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यौन नैतिकता के देश में छह महीने में 24000 बच्‍चों का यौन उत्‍पीड़न

यौन नैतिकता के देश में छह महीने में 24000 बच्‍चों का यौन उत्‍पीड़न

छह महीने में 24000 बच्‍चों का यौन उत्‍पीड़न

छह महीने में 24000 बच्‍चों का यौन उत्‍पीड़न

एक तरफ स्‍कूल विज्ञान तक पढ़ाने से इनकार कर रहे थे और दूसरी ओर मुंबई-हावड़ा मेल के स्‍लीपर कोच का बाथरूम हमें ह्यूमन फिजियोलॉजी सिखा रहा था. सेक्‍स गुरुओं ने कोच के दोनों ओर बने चारों बाथरूमों की दीवारों पर डॉट पेन से बाकायदा चित्र बनाकर समझाया होता था कि औरत और आदमी के शरीर की संरचना कैसी होती है.

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हर संडे की तरह उस संडे मैंने सुबह उठते ही सबसे पहले अखबार का संडे सप्‍लीमेंट ढूंढा. उस संडे अखबार तो आया था लेकिन सप्‍लीमेंट नदारद था. ये 22 साल पुरानी बात है. मैंने घर का हर कोना ढूंढ डाला, सबसे तगादा कर लिया. सप्‍लीमेंट नहीं मिला. अचानक गधे के सिर से सींग जैसे नदारद हुए उस सप्‍लीमेंट का राज महीनों बाद जाकर उजागर हुआ, जब किचन के टाण पर कुछ ढूंढने की कोशिश में मेरे हाथ अखबार का वो टुकड़ा लगा, जिसे बड़ी बेतरतीबी से मोड़कर पुराने डिब्‍बों-बर्तनों के पीछे फेंक दिया गया था.

ये वही खोया हुआ संडे स्‍पलीमेंट था, जिसकी लीड स्‍टोरी थी- “कामसूत्र का भारत.” साथ में मीरा नायर की फोटो और फिल्‍म “कामसूत्र” के गिर्द कई कहानियां. जैसे हर अपराधी अपने पीछे कोई न कोई सबूत छोड़ देता है, मां ने भी छोड़ दिया था. कहानी साफ थी. उस दिन सप्‍लीमेंट आया तो था, लेकिन अपनी बड़ी होती बेटी को कामसूत्र वाली स्‍टोरी न पढ़ने देने के लिए उसे गायब कर दिया गया. तब तक मेरे लिए ये कोई रहस्‍य नहीं रह गया था कि सेक्‍स और उससे जुड़ी हर बात एक प्रतिबंधित विषय है. घर, स्‍कूल, अम्‍मा, टीचर सबको यही डर कि लड़की को कहीं सेक्‍स के बारे में कुछ भनक न लग जाए. आठवीं क्‍लास की बायलॉजी की किताब में ह्यूमन रिप्रोडक्शन पर बाकायदे एक चैप्‍टर था, जो कभी पढ़ाया नहीं गया.

एक तरफ घर और स्‍कूल विज्ञान तक पढ़ाने से इनकार कर रहे थे और दूसरी ओर हर गर्मी की छुट्टी में ननिहाल जाने वाली मुंबई-हावड़ा मेल के स्‍लीपर कोच का बाथरूम हमें ह्यूमन फिजियोलॉजी सिखा रहा था. सेक्‍स गुरुओं ने ट्रेन के कोच के दोनों ओर बने चारों बाथरूमों की दीवारों पर डॉट पेन से बाकायदा चित्र बनाकर समझाया होता था कि औरत और आदमी के शरीर की संरचना कैसी होती है. हमने उनके साइंटिफिक नाम बाद में सीखे, उसके देसी नाम और उस पर बनी देसी गालियां पहले ही हमारे ज्ञानकोष का हिस्‍सा बन चुकी थीं.

इस तरह हम उस देश में बड़े हो रहे थे, जो कामसूत्र और खजुराहो का देश था.

