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ब्लॉगः मैं गवाह हूं तबाही का!

खालिद हुसैन
Updated: October 29, 2014, 6:19 AM IST
ब्लॉगः मैं गवाह हूं तबाही का!
जब जलसैलाब ने जन्नत में जहन्नुम जैसे हालात बना दिए थे तब आईबीएन7 रिपोर्टर खालिद हुसैन पूरे हौसले के साथ लोगों तक खबरें पहुंचाने के मिशन में जुटे थे।

जब जलसैलाब ने जन्नत में जहन्नुम जैसे हालात बना दिए थे तब आईबीएन7 रिपोर्टर खालिद हुसैन पूरे हौसले के साथ लोगों तक खबरें पहुंचाने के मिशन में जुटे थे।

  • Last Updated: October 29, 2014, 6:19 AM IST
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जब धरती का स्वर्ग अपने इतिहास की सबसे भीषण तबाही से जूझ रहा था। जब जलसैलाब ने जन्नत में जहन्नुम जैसे हालात बना दिए थे तब आईबीएन7 रिपोर्टर खालिद हुसैन किन हालात में लोगों तक खबरें पहुंचाने के मिशन में जुटे थे? कैसे अपने परिवार, रिश्तेदारों की सलामती की चिंता के बीच बाढ़ की कवरेज में जी-जान लगा रहे थे? पढ़ें खुद उन्हीं की कलम से लिखी उनके हौसले और जुनून की ये सच्ची कहानीः-

दिन भर बारिश में भीगने के बाद शाम के तकरीबन चार बजे मैं और मेरा सहयोगी अली मुहम्मद अपने दफ्तर पहुंचे। दफ्तर की गाड़ी कुछ दिन से मैं खुद चला रहा था क्योंकि ड्राइवर के घर में पानी भर चुका था और वो पानी में फंसा था। लगातार पांचवां दिन था लेकिन जम्मू कश्मीर में बारिश थमने का नाम नहीं ले रही थी। लेकिन इस दिन 6 सितंबर को मौसम विभाग ने कहा था कि शाम के सात बजे के बाद बारिश में कमी होगी।
अबतक दक्षिणी कश्मीर के कई इलाके डूब चुके थे और दक्षिणी श्रीनगर जिले के बाहरी हिस्से भी इसके जद में आ चुके थे। हम दिनभर कई जगहों पर होकर आए थे जहां लोग काफी चिंता में थे। ये ऐसे इलाके थे जहां अक्सर पानी भर जाता था। आज मैं एक ऐसी महिला से मिला, जिसका घर बह गया था और वो पड़ोसियों के घर शरण लिए हुए थी। उसके आंसू और दर्द अब भी मेरी आत्मा पर बोझ की तरह थे।
दफ्तर पहुंचकर पहले हमने कपड़े सुखाए। सुबह से कुछ खाया भी नहीं था। शुक्र था कि हमारा दफ्तर एक होटल में है जहां से हमें खाने को कुछ मिला। रिपोर्ट फाइल करने बैठा तो दिल्ली में ऑफिस से फोन मिला कि मेरा सहयोगी चांदीघर से मेरी मदद के लिए यहां पहुंच रहा है। मैंने रिपोर्ट फाइल की तो मुझे दफ्तर से बताया गया कि शाम 6 बजे चैनल पर मुझे लाइव होना है। इतने में मेरा सहयोगी अमित चौधरी और उसका कैमरामैन भी मुश्किल से दफ्तर पहुंचे, क्योंकि एयरपोर्ट से शहर तक के रास्ते पर पानी भरना शुरू हो गया था।



अमित से कुछ देर बात करने के बाद मैं ओबी वैन में जहांगीर चौक पहुंचा। यहां से लाइव के दौरान ही बारिश थम गई और आसमान साफ होता दिखने लगा। सूरज की हल्की रोशनी ने मेरे और जहांगीर चौक पर, मेरे आसपास खड़े लोगों के चेहरे पर मुस्कान आ गई। लग रहा था कि सब कुछ ठीक हो गया। घड़ी भर को मुझे लगा कि खुदा ने मेरी सुन ली, क्योंकि लाइव चैट में मैंने कहा था कि हम सब खुदा से दुआ कर रहे हैं कि बारिश थम जाए। खैर ओबी डाउन कर हम ओबी के लिए तेल की तलाश में निकले मगर दर्जनों पेट्रोल पंपों से हमें निराश लौटना पड़ा क्योंकि चार दिन से कश्मीर को देश से जोड़ने वाला राजमार्ग बंद पड़ा था।
