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सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया 214 खदानों का आबंटन

सुप्रीम कोर्ट ने 1993 से लेकर 2010 के बीच आबंटित 214 कोयला खदानों का आबंटन रद्द कर दिया है। इस दौरान आबंटित सिर्फ चार खदानों को कोर्ट ने जनहित में छोड़ दिया है।

  • News18India
  • Last Updated: September 24, 2014, 6:21 AM IST
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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने 1993 से लेकर 2010 के बीच आबंटित 214 कोयला खदानों का आबंटन रद्द कर दिया है। इस दौरान आबंटित सिर्फ चार खदानों को कोर्ट ने जनहित में छोड़ दिया है। इससे पहले कोर्ट ने इन सभी खदानों को गैरकानूनी करार दिया था क्योंकि इन के आबंटन में नियम कानून का पालन नहीं हुआ था। कोर्ट के फैसले का सरकार ने स्वागत किया है लेकिन कारोबार जगत के लिए इसे एक बड़ा झटका माना जा रहा है।

एनडीए से लेकर यूपीए तक, कई राज्य सरकारों से लेकर केंद्र तक, कोयला खदान आबंटन घोटाले में सभी के हाथ रंगे थे। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने कोयला खदान आबंटन को लेकर चल रही अटकलबाजी को खत्म कर दिया। फैसले के मुताबिक 1993 से लेकर 2010 के बीच हुए सभी कोयला खदानों के आबंटन रद्द किए जाते हैं। लेकिन सिर्फ चार खदानों पर फैसले का असर नहीं होगा। इन में से दो खदान सासन में हैं जिनसे बिजली उत्पादन के लिए मेगा पावर प्रोजेक्ट चल रहा है। तीसरा खदान कसरा में सरकारी कंपनी सेल की है जबकी चौथी खदान पार्की बरवाडी में एनटीपीसी के पास है। यानी 218 में से 214 खदानों का आबंटन रद्द कर दिए गया है।

रद्द 40 खदानों में कोयला निकालने का काम जारी है और वो छह महीने तक ये काम जारी रख सकती हैं। छह महीने में सरकार सभी खदानों को अपने अधीन कर लेगी। दोबारा आबंटन की प्रक्रिया सरकार तय कर सकती है। अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा कि हम फैसले का स्वागत करते हैं क्योंकि पहले कोर्ट ने सारे आबंटन रद्द करने की बात कही थी लेकिन अब सरकार की बात कोर्ट ने सुनी है।




इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने सभी कोयला खदानों को गैर-कानूनी करार दिया था। कोर्ट ने माना था कि आबंटन में किसी भी नियम या दिशानिर्देश का पालन नहीं हुआ। सीएजी की रिपोर्ट से भी ये जाहिर हुआ था कि इस घोटाले से सरकार को 1.86 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। लेकिन कारोबार जगत का ये मानना है कि खदानों का आबंटन रद्द करने से देश भर की अर्थव्यवस्था और खासतौर पर बिजली उत्पादन पर असर पड़ेगा। उनका कहना था कि इन खदानों में लगभग ढाई लाख करोड़ रुपये का निवेश हो चुका है और हजारों लोगों को इनसे रोज़गार मिला है। हालांकि याचिकाकर्ता इसे प्रोपेगेंडा बताते हुए कहते हैं कि सिर्फ 6 फीसदी बिजली का उत्पादन इन खदानों से हो रहा था।
केंद्र सरकार ये चाहती थी कि इस मामले पर कोर्ट जल्द अपना फैसला दे ताकि आबंटन की प्रक्रिया नए सिरे से शुरू की जा सके। सरकार ने हलफनामा देकर ये कहा था कि आबंटन रद्द होने कि स्थिति में वो हर तरह के हालात से निपटने को तैयार है।
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