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ये 10 नामी हीरे कब वापस लाएगी मोदी सरकार?

ये 10 नामी हीरे कब वापस लाएगी मोदी सरकार?

आईबीएनखबर ने विदेशों में रखी देश की अनमोल धरोहरों पर आधारित विशेष सीरीज शुरू की है ताकि लोग उनके बारे में जान सकें और उन्हें वापस लाने के लिए सरकार को नींद से जगा सकें।

आईबीएनखबर ने विदेशों में रखी देश की अनमोल धरोहरों पर आधारित विशेष सीरीज शुरू की है ताकि लोग उनके बारे में जान सकें और उन्हें वापस लाने के लिए सरकार को नींद से जगा सकें।

आईबीएनखबर ने विदेशों में रखी देश की अनमोल धरोहरों पर आधारित विशेष सीरीज शुरू की है ताकि लोग उनके बारे में जान सकें और उन्हें वापस लाने के लिए सरकार को नींद से जगा सकें।

    IBNKhabar Exclusive
    नई दिल्ली। भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था और इसकी बड़ी वजह थी विदेशी आक्रांताओं को यहां मिली आकूत दौलत। लेकिन इस दौलत में देश की कुछ धरोहरें ऐसी भी थीं जो अनमोल थीं। आईबीएनखबर ने ऐसी ही धरोहरों पर आधारित विशेष सीरीज शुरू की है ताकि लोग उनके बारे में जान सकें और उन्हें वापस लाने के लिए सरकार को नींद से जगा सकें। अपनी इसी कोशिश की पहली कड़ी में हम पेश कर रहे हैं देश के उन हीरों की जानकारी, जो हैं तो भारतीय लेकिन किसी दूसरे देश की शोभा बने हुए हैं।
    ऐसे हीरों में सबसे पहला नाम कोहिनूर का आता है, जो 105.6 कैरेट का है। इस हीरे की खासियत इसका रंगहीन होना है। कोहिनूर यूं तो आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले में स्थित कोलर की खान से निकला था, लेकिन इस समय ब्रिटेन की महारानी के ताज की शोभा बना हुआ है। ऐसे ही हीरों में दरिया-ए-नूर भी है, जो उच्च श्रेणी का 185 कैरेट का हीरा है। ये हीरा फिलहाल बांग्लादेश की राजधानी ढाका के सोनाली बैंक की तिजोरी में सुरक्षित रखा है और भारत को मुंह चिढ़ा रहा है।
    इसके अलावा रीजेंट, ब्रोलिटी ऑफ इंडिया, ओर्लोव, शाह डायमंड, आईडोल आई, ब्लू होप, ब्लैक ओर्लोव और ग्रेट मुगल जैसे हीरे भी इसी श्रेणी में आते हैं। ये हीरे फिलहाल रूस, फ्रांस, अमेरिका, बांग्लादेश जैसे देशों में हैं। इनको वापस लाने के बारे में जब हमने सरकारी योजनाओं को जानने का प्रयास किया, जो चौंकाने वाली जानकारी सामने आई। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने तो इस संबंध में भेजे गए मेल का कोई जवाब देना भी मुनासिब नहीं समझा। जबकि पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री डॉ महेश शर्मा ने कहा कि इस बारे में सरकारें लंबे समय से प्रयास करती रही हैं। मामला दूसरे देशों से जुड़ा होने के चलते इसमें ज्यादा कुछ नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि फिलहाल सरकार के पास इन धरोहरों से संबंधित कोई ठोस योजना नहीं है। लेकिन वो इस मुद्दे को पीएम नरेंद्र मोदी के सामने उठाएंगे।