उधर अमित के कई फोन तबतक मुझे मिले कि भाई कहां हो। हम बिना तेल लिए दफ्तर पहुंचे। रास्ते में झेलम को देखकर खौफ लगा। ऐसा लगा कि इसकी नीयत ठीक नहीं है, मगर बारिश के थमने ने मुझे इस सोच से दूर रखा कि कुछ बुरा घटने वाला है। आखिर हम दफ्तर पहुंच गए और अमित से बात करते-करते वक्त कब गुजरा पता भी नहीं चला। अमित दफ्तर के होटल में ही रुका था। मैंने उसके लिए कल की कवरेज के लिए गाड़ी का प्रबंध किया और अमित अपने कमरे में चला गया।


इतने में मुझे एक फोन मिला कि कुछ बचाए गए लोगों के लिए एक एनजीओ खाने-पीने का बंदोबस्त कर रहा है। मैं शूट करने निकला। वापस दफ्तर पहुंचा तो दस बजने वाले थे। मगर बारिश थमी हुई थी। आसमान लगभग साफ हो चुका था और तारे टिमटिमा रहे थे। मैं भी घर जाने की तैयारी में था। ऐसे में मेरे फोन की घंटी बजी। फोन दिल्ली दफ्तर से था। मुझे बताया गया कि दूसरे दिन सुबह 8 बजे का लाइव चैट मुमकिन नहीं मगर 7.30 तक सुबह मुझे फेक लाइव भेजना होगा।
मैंने घड़ी देखी तो 11 बज चुके थे। सोच में पड़ गया कि अगर घर गया तो कब पहुंचूंगा और कब लौटूंगा। फैसला किया कि मैं भी अपने सहयोगी अली मोहम्मद के साथ रात दफ्तर में ही गुजारूंगा। हम दोनों नीचे होटल के रेस्टोरेंट में गए, खाना खाया। यह होटल इस दिन पर्यटकों से भरा हुआ था। करीबन 60 कमरे बुक थे। सारे पर्यटक बेहद खुश थे क्योंकि बारिश थम चुकी थी। सभी अगले दिन का कार्यक्रम बना रहे थे। इसी शोर और हंसी में हमने खाना खाया और अपने कमरे में आए। बिस्तर लगा था। बदन टूट रहा था। कमरे में अली मोहम्मद ने कहा कि बाहर शोर हो रहा है। कह रहे हैं कि झेलम दरिया का पानी बांध के बराबर आ चुका है।
कुछ देर सोचकर मैंने सिगरेट जलाई। दरअसल मुझे झेलम याद आया जब शाम को मैं उसके किनारे से गाड़ी में सवार होकर गुजरा था। ना जाने क्यों मुझे लगा था कि इस दरिया की नीयत ठीक नहीं है। कुछ कश सिगरेट के लगाकर मैंने अली मुहम्मद से कहा हमें एक बार झेलम को देखकर आना चाहिए। तुरंत उसके इकरार पर हमने कपड़े लगाए और होटल से बाहर आकर झेलम के बांध पर पहुंचे। यकीन मानिए इस दरिया को मैंने जीवन में पहली बार इतना खौफनाक और डरावना देखा था।
हमने देखा कि लोग परेशान हैं। इस बांध के पास दुकानदार रेत भरी बोरियां रख रहे थे। कुछ दुकानों से सामान निकालने की कोशिश में लगे थे। आसपास रहने वाले लोग घरों से निकल रहे थे। अफरा-तफरी का माहौल था। मुझे झेलम को देखकर डर लगने लगा। इस दरिया के हाउस बोट मुझे रास्ते पर नजर आ रहे थे। पानी का बहाव इतना तेज था कि पहाड़ भी बह जाए। इस पानी में ना जाने क्या, मगर बड़ी-बड़ी चीजें बह रही थी। रात के अंधेरे में उन्हें पहचानना मुश्किल था।
