IISc आतंकी हमले के आरोप से 4 साल बाद बरी हुए हबीब मियां, आतंकियों की मदद का नहीं मिला सबूत

28 दिसंबर 2005 को आईआईसी पर हुए हमले में दिल्ली के विजिटिंग प्रोफेसर एमसी पुरी की मौत हो गई थी. फाइल फोटो

2005 IISc Attack Case: कोर्ट ने कहा, "आरोपी नंबर 1 के बयान से पता चलता है कि आरोपी नंबर 1 ने आरोपी नंबर 7 को अपना असली नाम भी नहीं बताया और ना ही यह बताया कि वह बांग्लादेश क्यों जा रहा है."

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    बेंगलुरु. साल 2005 में बेंगलुरु स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc Terror Attack) पर हुए आतंकी हमले में कथित संलिप्तता के आरोप में गिरफ्तार किए गए हबीब मियां को चार साल बाद पिछले सप्ताह रिहा कर दिया गया. एनआईए स्पेशल कोर्ट (NIA Special Court) ने कहा कि पेशे से ड्राइवर 40 वर्षीय हबीब मियां के खिलाफ पुलिस को कोई सबूत नहीं मिला है. 28 दिसंबर 2005 को आईआईसी पर हुए हमले में दिल्ली के विजिटिंग प्रोफेसर एमसी पुरी की मौत हो गई थी. मार्च 2017 में हबीब मियां को हमले के मुख्य आरोपी सबाउद्दीन अहमद की कथित तौर पर मदद के लिए गिरफ्तार किया गया था. उन पर आरोप था कि उन्होंने हमले से पहले और बाद में सबाउद्दीन (Sabauddin Ahmed) को बांग्लादेश से आने और जाने में मदद की. अहमद को सुरक्षा एजेंसियों ने 2008 की शुरुआत में नेपाल से दबोचा था.

    एनआईए की स्पेशल कोर्ट ने मामले में आरोप तय किए जाने से पहले हबीब मियां की ओर से दायर की गई आरोप मुक्त करने की याचिका को स्वीकार करते हुए 14 जून के अपने आदेश में सबाउद्दीन अहमद के बयान का जिक्र किया, जिसमें अहमद ने कहा था कि हबीब मियां ने उसे सीमा पार करने में मदद की. कोर्ट ने कहा, 'आरोपी नंबर 1 (सबाउद्दीन अहमद) के पूरे बयान पर गौर फरमाते हुए यह पाया गया है कि सिर्फ एक बयान के अलावा इस बात के कोई सबूत नहीं हैं कि आरोपी नंबर 7 (हबीब मियां) को इस बात की जानकारी थी कि आरोपी नंबर 1 आंतकी है और उसे आतंकियों से पैसा मिलता है या वह बेंगलुरु में आतंकी हमले को अंजाम देने वाला है.'

    कोर्ट ने कहा, 'आरोपी नंबर 1 के बयान से पता चलता है कि आरोपी नंबर 1 ने आरोपी नंबर 7 को अपना असली नाम भी नहीं बताया और ना ही यह बताया कि वह बांग्लादेश क्यों जा रहा है.' कोर्ट ने कहा कि पुलिस ने इस बात का कोई सबूत नहीं पेश किया है कि हबीब मियां से नकली पहचान पत्र का उपयोग कर संपर्क करने वाले सबाउद्दीन अहमद के लश्कर ए तैयबा का आतंकी होने की जानकारी थी और अहमद को आतंकी हमलों को अंजाम देने के लिए हथियार और गोला बारूद मिलते थे.

    एनआईए कोर्ट के स्पेशल जज कसनाप्पा नायक ने कहा, 'मैंने पाया है कि आरोपी नंबर 1 के आरोपों में ऐसा कुछ नहीं है, जिसके आधार पर आरोपी नंबर 7 के खिलाफ मुकदमा चलाया जाए. यह पाया गया है कि आरोपी नंबर 7 को गिरफ्तार किया गया है और उसका बयान भी दर्ज हुआ है. हालांकि अपराध में आरोपी नंबर 7 की संलिप्तता साबित करने का कोई सबूत उपलब्ध नहीं है."