    कोहिनूरः भारत का गौरव कहे जाने वाले कोहिनूर की बात करें तो ये इस समय ब्रिटेन की महारानी के ताज की शोभा बढ़ा रहा है। कोहिनूर को अकबर से लेकर शाहजहां तक ने पहना, फिर वो लुटकर ईरान चला गया और वापस भारत आया भी तो अंग्रेज ले गए। कोहिनूर सबसे पहले 12वीं शताब्दी में काकतीय साम्राज्य के पास था। जहां वारंगल के एक मंदिर में कोहिनूर हिंदू देवता की आंख के तौर पर मंदिर की शोभा बढ़ा रहा था। सबसे पहले वहां से अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति मालिक काफूर ने 1310 में इसे लूट लिया और खिलजी को भेंट कर दिया। इसके बाद इसने दिल्ली सल्तनत के विभिन्न राज्यों की शोभा बढ़ाई। बाबर ने 1526 में इब्राहिम लोधी से दिल्ली की सत्ता छीनने के साथ ही इसे भी छीन लिया। बाबर के बाद हुमायूं ने इसे ‘बाबर हीरे’ का नाम दिया। तब से कोहिनूर मुगल सल्तनत के पास बना रहा। मुगल सल्तनत के आखिरी दिनों में इसे ईरानी आक्रमणकारी नादिर शाह ने लूट लिया। जहां से उसे अफगानिस्तान का शासक अमहद शाह दुर्रानी अपने साथ ले गया। इसके बाद उसके उत्तराधिकारी शुजा शाह दुर्रानी ने अफगानिस्तान से भागकर लाहौर आने के बाद शरण मांगी और कोहिनूर को महाराजा रणजीत सिंह को भेंट कर दिया। कहा जाता है कि महाराजा रणजीत सिंह से छल करके अंग्रेज इसे इंग्लैंड ले गए। लेकिन दूसरी थ्योरी के मुताबिक बताया जाता है कि इसे महाराजा रणजीत सिंह की मौत के बाद उनके 13वर्षीय वारिस दिलीप सिंह ने अंग्रेजों को भेंट कर दिया और फिर इसे महारानी विक्टोरिया के ताज में जड़वा दिया गया और तब ये अंग्रेजों के पास है।
    वापस लाने की कोशिशः भारत ने इस मुद्दे को 1997 के ब्रिटिश महारानी एलिजाबेथ दवितीय के भारत दौरे के समय उठाया था। जिसमें कोहिनूर को भारत को लौटाने की मांग की गई थी। इस मुद्दे पर ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरून ने 2013 में कहा कि कोहिनूर को भारत को वापस नहीं किया जाएगा। कोहिनूर को भारत लाने की कई कोशिशें हो चुकी हैं। तमाम संगठन कोहिनूर को भारत लाने की मांग कर चुके हैं।

    दरिया-ए नूरः कोहिनूर के साथ ही दरिया-ए-नूर को नादिर शाह दिल्ली से ईरान ले गया था। मयूर सिंहासन और कोहिनूर के साथ ही ईरान गए दरिया-ए-नूर को भी पंजाब के महाराज रणजीत सिंह ने ईरान से अफगानिस्तान जाने के बाद हासिल कर लिया था। कहा जाता है कि अंग्रेजों की प्रदर्शनी के बाद इसे ढाका के नवाब ने खरीद लिया था। और ये वर्तमान समय में ढाका के सोनाली बैंक की तिजोरी में सुरक्षित रखा गया है। इसकी 1985 में एक प्रदर्शनी भी लगाई जा चुकी है। वहीं, दूसरे पक्ष का कहना है कि दरिया-ए-नूर दो भागों में था, जिसका दूसरा भाग नूर-अल-एन अब भी ईरान में सुरक्षित है।