हम और होटल के स्टाफ के लोग कुछ देर वहां खड़े रहे। मगर मुझे लगा कि ये जगह रात को रुकने के लिए सुरक्षित नहीं है। हमारे साथ होटल में हमारी ओबी का ड्राइवर अब्दुल मजीद भी था। उसका घर पानी में बह चुका था। मैंने सबसे पहले अपने सहयोगी पत्रकार अमित चौधरी को फोन कर होशियार किया और इतने में होटल के मैनेजर को भी मैंने सलाह दी कि बेहतर होगा कि होटल खाली करवाया जाए। उसने भी हालात को देखते हुए सभी पर्यटकों को, जो गहरी नींद में थे जगाया और बाहर जमा करना शुरू किया। इतने में अमित और उसका कैमरामैन अपना सामान लेकर नीचे आ गए। मेरा दिमाग बड़ी दुविधा में था कि दफ्तर छोड़ू या नहीं। मगर शाम को फैसला हुआ कि बेहतर हैं इस जगह से निकल जाया जाए।
हमने दफ्तर से कैमरा और कुछ सामान जितना हम उठा सकते थे, उठाया और निकले। अब हम पांच लोग थे। मैं और अली मोहम्मद, अमित उसका कैमरामैन और ओबी ड्राइवर। अब समस्या थी कि जाएं कहां। मैंने तय किया हम लोग अपने स्ट्रिंगर साथी मोहम्मद शफी के घर जाएंगे। वो पुराने शहर में रहता है। चलने की तैयारी हुई। गाड़ियों में सामान डाल दिया। हमारे पास होटल में चार गाड़ियां इस वक्त थीं। दफ्तर की गाड़ी जिसे मुझे खुद चलाना पड़ता था। मेरी अपनी महिंद्रा कार, ओबी वेन और ओबी ड्राइवर की अपनी गाड़ी, लेकिन हम पांच लोगों में से केवल तीन ही गाड़ी चलाना जानते थे। मैंने अली मोहम्मद को, अमित और उसके कैमरामैन को शफी के घर भेज दिया। ओबी ड्राइवर अपनी गाड़ी लेकर निकला और मैं उसके पीछे अपनी गाड़ी में निकला। उसने अपनी गाड़ी एक ऊंचाई वाली जगह पर रखी, फिर मेरे साथ वापस होटल आया। फिर उसने ओबी वहां से निकाली और हम शफी के घर पहुंचे।
एक ही कमरे में हम रात भर शफी के साथ बैठे रहे। काफी कठिन रात थी। जगह-जगह से पानी भरने की खबरें मिल रही थीं। इतने में मुझे पता चला कि इकलौता महिला अस्पताल के पास झेलम का बांध टूट गया है और पानी अस्पताल में भरने लगा है। कुछ देर बाद फिर एक मैसेज मिला की राज बांध के सामने हैट्रिक रेस्टोरेंट के पास दूसरी जगह झेलम का बांध टूट गया और पानी रिहाइशी इलाकों की ओर जा रहा है। मैंने जवाहर नगर में रहने वाले एक रिश्तेदार को फोन पर बताया कि बेहतर होगा कि वो घर से निकले मगर शायद सभी की तरह उसे भी यह यकीन था कि इन इलाकों में कभी पानी नहीं भरेगा। मेरा एक दोस्त ईटीवी का मनोज कॉल भी रात को दफ्तर में ही रुका था। मगर उनका दफ्तर काफी खतरे वाली जगह पर था और मेरा एक और साथी सीएनएन-आईबीएन का वीडियो पत्रकार बशीर भी जवाहर नगर में ही था। मैं सुबह तक इन दोनों को फोन करने की कोशिश में लगा रहा मगर कामयाब नहीं हुआ। खैर आंखों-आंखों में रात किसी तरह कटी। सुबह हुई मस्जिद की अजान के साथ ही हम भी जागे। अजान से महसूस हुआ कि शहर जिंदा है।
