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22 साल बाद आज फिर अयोध्या वहीं खड़ी है

News18India
Updated: December 6, 2014, 3:55 PM IST

आज 6 दिसंबर है, बाबरी कांड की 22 वीं बरसी। रामलला के बनवास के 22 साल। खुले आसमान के नीचे एक तंबू में ठिठुरते रामलला के 22 साल।

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  • Last Updated: December 6, 2014, 3:55 PM IST
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नई दिल्ली। आज 6 दिसंबर है, बाबरी कांड की 22 वीं बरसी। रामलला के बनवास के 22 साल। खुले आसमान के नीचे एक तंबू में ठिठुरते रामलला के 22 साल। हाईकोर्ट के फैसले के बाद भी इस मामले का कोई ठोस हल अब तक नजर नहीं आ रहा। केंद्र में नई सरकार आने के बाद एक बार फिर अयोध्या खबरों में है।

रामजन्म भूमि न्यास ने एक बाहर फिर अयोध्या में रामजन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के लिए आवाज बुलंद की है। न्यास के अध्यक्ष नृत्य गोपाल दास का कहना है कि दिल्ली में पूर्ण बहुमत की सरकार है इसलिए अब अयोध्या में कानून बनाकर मंदिर निर्माण होना चाहिए।

22 साल बाद एक बार फिर अयोध्या वहीं खड़ी है। कड़ी चौकसी, हथियारबंद सिपाही, जामातलाशी। लोगों के चेहरे पर थोड़ा कौतुक थोड़ा चौकन्नापन। लेकिन अयोध्या को अब इसकी आदत पड़ गई है। हर साल 6 दिसंबर आते ही बाबरी कांड की यादें ताजा हो जाती हैं। माहौल में थोड़ी सरगर्मी बढ़ जाती है। इस बार भी सतह पर सबकुछ वैसा ही है, लेकिन चूंकि अब केंद्र में बीजेपी की सरकार है तो मंदिर पक्ष का हौसला थोड़ा बुलंद है।

रामजन्मभूमि आंदोलन से जुड़े नेताओं की एक बड़ी तादाद बीजेपी में है। पार्टी इस आंदोलन की समर्थक रही है इसलिए जब पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में हैं तो अब मंदिर निर्माण की मांग भी जोरों पर है। राम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास एक साल के भीतर मंदिर निर्माण की पहल शुरु करना चाहते हैं। उनका कहना है कि अब समझौते से नहीं संसद में कानून बनाकर मंदिर का निर्माण करें।

उधर बाबरी मस्जिद से जुड़ा पक्ष 22 वीं बरसी पर शोक मनाता नजर आया। फैजाबाद में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी और अन्य संगठनों से जुड़े लोगों ने उसी तर्ज पर शोक सभा की जिस तरह पहले करते आए हैं। उन्हें अब भी बाबरी के लिए इंसाफ का इंतजार है।

फैजाबाद में बाबरी विध्वंस के दिन काला दिवस के रूप में मना रहे हैं। लेकिन जिस अंदाज में अब राम मंदिर की मांग उठ रही है। उसे लेकर सिर्फ अयोध्या और फैजाबाद में ही नहीं पूरे सूबे में अलग तरह की सुगबुगाहट है। अयोध्या में अंदर-अंदर एक बयार ये भी बह रही है कि राम मंदिर का निर्माण जल्द ही शुरु हो जाएगा। ये चर्चा कहां से आई कोई नहीं जानता लेकिन अयोध्या के लोग मानने लगे हैं कि 6 दिसंबर की घटना को स्थानीय लोग भूलने लगे हैं।

वहीं इस मामले को लंबे समय से देख रहे पत्रकार और वुद्धिजीविय़ों का एक वर्ग भी मान रहा है कि इस मसले पर दोनों पक्षों के बीच समझौते की कोई संभावना नहीं है। इसलिए बेहतर है कि कानून बनाकर इस मसले का समाधान कर लिया जाए। जाहिर है ये महंत रामचंद्र दास की ही लाइन है।
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जानकारों की राय में अंदर ही अंदर काफी कुछ पक रहा है। सतह पर वो भले न दिख रहा हो लेकिन मोर्चेबंदी जारी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र बनारस से मुस्लिम महिलाओं के एक ग्रुप ने प्रधानमंत्री को एक पत्र भेजा है। इस पत्र के जरिए मांग की गई है कि अयोध्या में विवादित स्थल पर मंदिर बनाया जाए। राम हमारे भी पूर्वज थे।

बनारस मुस्लिम महिलाओं ने पीएम मोदी के संसदीय कार्यालय में ज्ञापन देकर राम मंदिर निर्माण के लिए ज्ञापन दिया है। नाजनीन अंसारी ने कहा कि हम मोदी जी के दफ्तर में ज्ञापन देने आए हैं। बाबर ने राम मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई थी। वो तो मंगोल था। उसने खलीफा का कत्ल किया था। वो कैसे मुसलमानों का हितैशी हो सकता है। कोई भी अपना धर्म और जाति बदल सकता है लेकिन अपने पूर्वजों को नहीं। राम मंदिर बनना चाहिए।