    रीजेंटः द रीजेंट आंध्र प्रदेश के कोलार की खान से निकला। तब इसका वजन 410 कैरेट था, लेकिन वर्तमान समय में कई बार चमकाए जाने की वजह से इसका वजन अब 140 कैरेट है। मद्रास के तत्कालीन गवर्नर थॉमस पिट ने इसे एक व्यापारी से लेकर फ्रांस भेज दिया। जिसके बाद ये फ्रांस के शाही खजाने का हिस्सा बना। इसे फ्रांस के सम्राट लुई 14वें ने 1717 में फ्रांस के प्रतिनिधि रहे ऑर्लिंन के ड्यूक फिलिप द्वितीय से खरीदा था। इसके बाद फ्रांस के सम्राट बने लुई 15वें ने 1722 में इसे अपने ताज में जड़वा लिया। ये लुई 16वें के ताज का हिस्सा भी रहा। इस दौरान 1792 में फ्रांसीसी क्रांति के समय ये चोरी हो गया, लेकिन बाद में मिल गया। कई बड़े लोगों के पास से होता हुए ये 1801 में फ्रांस के महान नेपोलियन बोनापार्ट के पास पहुंचा। नेपोलियन ने इसे अपनी तलवार के मूठ में जड़वा कर हमेशा के लिए अपने पास रखा लिया, लेकिन नेपोलियन की हार के साथ ही उसकी दूसरी पत्नी इसे लेकर ऑस्ट्रिया चली गई। जहां से बाद में द रीजेंट फिर से फ्रांस लौटा और लुई 18वें, चार्ल्स 10वें और नेपोलियन तृतीय के ताज का हिस्सा बना और 1887 के बाद से इसे लूव्र म्यूजियम के हवाले कर दिया गया। वर्तमान में ये फ्रांस के सबसे बड़े लूव्र संग्रहालय, पेरिस में ही सुरक्षित है।

    ब्रोलिटी ऑफ इंडियाः गुमनाम भारतीय हीरों की लिस्ट में अगला नाम है ब्रोलिटी ऑफ इंडिया का। 90.8 कैरेट के ब्रोलिटी को कोहिनूर से भी पुराना बताया जाता है। 12वीं शताब्दी में भारत से किसी तरह फ्रांस की महारानी में इसे खरीदा। इस हीरे को पूरी दुनिया का सबसे शानदार हीरा बताया जाता है, क्योंकि रंगहीन होने की वजह से इसे शुद्धतम माना जाता है। इस हीरे को फ्रांस के कई शासकों किंग रिचर्ड जिन्हें शेरदिल भी कहा जाता है, का संरक्षण मिला। बाद में ये हीरा कई सालों तक दुनिया की नजरों से ओझल रहा और तीन शताब्दियों बाद किंग हेनरी द्वितीय के समय में सामने आया। उनके बाद इसे राजकुमारियों को सौंप दिया गया। कुछ समय बाद सम्राट ने कैथरीन नाम की रानी से पूरे गहने ले लिए, जिसमें ब्रोलिटी ऑफ इंडिया भी शामिल था। उसके बाद से ये हीरा दुनिया की चर्चाओं से एक बार फिर से ओझल हो गया। हालांकि 1910 में इसे फ्रांस के किसी व्यापारी ने अमेरिकन व्यापारी जॉर्ज ब्लूमेंथल को बेच दिया। जॉर्ज ब्लूमेंथल ने इसे अपनी पत्नी को भेंट कर दिया। इसके बाद कई सालों तक न्यूयॉर्क के व्यापारी हैरी विंस्टन ने इसे रखा और फिर 1950 में कनाडा के अरबपति व्यापारी को बेच दिया, जिसकी मौत तक ब्रोलिटी ऑफ इंडिया उसी के पास रहा। इसके बाद ब्रोलिटी ऑफ इंडिया की कई प्रदर्शनियां लगीं और लगभग 40 साल पहले किसी गुमनाम यूरोपीय परिवार ने इसे खरीद लिया। तब के बाद से इस हीरे की कोई खबर नहीं है।