शफी के घर से मैं अपनी टीम और अमित के साथ कवरेज के लिए निकला। मैंने अमित को दफ्तर छोड़ा और खुद ओबी वैन के पास जहांगीर चौक चला गया। 8 बजे का लाइव चैट था जहांगीर चौक में मुझे नहीं लगा कि मैं किसी चौक पर खड़ा हूं। मेरे आगे-पीछे झेलम का पानी रास्तों पर बह रहा था। जब तक मैंने लाइव चैट खत्म किया पानी मेरे घुटनों तक आ गया था। पास ही इलाके में मकानों की निचली मंजिल की खिड़कियों से पानी के फव्वारे बहने लगे। इलाके में स्थित कोर्ट, सचिवालय में पानी भरने लगा था। सदियों पुराना बाड़शा पुल बंद कर दिया गया। मुझे भी इशारा मिला कि यह पानी आज कहर ढाने वाला है। ओबी डाउन कर हम लाल चौक पहुंचे। यहां शहर खौफजदा दिख रहा था। हर कोई भागता दिख रहा था। सामने कुछ ही देर पहले खड़ा हरा-भरा चिनार का पेड़ मुंह के बल जमीन पर गिरा पड़ा था।
इतने में अमित मुझे फिर मिला। हम सब एक ही गाड़ी में बैठकर अपने दफ्तर के सामने पहुंचे। वहां देखा हमारा दफ्तर जिस होटल में था उसके मुख्य दरवाजे से झेलम का पानी बह रहा था। यहां से भी बहुत जल्द हमको निकलना पड़ा। पूरा शहर झील में बदल रहा था। हम एक पुल पर पहुंचे। यहां हमें सुरक्षित महसूस हुआ तो वहां खड़े हम रिपोर्टिंग करते रहे। इस दिन प्रधानमंत्री भी राज्य के दौरे पर थे। रिपोर्टिंग के दौरान तकरीबन दिन के एक बजे मुझे मेरी पत्नी के भाई ने फोनकर लड़खड़ाती आवाज में कहा कि पानी जवाहर नगर में उनके मकान में दूसरी मंजिल तक पहुंच चुका है। उसने मुझसे मदद की उम्मीद करते कहा कि मैं उसे बचा लूं। वह अपनी पत्नी और छोटे-छोटे दो बच्चों के साथ अपने मकान की तीसरी मंजिल पर टिन की छत के नीचे फंसा था। उसके फोन के बाद मैंने उन सब लोगों को फोन किया जो मेरे फोन में वीआईपी के तौर पर फीड थे मगर कोई कुछ नहीं कर पाया।
इतने में शहर के विभिन्न इलाकों से जानने वालों के फोन मदद के लिए आने लगे। मगर बेबसी का आलम ये था कि इन सभी लोगों को दिलासे देने के अलावा कुछ करने की स्थिति में मैं नहीं था। अचानक मुझे घर फोन करने का ख्याल आया। जैसे ही फोन किया तो फोन पर मेरी पत्नी की आवाज फूली हुई थी। पूछने पर पता चला कि पानी हमारे घर के आंगन में दस्तक दे चुका था। वो लोग निचली मंजिल का सामन ऊपर शिफ्ट कर रहे थे। मगर अब मुझे एहसास हो चुका था कि पानी की नीयत ठीक नहीं और मुझे अपने पिता की बात याद आई कि जब छानापोरा में स्थित हमारे घर में बाढ़ का पानी आएगा, तब पूरा शहर डूबेगा।
इस सबने मुझे पागल कर दिया। अपने दो साल के बेटे की तस्वीर मेरी आंखों में घूमने लगी। उसकी आवाज मुझे जैसे बुला रही हो। मैं एकदम से परिवारवालों पर गुस्से से बरस गया। मुझे पता था कि अगर ये लोग फंसे तो मैं उन्हें बचा नहीं पाऊंगा। मैंने उन्हें तुरंत घर छोड़कर एक रिश्तेदार के घर जाने को कहा। इतने में मुझे फिर अपने रिश्तेदार का फोन आया जो जवाहर नगर में अपने मकान की तीसरी मंजिल में फंसा था। उसकी आवाज लड़खड़ाई हुई थी। मैं समझ पा रहा था कि सब कुछ ठीक नहीं है। मैंने उसे कहा कि मुझे एक घंटे का टाइम दो मगर जवाब मिला एक घंटा बहुत है शायद तब तक देर हो जाएगी। बेबसी ऐसी थी कि मुझे खुद के होने पर शर्म आने लगी थी।