जाहिर है ये भी एक चौंकाने वाली मांग है जो एक ऐसे कोने से उठी है जिसकी उम्मीद नहीं थी। लेकिन कुछ लोगों की नजर में ये महज एक चुनावी स्टंट है उससे ज्यादा कुछ नहीं। अयोध्या के मामले को इस तरह गर्माया जा रहा है कि वो 2017 तक चुनाव के लिए बीजेपी के पक्ष में माहौल बना दे। साधु संत सरकार का विरोध करने के नाम पर, राम मंदिर के नाम पर दरअसल बीजेपी के ही पक्ष में माहौल बना रहे हैं।

बहरहाल अयोध्या हाल के दिनों में तीर्थ यात्रियों के लिए अहम हो गई है। आज से 22 साल पहले जिस अयोध्या में कारसेवक आए थे। उससे पहले उस अयोध्या में केवल पास पड़ोस के जिलों के तीर्थ यात्री 14 कोसी परिक्रमा के लिए आते थे। आज उस अयोध्या में दूर दराज से यात्री आ रहे हैं। इनमें बड़ी तादाद गुजरात, महाराष्ट्र के अमीर तीर्थयात्रियों के साथ-साथ दक्षिण भारतीय तीर्थयात्रियों की भी है। तीर्थयात्रियों की इस बड़ी तादाद ने कुछ बड़ी हॉस्पीटैलिटी चेन का ध्यान भी अयोध्या की ओर गया है। जानकारों की मानें तो वो अयोध्या में चोरी छिपे जमीनों के लिए मोल भाव भी करने लगे हैं।

हाशिम अंसारी ने चौंकाया

हाशिम अंसारी वो शख्स हैं जिन्होंने रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद का पूरा इतिहास अपनी आंखों के आगे गुजरते देखा है। 97 साल के हाशिम अंसारी बाबरी मस्जिद के सबसे पुराने और असल मुद्दई हैं। अंसारी ने अचानक बाबरी मस्जिद का मुकदमा न लड़ने और रामलला को आजाद देखने की ख्वाहिश का इजहार कर सबको चौंका दिया है। हाशिम अंसारी का दर्द ये है कि बाबरी मस्जिद बनाम राम्रुान्मभूमि की जंग में रामलला हाशिए पर चले गए हैं। हाशिम अवध के खांटी बुजुर्ग हैं जो जंग की भी मर्यादा जानते हैं। उनकी लड़ाई सिद्धांतों की है मगर रामलला से उनका कोई बैर नहीं है। दरअसल कई मायनों में वो मंदिर वालों के मुकाबले रामलला के ज्यादा करीबी हैं, क्योंकि अपनी पैदाइश से ही वो रामलला के पड़ोसी हैं।

हाशिम अंसारी 1949 में इस विवाद की शुरुआत से ही मुकदमें से जुड़े हैं। ऐसा नहीं है कि उनका हृदय परिवर्तन हो गया है या उन्होंने पाला बदल लिया है। सुन्नी वक्फ बोर्ड ने 1961 में पहली बार इस मुकदमे में उनकी गवाही कराई। ये गवाही डेढ़ सौ से ज्यादा पन्नों की थी। लेकिन इन दिनों वो समाजवादी सरकार के मंत्री आजम खान से खफा हैं। आग में घी का काम किया है आजम खान के उस बयान ने जिसमें उन्होने कहा था कि अयोध्या में तो मंदिर बन ही चुका है। उनका कहना है कि आजम मुलायम के साथ मिलकर सिर्फ उनके मुकदमे का फायदा उठा रहे हैं। हालांकि एक बुजुर्ग की नाराजगी से बेपरवाह आजम खान का कहना है कि, उनके हटने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

आजम खान सबसे पहले बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के जरिए ही चर्चा में आए थे। हालांकि बाबरी मस्जिद ऐक्शन कमेटी के मौजूदा संयोजक और वरिष्ठ वकील जफरयाब जिलानी का भी कहना है कि अंसारी के हटने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन वो इतना जरूर कहते हैं कि अंसारी को मना लिया जाएगा।

हालांकि हाशिम के इस बयान के बाद जन्मभूमि के पैरोकारों के चेहरे पर खुशी की लहर दिखी। कुछ नेताओं का कहना है कि अंसारी ने जीवन की आखिरी घड़ी में अच्छा फैसला किया है। जबकि राजनीतिक दल अंसारी के इस फैसले को शक की निगाह से देख रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि अंसारी दबाव में हैं। जाहिर है दबाव से उनका इशारा बीजेपी की ही ओर है।


