असम: निहत्थों पर किसने चलवाई गोलियां?

असम में उठा बवाल खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है, गोलाघाट में मंगलवार को हुई पुलिसिया कार्रवाई के खिलाफ जबरदस्त आक्रोश दिखाई दे रहा है।

  • News18India
  • Last Updated: August 20, 2014, 3:56 PM IST
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नई दिल्ली। असम में उठा बवाल खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है, गोलाघाट में मंगलवार को हुई पुलिसिया कार्रवाई के खिलाफ जबरदस्त आक्रोश दिखाई दे रहा है। लेकिन इन सब के बीच और बुरी खबर ये है कि राज्य और केंद्र सरकार में आपस में ठन गई है, एक दूसरे पर वार पलटवार हो रहा है।

एक तरफ वर्दीधारी, हथियार बंद, और उनके सामने आम लोग। गोली चलने लगी, एक के बाद एक गोलियां। बिल्कुल सीधे, लोगों की तरफ निशाना लगा कर। एक के बाद एक कई गोलियां दागी गईं, निहत्थे नागरिकों पर गोलीबारी।
आखिर असम के गोलाघाट में मंगलवार को इस तरह से गोलियां चलाने का इन्हें आदेश किसने दिया? आखिर किसके कहने पर ये निहत्थी आम जनता पर इस तरह से निशाना साध रहे थे? असम सरकार ने सफाई दी कि ये गोलियां रबर की थीं।

देश के ही एक हिस्से में दो राज्य के लोग सीमा के विवाद में एक दूसरे के खून के दुश्मन बने हुए हैं, और उस दुश्मनी पर भी सियासत, भले ही असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई कह रहे हों कि रबर की बुलेट फायर की गई है, लेकिन बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। विरोध प्रदर्शन करने वालों को जमकर पीटा गया। महिलाओं पर भी लाठियां चलाई गई।
ये विवाद 12 अगस्त से ही सुलग रहा था, जब नगालैंड सीमा से सटे गोलाघाट में कुछ नगा उपद्रवियों ने हमला बोलकर असम के नौ लोगों को मौत के घाट उतार दिया। करीब सवा सौ घरों में आग लगा दी। नगालैंड का कहना है कि गोलाघाट उनका है, जबकि असम सरकार उसके दावे को खारिज करती रही है।


इस घटना के बाद असम के गोलाघाट जिले के सात गावों के करीब 10 हजार लोग अपना घर छोड़ कर भाग गए हैं। हांलाकि बाद में जवाबी कार्रवाई करते हुए असम सरकार ने आर्थिक नाकेबंदी शुरु की। आरोप है कि सड़क जाम कर माल ले जा रहे ट्रकों को नगालैंड जाने से रोक दिया गया। मंगलवार को भी पुलिस और सुरक्षा बलों के जवान यही जाम खुलवाने के लिए पहुंचे थे, जिसके बाद बवाल शुरु हुआ।
असम सरकार का कहना है असल में केंद्र सरकार की उदासीनता इस बवाल की जिम्मेदार है। जब राज्य सरकार और केंद्र सरकार एक दूसरे पर तोहमत डालने में जुटी हुई थी उस वक्त भी असम का गोलाघाट सुलग रहा था। यहां अब भी लोगों की जानें जा रही हैं, हिंसा दिन रात उग्र होती जा रही हैं। जाहिर है सिर्फ तोहमत लगाने से जिम्मेदारी से नहीं बचा जा सकता है, लोगों की जान सियासत से ज्यादा कीमती है। जब तक इस पर सियासत खत्म नहीं होगी तब तक मसले का हल निकलना मुश्किल है।



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