इतने में दिल्ली के ऑफिस ने कहा कि मेरा लाइव चैट 6.30 बजे शाम को फिर होगा। इस वक्त शाम के 4 बजे थे। हम सब लोग परेशान थे। फिर एक और कयामत टूट पड़ी, सभी मोबाइल फोन बंद हो गए। सबका एक-दूसरे से संपर्क खत्म हो गया। इतने में खबर मिली कि जहां हम खड़े थे, उसके दूसरी तरफ पुराने शहर की ओर से भी पानी भरने लगा है। क्योंकि डल झील में भी झेलम का पानी जाने लगा था। हमने भी फैसला किया कि इस जगह को छोड़कर हम पुराने शहर की ओर चले जाएं। सुबह से यह चौथी जगह थी जहां से हमें भागना पड़ रहा था। हमारे लिए जमीन कम हो रही थी। हम इस जगह को छोड़कर दूसरे इलाके में चले गए। रात वहीं कटी, मगर रात नहीं यह कयामत थी। बिस्तर में रात भर करवटें बदलने के अलावा कुछ नहीं हो पाया। क्योंकि किसी का किसी से संपर्क नहीं था।
हमारे साथ एक दूसरे चैनल का रिपोर्टर भी था। उसका परिवार भी ऐसी जगह था जहां पानी भर जाने की पूरी आशंका थी। मुझे भी अपने परिवार का कुछ पता नहीं था। सीएनएन-आईबीएन की टीम के कैमरमैन के घर में भी पानी भर चुका था। सभी परेशान थे। सुबह होते ही जब हम निकले तो जैसे-जैसे हम लाल चौक की और बढ़ने लगे तो लोगों के चेहरे से साफ लगता था कि सब कुछ ठीक नहीं है। हर कोई भागता दिख रहा था। हम पुराने शहर के खनियार इलाके में पहुंचे तो आगे रास्ता बंद था। हमने गाड़ी मोड़ी और दूसरा रास्ता लिया लेकिन वहां भी पानी भर चुका था। लोग सामान निकाल रहे थे। मशहूर हजरत बल दरगाह जाने वाले रास्ते पर किश्तियां चल रही थीं। हम कैमरा खोल नहीं पाए। लोगों में काफी गुस्सा था। हमने वापस गाड़ी मोड़ ली।
ओबी सुरक्षित कर हमने वॉक-थ्रू कर सभी हालात बताए और ओबी अप कर ओबी से ऑफिस से संपर्क कर फीड भेजी। फिर हम निकले और अपना परिवार भुलाकर इस कयामत की बाढ़ की कवरेज में लग गए। मैंने जो कुछ देखा उसकी कल्पना मैंने कभी नहीं की थी। छतों पर मकानों में फंसे लोग मदद के लिए पुकार रहे थे, मगर सब बेबस। तीन दिन तक मैं यह बेबसी देखते रहा। जहां हो सका, मैं भी मदद करता रहा। मगर जो लोग बाढ़ में फंसे नहीं थे। वो युवा किश्तियों को लेकर उन इलाकों में जा रहे थे जहां लोग फंसे थे। कहीं पानी और खाना पहुंचाया जा रहा था तो कहीं लोगों को बचाने की प्रक्रिया चल रही थी। वायुसेना, सेना और एनडीआरएफ भी बचाव में जुटी थीं। मैं कई-कई किलोमीटर पैदल या नाव में चलकर लोगों की दिक्कतें कवर करता रहा। जब भी घर-परिवार की याद आती तो माइक उठाकर वॉक-थ्रू करता। लोगों का दर्द देखकर अपना दर्द भूल जाता।
तीसरे दिन मैं पहुंचा राजभवन। ये वो इलाका है, जहां आम दिनों में ऐसी सुरक्षा रहती कि परिंदा भी पर नहीं मार सकता था। मगर आज ये आम जनता के लिए खोल दिया गया था। तब तक वायु सेना, सेना, एनडीआरएफ और आम लोगों के द्वारा जो लोग बचा लिए जाते उन्हें ऊंची जगहों पर लाया जाता। जिनमें राजभवन भी एक जगह थी। यहां सैकड़ों की तादाद में पर्यटक थे। जिन्हें यहां से हेलीकॉप्टर से एयरपोर्ट लाया जाता था। हर तरफ हाहाकार मचा था। अस्पताल, दफ्तर, कोर्ट सब पानी में थे। दर्जनों जगहों पर राहत कैंप चल रहे थे। आम लोगों ने अपने घरों को बाढ़ पीड़ित लोगों के लिए खोल दिया था। क्या अमीर, क्या गरीब, क्या अफसर, क्या मजदूर सब बेबस थे। आज मुझे एहसास हुआ कि कुदरत के सामने कोई स्पेशल नहीं। जब उसका कहर आता है तो हर किसी पर बराबर वार करता है।
