी भी याद है कि यह 18 फरवरी 2018 था, जब उनके परिवार को एम्स से तत्काल फोन आया था कि हार्ट डोनर मिल गया है. उस रात उनका ऑपरेशन किया गया और वहीं से उनका जीवन बदल गया. राहुल अब एक फिट और सक्रिय जीवन जीते हैं और पिछले कुछ महीनों से यह बैडमिंटन खिलाड़ी वर्ल्ड ट्रांसप्लांट गेम्स, 2023 में भाग लेने के लिए कड़ी मेहनत कर रहा है.

Rahul

अब देश के लिए पदक जीतना है राहुल का सपना.

उनका सपना वर्ल्ड ट्रांसप्लांट गेम्स में भारत का प्रतिनिधित्व करना है और उन्हें उम्मीद है कि वह अपने डोनर और अपने देश दोनों को गौरवान्वित करेंगे. उन्होंने कहा कि मुझे फंडिंग की कमी हो रही है. हालांकि, मैं अभी भी पैसा जमा करने और खेलों में भाग लेने की पूरी कोशिश कर रहा हूं. ट्रांसप्लांट के बाद राहुल अब तक वित्तीय संकट से जूझ रहे हैं. उन्होंने कहा कि उन्हें नौकरी भी रिजेक्शन का सामना करना पड़ता है. वर्तमान में उनके परिवार का पालन-पोषण उनके पिता की आय से किया जा रहा है. राहुल ने कहा कि महीने में उनके इलाज पर 33 हजार रुपए खर्च हो जाते हैं. हालांकि, उन्हें उम्मीद है कि वह एक दिन देश के लिए पदक जीतेंगे.

Tags: India news, World Heart Day

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