मीरा नायर की फिल्‍म कामसूत्र के एक दृश्‍य में इंदिरा वर्मा और नवीन एंड्रूज
मीरा नायर की फिल्‍म कामसूत्र के एक दृश्‍य में इंदिरा वर्मा और नवीन एंड्रूज


जब आपकी जिंदगी में दुनिया-जहान का सिनेमा आता है तो सिर्फ सिनेमा नहीं आता. उसके साथ कल्‍चरल शॉक भी आता है. 2008 में मैंने वो फिल्‍म देखी थी, “गर्ल इंटरप्‍टेड”. फिल्‍म के एक सीन में हिरोइन सुजैना हॉस्‍टल के कमरे में अपने बॉयफ्रेंड के साथ सेक्‍स करने जा रही है, तभी वॉर्डन आ जाती है. अचानक कमरे में एक लड़का-लड़की को ऐसे आपस में गुत्‍थमगुत्‍था देख वो बस इतना ही कहती है, “ओह सॉरी” और कमरा बंद करके चली जाती है. 11 साल पहले उस वॉर्डन को देख मैं सदमे में आ गई थी. एक वो वॉर्डन थी और एक मेरे हॉस्‍टल की वॉर्डन. कोई लड़की स्‍लीव्‍सलेस टॉप या थोड़ी छोटी स्‍कर्ट पहनकर बाहर जाती दिख जाए तो लगती थीं मां-बाप को फोन घुमाने की धमकी देने. एक बार एक लड़की बिना नाइट आउट एक रात गायब हो गई. अगले दिन सतारा से उसके मां-बाप मुंबई तलब कर लिए गए और लड़की उनके साथ बैरंग सतारा पार्सल कर दी गई. उस गर्ल्‍स हॉस्‍टल में लड़का तो छोड़ो, लड़के की परछाईं भी दूर-दूर तक नजर नहीं आती थी. स्‍कूल में एक बार एक लड़की गेट पर खड़े होकर किसी लड़के से बात करती पाई गई और देवकी अग्रवाल मैडम उसकी चोटी खींचकर उसे प्रिंसिपल रूम में ले गईं. पूरे स्‍कूल में जंगल की आग की तरह खबर फैल गई कि फलानी लड़की किसी लड़के से बात करती रंगे हाथों पकड़ाई. क्‍लास में फर्स्‍ट आने वाली लड़कियों ने बॉयफ्रेंड वाली लड़की को हिकारत से देखा. मैं भी उन हिकारत से देखने वालियों में से एक थी.

मां और शिक्षिकाओं ने एक बात दिमाग में फीड कर दी थी कि दुनिया में दो तरह की लड़कियां होती हैं. एक तो पढ़ने में तेज संस्‍कारी लड़कियां और दूसरी बॉयफ्रेंड वाली कुसंस्‍कारी लड़कियां. मां ने बताया कि बंबई तो हमेशा से बड़ा एडवांस शहर था. ऐसा नहीं कि हमारे जमाने में घरवालों से छिपकर लड़के के साथ सिनेमा देखने जाने और फिर टिकट फाड़ देने वाली लड़कियां नहीं थीं, लेकिन मैं उनमें से एक नहीं थी. जो मां छिपकर सिनेमा देखने वाली न हुई तो बेटी कैसे हो जाए. तकरीबन हर मां ने अपनी बेटी को ऐसी संस्‍कारी कहानियां सुना रखी थीं और बेटियां संस्‍कारों और सिर उठा रहे हॉर्मोन्‍स के दो पाटों के बीच बाजरे की तरह पिसकर आटा हुई जा रही थीं.

दो दशक बाद क्‍या अब ये नरेटिव बदल गया है? क्‍या ये किस्‍से अब सिर्फ इतिहास होकर रह गए हैं? क्‍या यूपी बोर्ड के स्‍कूलों ने आठवीं क्‍लास का वो ह्यूमन रिप्रोडक्‍शन वाला चैप्‍टर पढ़ाना शुरू कर दिया है? क्‍या मुंबई-हावड़ा मेल के बाथरूम की दीवार साफ हो गई है?