चौथे दिन पानी का बढ़ना बंद हुआ। मैं इस दिन राजबाग और जवाहर नगर जब आया तो पानी एक-दो इंच कम हुआ था। एक होटल की छत से मैंने वॉक-थ्रू कर हालात बताए। इस दिन हम कुछ अस्पतालों में भी गए जो खुद मरीज दिख रहे थे। बाढ़ तो थमी थी मगर अब खतरा था महामारी का क्योंकि सभी अस्पताल बेकार हो चुके थे। मैंने अपनी रिपोर्ट में सरकार का इस और ध्यान खींचने की कोशिश की। दर्जनों एनजीओ भी कश्मीर में काम शुरू कर चुके थे। देश भर से दवाएं, राशन कश्मीर पहुंच रहा था। राहत की बात थी कि एयरपोर्ट काम कर रहा था। मगर एयरपोर्ट से यह राहत सामग्री बांटना बेहद मुश्किल काम था। इस दिन मुझे कुछ राहत तब मिली जब एक पुलिस कंट्रोल रूम से मुझे पता चला कि जिस जगह मैंने अपने परिवार को जाने को बोला था वहां का पुलिस स्टेशन काम कर रहा था। मुझे उम्मीद जगी कि वहां सब ठीक होगा।
शाम को मैंने ओबी से दिल्ली बात की और मेरे सहयोगी रवि प्रताप जो डेस्क पर था मैंने कहा कि मेरे भाई जो जम्मू में हैं उनसे बात करवा दें। उन्होंने तुरंत नंबर मिलाया मगर मैं अपने भाई की आवाज सुन नहीं पा रहा था। मैंने रवि से कहा कि वो सुनें और मुझे बताएं। रवि ने जब मुझे ये कहा कि मेरे भाई की बात मेरे परिवार से हुई है और वो ठीक है तो मेरी आंखों से आंसू निकल पड़े। पांचवें दिन मैंने और सीएनएन-आईबीएन के रिपोर्टर ने फैसला किया कि आज शाम को कवरेज के बाद हम घर जाएंगे।
बस काम खत्म कर हमने ऐसा ही किया। हम कई किलोमीटर पैदल चले फिर एक नाव में सवार हुए और फिर पानी में आधा-आधा जिस्म डुबाकर चलना पड़ा तो हम झेलम के उस पार पहुंच पाए। जो मैंने देखा मुझे किसी भी पल नहीं लगा कि यह मेरा शहर है जिसे मैंने कुछ दिन पहले देखा था। तबाही का ऐसा आलम मैंने कभी नहीं देखा था। गिरे हुए मकान, लगभग हर मकान की दीवार गिर चुकी थी। रास्तों पर लोगों की भीड़ थी। कोई अपने को तलाश रहा था तो कोई राशन-पानी बांट रहा था। जो चल रहा था उसे मुश्किल से एहसास हो रहा था कि वो जिंदा है।
इन सबके बीच हम भी चलते गए। रामबाग के पास हमको एक जीप ने हमारी गुजारिश पर बैठाया और मैं अपने रिश्तेदार कर घर के बाहर पहुंचा। यकीन नहीं हो रहा था कि मैं परिवार से मिलने वाला हूं। मानो हिम्मत नहीं हो रही थी। मैं उस घर के अंदर गया तो एकदम खामोशी थी। सामने मेरा दो साल का बेटा था। जैसे ही उसने मुझे देखा आधे मिनट तक देखता रहा। फिर वो चिल्ला-चिल्लाकर रोने लगा और गले से लिपट गया। इतने में मेरी पत्नी बाहर आई और चेहरे पर मुस्कान और आंखों से आंसू टपकाती रही। दोनों बड़े बेटे भी मेरे पास पहुंचे और करीब आधे घंटे तक हम लोग बस एक-दूसरे के साथ बैठे रहे और बस रोते रहे, हंसते रहे।
ये जन्नत फिर महकेगी मुझे यकीन है। फिर झेलम और डल झील में पर्यटक इस जन्नत के नजारे लूटेंगे मुझे यकीन है।
First published: October 29, 2014, 6:19 AM IST
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