1949 में शुरू हुआ विवाद
अयोध्या में राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद की शुरुआत 1949 से हुई। 22-23 दिसंबर 1949 की रात अचानक मस्जिद के भीतर राम लला की मूर्ति निकल आई। ये मूर्ति रखी गई थी या रखवाई गई थी इसे लेकर दावे से कुछ भी कहना मुश्किल है। लेकिन विश्व हिंदू परिषद के लोग एक मुस्लिम सिपाही अब्दुल बरकत से बयान का हवाला देकर कहते हैं कि मूर्तियां वहां प्रकट हुई थीं। इसमें फैजाबाद के तत्कालीन जिलाधिकारी के के नैयर की भूमिका भी संदिग्ध मानी जाती है। फिलहाल हाईकोर्ट के फैसले के बाद मामला अब सुप्रीम कोर्ट के हवाले है।

अब्दुल बरकत का ये बयान राम जन्मभूमि की कार्यशाला के बाहर मोटे-मोटे हर्फों में लिखा है। इस बयान में अब्दुल बरकत कहता है कि मस्जिद के भीतर से नीली रौशनी आ रही थी जिसे देख कर मैं बेहोश हो गया। बहरहाल शुरूआती मुद्दा सिर्फ़ ये था कि मूर्तियां मस्जिद के आंगन में स्थित राम चबूतरे पर वापस जाएं या वहीं उनकी पूजा अर्चना चलती रहे।

उस समय हिंदुओं की पंचायती संस्था निर्मोही अखाड़ा ने मस्जिद से सटे राम चबूतरे पर मंदिर बनाने का दावा किया था। जिसे अदालत ने ये कहते हुए ख़ारिज कर दिया था कि ऐसा होने से रोज़-रोज़ सांप्रदायिक झगड़े और ख़ून-ख़राबे होंगे। अदालत ने ये भी कहा कि इतिहास में हुई ग़लती को साढ़े तीन सौ साल बाद ठीक नही किया जा सकता।

जाहिर है विवाद 350 साल पुराना है लेकिन इसने जोर पकड़ा राजीव गांधी के कार्यकाल में। 1986 में शाहबानो केस में हाथ जला चुके राजीव गांधी ने अयोध्या का कार्ड इस्तेमाल किया। 1986 तक बंद पड़ी रही बाबरी मस्जिद का ताला अदालती आदेश के बाद खोला गया। इसी की प्रतिक्रिया में फ़रवरी, 1986 में बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति का गठन हुआ और मुस्लिम समुदाय ने भी विश्व हिंदू परिषद की तरह आन्दोलन और संघर्ष का रास्ता अख़्तियार किया।

राजीव गांधी ने 1989 में अपने चुनाव अभियान का श्रीगणेश फ़ैज़ाबाद में जन सभा कर राम राज्य की स्थापना के नारे के साथ किया था। चुनाव से पहले ही विवादित मस्जिद के सामने क़रीब दो सौ फुट की दूरी पर वीएचपी ने राम मंदिर का शिलान्यास किया, जो कांग्रेस से मुस्लिम समुदाय की नाराज़गी का कारण बना।

राजीव गांधी के कदम ने विश्व हिंदू परिषद का हौसला बुलंद कर दिया और मंदिर बनाने की उसकी कोशिशों ने जोर पकड़ा। 1990 में मुलायम सिंह यादव ने इस मामले में मुसलमानों की सहानुभूति हासिल करने के लिए परिंदा पर नहीं मार सकता जैसे बयान देकर हिंदुओं को उकसाया। यूपी पुलिस की चलाई गोलियों से कई कारसेवक मारे गए और आंदोलन ने आग पकड़ ली।

और दिन आया 6 दिसंबर 1992 का। सूबे में बीजेपी की सरकार थी। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से विवादित ढ़ांचे की रक्षा का वाद किया था। हजारों कारसेवकों की भीड़ इकट्ठा थी और अचानक भीड़ का रेला बीजेपी के बड़े नेताओं की मौजूदगी में विवादित परिसर में घुस गया। इसके बाद वो हुआ जिसकी उम्मीद नहीं थी।

बहरहाल इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने 30 सितंबर 2010 के अपने फैसले में विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बांट दिया। दो तिहाई हिस्सा मंदिर के नाम पर हिंदू पक्ष और रामलला को दिए गए जबकि एक हिस्सा मुस्लिम पक्ष को दिया गया। लेकिन अदालत के इस फैसले से मुस्लिम पक्ष संतुष्ट नहीं था। उसने सुप्रीमकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और सुप्रीमकोर्ट ने भी इस फैसले को असामान्य मानते हुए यथास्थिति बरकरार रखने का आदेश दे दिया। तब से रामलला बनवास झेल रहे हैं। विवादित स्थल की तीन स्तर की सुरक्षा व्यवस्था है जिसे पार करना किसी के लिए भी कठिन है और धर्म नगरी अयोध्या में राम के नाम पर कारोबार बदस्तूर जारी है।



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First published: December 6, 2014, 3:55 PM IST
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