    कोर्ट ने कहा कि आईआईसी पर हमले के बाद अगरतला में सबाउद्दीन अहमद को सीमा पार करने में मदद करने वाले अन्य दो लोगों को पकड़ने के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया. कोर्ट ने कहा, "यह साबित करने के लिए कोई स्वतंत्र प्रमाण नहीं है कि आरोपी नंबर 7 ने आरोपी नंबर 1 को कोई आपराधिक और गैरकानूनी काम करने में मदद की. यदि आरोपी नंबर 7 ने अवैध रूप से बांग्लादेश जाने के लिए सीमा पार करने में आरोपी नंबर 1 की सहायता की थी तो त्रिपुरा पुलिस इस मामले में कार्रवाई कर सकती है और इस मामले में उस पर कोई मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है."

    इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक आईआईएससी का मामला लगभग तीन वर्षों तक अनसुलझा रहा, लेकिन मामले में अचानक खुलासा तब हुआ, जब मूल रूप से बिहार के दरभंगा के रहने वाले अहमद की गिरफ्तारी हुई. मुख्य आरोपी अहमद पर आरोप है कि उसने बेंगलुरू में अपने कॉलेज के पास एक कमरे में हमलावर अबू हमजा को पनाह दी थी. आरोप है कि अबू हमजा पाकिस्तान भाग गया है.

    मई 2005 में पुलिस को दिए गए अहमद के बयान के अनुसार, पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा के हैंडलर अब्दुल अजीज उर्फ​वली उर्फ​रेहान ने बेंगलुरु में एक आतंकी हमले को अंजाम देने की तैयारियों को अंतिम रूप देने के लिए बांग्लादेश जाने को कहा था. मुख्य आरोपी अहमद ने पाया कि बांग्लादेश जाने के लिए अगरतला सबसे करीबी इलाका है. इसके बाद वह त्रिपुरा पहुंचा. अहमद का दावा है कि अगरतला की एक मस्जिद में वह हबीब मियां से मिला और अब्दुल अजीज से मुलाकात खातिर बांग्लादेश जाने के लिए मदद मांगी.

    अहमद ने पुलिस को बताया, "उसने मुझे बताया कि उसकी मां का परिवार बांग्लादेश के कोमिला में रहता है. उसने यह भी बताया कि वह बिना पासपोर्ट के बांग्लादेश जाता रहता है. मैंने एक आगंतुक के तौर पर बांग्लादेश जाने की इच्छा जाहिर की. वह तैयार हो गया और कहा कि सीमा पार करने में कोई समस्या नहीं आएगी." अहमद के बयान के मुताबिक उसने हबीब मियां से कहा कि अपने अंकल से मुलाकात के लिए उसे ढाका जाना है, ढाका में अब्दुल अजीज से मुलाकात के बाद हबीब मियां द्वारा अहमद को अगरतला लाने की बात कही गई है.

    इसके बाद पाकिस्तानी आतंकी अबू हमजा को कथित तौर पर नेपाल के रास्ते भारत भेजा गया. अबू हमजा को दिसंबर 2005 में आईआईसी पर हमले को अंजाम देना था. अहमद ने हमले के लिए कथित तौर पर कश्मीर से एके-56 और ग्रेनेड इकट्ठा किया था. आईआईसी पर हमले के बाद अहमद बिहार भाग गया. फिर फरवरी 2006 में त्रिपुरा के रास्ते बांग्लादेश गया और हबीब मियां से संपर्क किया. हबीब मियां ने उसे बताया कि वह शहर से बााहर हैं और अपने भतीजे पप्पू से संपर्क करने को कहा. फिर पप्पू ने अहमद को सैफ उल इस्लाम से मिलवाया, जिसने कथित तौर पर ढाका जाने में उसकी मदद की.

    दिसंबर 2006 में लश्कर ए तैयबा के कमांडर के तौर पर आतंकी मुजम्मिल ने अहमद को बांग्लादेश से काठमांडू जाने को कहा, अहमद ने एक बार फिर कथित तौर पर हबीब मियां की मदद मांगी. अहमद ने पुलिस को बताया, मैंने हबीब मियां को फोन किया और वे मुझसे मिलने बांग्लादेश के कोमिला आए, लेकिन बाद में हबीब मियां ने यह कहते हुए उसकी मदद करने से इनकार कर दिया कि सुरक्षा व्यवस्था चौकस कर दी गई है.

    मामले की सुनवाई के दौरान हबीब मियां के वकील मोहम्मद तहरीर ने कोर्ट को बताया कि उनके मुवक्किल के खिलाफ मामला कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है.

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