अभी चार दिन पहले ट्विटर पर ये दोनों चीजें एक साथ दिखाई दीं. एक हेडलाइन थी- “छह महीने में 24,000 बच्चों से यौन उत्पीड़न, यूपी सबसे आगे, CJI बोले- 50% में तो जांच ही नहीं.” और दूसरी ओर यौन शुचिता और संस्‍कारों के उपदेशों से पटी मेरी वॉल. इंटरकास्‍ट मैरिज पर एक स्‍टोरी पर ऐसे कमेंट थे कि “भारत में सेक्‍स का नंगा नाच नहीं होता. यह आनंद के लिए नहीं, सिर्फ संतानोत्‍पत्ति के लिए है.” मैं उस स्‍टोरी का लिंक लगाकर उससे पूछना चाहती थी कि तो क्‍या आनंद के लिए आप बच्‍चों को निशाना बनाते हैं?

रेप, चाइल्‍ड रेप और सेक्‍सुअल वॉयलेंस के यूएन, यूनीसेफ और एनसीआरबी के आंकड़ों के साथ हमारा ये यौन शुचिता और संस्‍कारों वाला दावा कहां फिट होता है? एनसीआरबी की रिपोर्ट कहती है कि भारत में हर दिन प्रत्‍येक 1 लाख पर 6.3 महिलाओं के साथ रेप हो रहा है. आप बाकी दुनिया से तुलना करेंगे तो लगेगा कि हम कितने बेहतर हैं. लेकिन अपनी पीठ ठोंकने से पहले ये रिपोर्ट भी पढ़ लीजिए जो कहती है कि भारत में रेप के 88 फीसदी मामले तो दर्ज ही नहीं होते. रॉयटर्स की पिछले साल की रिपोर्ट थी कि भारत महिला सुरक्षा के लिहाज से दुनिया का सबसे बदतर मुल्‍क है. 2017 की एनसीआरबी की रिपोर्ट थी कि भारत में हर घंटे चार बच्‍चे यौन हिंसा के शिकार हो रहे हैं. 2017 में होम मिनिस्‍टर राजनाथ सिंह ने खुद वो रिपोर्ट जारी की थी, जिसके मुताबिक अकेले 2016 में चाइल्‍ड सेक्‍सुअल वॉयलेंस के 106,958 मामले दर्ज हुए. 2001 के सेंसस के हिसाब से पूरी दुनिया में इस वक्‍त 18 साल से कम उम्र के सबसे ज्‍यादा बच्‍चे भारत में है.



औरतें हों या बच्‍चे, जो भी कमजोर है वो निशाने पर है. और इन आंकड़ों के साथ खड़ा है यौन शुचिता और संस्‍कारी देश होने का हमारा दावा. हम रेप भी कर रहे हैं और संस्‍कारी भी बने हुए हैं. यहां स्‍कूलों में बच्‍चों को सेक्‍स एजूकेशन देने के नाम पर सबके कान खड़े हो जाएंगे, लेकिन छह महीने में 24000 बच्‍चों के साथ यौन हिंसा की खबर से कानों पर जूं भी नहीं रेंगेगी. हम सेक्‍स के बारे में बात नहीं करेंगे, लेकिन रेप में नंबर वन बने रहेंगे. हम मुंह पर संस्‍कारों का भाषण दे रहे होंगे और इस बीच गूगल हमारी पोलपट्टी खोल देगा. कुछ साल पहले गूगल सर्च की वर्ल्‍ड रिपोर्ट थी कि पूरी दुनिया में गूगल पर सेक्‍स वर्ड सर्च करने वाले दुनिया के टॉप 10 शहरों में छह शहर भारत के थे और इस काम में सबसे आगे था लखनऊ. कानून तो कहेगा कि भारत में पोर्न गैरकानूनी है, लेकिन वो मिलेगा ऐसे, जैसे आलू-टमाटर. हम अपनी लड़की के सेक्‍स कर लेने पर सिर पर पहाड़ उठा लेंगे और लड़कों के रेप करने पर कहेंगे कि लड़कों से गलती हो जाती है. नेशनल फैमिली हेल्‍थ सर्वे की रिपोर्ट कहेगी कि भारत में टीन एज प्रेग्‍नेंसी के मामले खतरनाक तरीके से बढ़ रहे हैं, लेकिन हम शुतुरमुर्ग की तरह गर्दन पेट में धंसाए अपने कान बंद कर लेंगे. हम पर्दे के पीछे सब करेंगे, लेकिन मुंह पर उसके बारे में तमीज से बात भी नहीं करेंगे. हम विज्ञान की किताब पढ़ाने से इनकार कर देंगे और ट्रेन के बाथरूम में फिजियोलॉजी सिखाएंगे. हम उस "गर्ल इंटरप्‍टेड" की वॉर्डन की तरह सॉरी बोलकर नहीं चले जाएंगे. हम सतारा से रातोंरात पिताजी को बुलाएंगे, उनको और उनकी बेटी को जलील करेंगे और लड़की को वापस सतारा भेज देंगे.

आखिर हम हैं क्‍या? हम मूर्ख हैं या मक्‍कार हैं?
और आखिर में ये दो कहानियां सुनिए और खुद तय करिए.

ओरहान पामुक : “इस्‍तांबुल: मेमॉयर्स एंड द सिटी”
ओरहान पामुक : “इस्‍तांबुल: मेमॉयर्स एंड द सिटी”


2006 में साहित्‍य का नोबेल पाने वाले टर्किश लेखक ओरहान पामुक की आत्‍मकथा “इस्‍तांबुल: मेमॉयर्स एंड द सिटी” में एक किस्‍सा है. उनकी उम्र तब 10 साल के आसपास रही होगी. दुनिया के किसी भी बच्‍चे की तरह ओरहान के भीतर भी देह के तमाम रहस्‍य सिर उठा रहे थे. ओरहान को ये रहस्‍य जितना डराता, उससे ज्‍यादा जिज्ञासा पैदा करता. एक बार ऐसे ही खुद को जानने की उत्‍सुकता में वो घर के सबसे एकांत कमरे, पिता की लाइब्रेरी में गया. ये रहस्‍य खुद को छूकर, महसूस करके ही ढूंढा जा सकता था. वो कमरे में अकेला था. उसने अपनी पैंट नीचे खिसका रखी थी और दुनिया से बेखबर अपने साथ गुम था. तभी अचानक दरवाजा खुला और पिता अंदर आए. ये सब इतना अचानक था कि ओरहान को छिपने या खुद को छिपाने का मौका ही नहीं मिला. पिता दरवाजे से कुछ कदम पर ठिठक गए. बिना कपड़ों के सामने खड़े बेटे पर उनकी नजर पड़ी, कुछ सेकेंड देखा और फिर “ओह सॉरी” बोलकर दरवाजा बंद करके चले गए. उनके चेहरे पर न तनाव, न गुस्‍सा, न शॉक. सिर्फ “ओह सॉरी” और फिर दरवाजा बंद करने की आवाज. ओरहान ने लिखा है कि जब पिता ने सॉरी बोला और दरवाजा बंद किया तो बड़े आदर से देखा. उनके चेहरे पर वयस्‍कों वाली शालीनता के भाव थे. 40 साल बाद भी ओरहान को ये बात याद रही और ये भी कि देह को लेकर वो उस कच्‍ची उम्र में और फिर जीवन में कभी शर्मिंदा नहीं हुए.

कुछ ऐसी ही घटना का जिक्र स्‍वीडिश फिल्‍मकार इंगमार बर्गमैन की आत्‍मकथा “द मैजिक लैंटर्न” में भी है. फर्क सिर्फ इतना है कि उनके पिता ने इस बात पर उन्‍हें बेल्‍ट से मारा था.

मैजिक लैंटर्न पढ़ने के बाद मुझे समझ में आया कि बर्गमैन की फिल्‍मों में इतना अंधेरा क्‍यों था.

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