    ओर्लोवः ओर्लोव का इतिहास अबतक के ज्ञात सभी बड़े हीरों में सबसे पुराना है और ये सबसे बड़ा भी है। ये हीरा अंडे के आधे आकार का है और दूसरी शताब्दी से श्रीरंगपट्टम (तमिलनाडु) में कावेरी नदी के किनारे बने श्री रंगानाथस्वामी मंदिर में भगवान विष्णु की मूर्ति में आंख के रूप में था। भगवान विष्णु की मूर्ति से इसे एक फ्रांसीसी सैनिक, जोकि कर्नाटक युद्ध के समय हिंदू बन गया था, ने निकाले जाने के बाद सालों तक सहेजकर रखा। इसे फ्रांसीसियों द्वारा 1750 के दौरान मद्रास लाया गया और अंग्रेजी सेना के किसी अफसर के हाथों बेच दिया गया। ये हीरा उसके बाद कई बार बिका और इंग्लैंड चला गया। इंग्लैंड से इस हीरे को ईरानी अरबपति शफरास ने खरीदा और फिर उसे ग्रिगोरी ग्रिगोरिविच ओर्लोव के हाथों 4 लाख डच मुद्रा में बेच दिया। बाद में ग्रिगोरी ओर्लोव ने इसे अपनी रूसी प्रेमिका कैथरीन को भेंट किया। कैथरीन ने बाद में रूस के महाराज पीटर तृतीय से शादी की, तब भी ओर्लोव को अपने पास रखा। हालांकि बाद में कैथरिन ने रूस के महाराज को ये गिफ्ट कर दिया। इसके बाद कैथरीन ने ही 1784 में इसे ओर्लोव डायमंड नाम दिया। फिलहाल इसे कई टुकड़ों में तराशकर चांदी का आवरण चढ़ाकर रखा गया है। वर्तमान में ये क्रेमलिन(मॉस्को) के डायमंड बैंक में सुरक्षित है और डायमंड बैंक की शान है।


    शाह डायमंडः शाह डायमंड 1450 के आसपास गोलकुंडा की मशहूर खान से निकला था। ये उत्पत्ति से रंगहीन है, लेकिन आयरन ऑक्साइड की वजह से इसका रंग हल्का पीला हो गया है। ये हीरा शुरू में 95 कैरेट का था, लेकिन तराशे जाने के बाद 88.7 कैरेट का रह गया है। ये विशुद्ध भारतीय शैली में तराशा गया है। शाह डायमंड मूल रूम से तिकोने आकार में है, जिसके तीनों ओर उन तीन शासकों के नाम लिखे हैं, जिनके शासनकाल में ये हीरा रहा। इसपर एक ओर अहमदनगर के निजाम का नाम निजाम शाह:1000 लिखा है, तो दूसरी ओर जहां शाह:1051 और तीसरी ओर फतेह अली शाह:1242 अंकित है। ये तारीखें हिजरी संवत के हिसाब से हैं, जिन्हें ईसा संवत में क्रमश: 1591, 1641 और 1826 समझा जा रहा है। ये भले ही दुनिया के बेहतरीन हीरों में से नहीं है, लेकिन अपने ऐतिहासिक स्वरूप की वजह से इसे बेहद खास माना जाता है। इस हीरे को अहमदनगर के निजाम से मुगल बादशाह अकबर ने हासिल किया। इसके बाद उनके पोते शाहजहां ने अपना नाम और समय (जहां शाह:1051) अंकित कराया। इसके बाद औरंगजेब ने इसे तरशवाया। ये एक पत्थर के स्वरूप में है, जिसे थ्रोन डायमंड के नाम से भी जाना जाता है। शाह डायमंड 1738 तक दिल्ली में मुगल बादशाहों के पास रहा, जिसे बाद में ईरानी आक्रमणकारी नादिर शाह इसे ईरान ले गया। वहां काफी समय बाद 1826 में ईरान के बादशाह फतेह अली शाह ने तीसरे कोने पर अपना नाम और समय (फतेह अली शाह:1242) अंकित कराया। ये कहानी यूं ही नहीं खत्म होती। दरअसल 1829 में रूसी राजनयिक की तेहरान में हत्या कर दी गई। जिसके बदले में रूसी जार ने ईरान को दंड देने का आदेश दिया। जार के आदेश से घबराए ईरानी राजा फतेह अली शाह ने अपने पोते खुसरो मिर्जा को शाह डायमंड के साथ सेंट पीट्सबर्ग भेजा, जिसने जार से मुलाकात की और शाह डायमंड को भेंट स्वरूप जार निकोलस को सौंप दिया। तब ये शाह डायमंड रूसी खजाने का हिस्सा बना और रूसी क्रांति के समय तक हिस्सा बना रहा। जहां से क्रांतिकारियों ने इसे क्रेमलिन डायमंड फंड को सौंप दिया और तब से ये वहीं पर है।

    आईडोल आईः आईडोल आई को अंग्रेजों ने तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध के दौरान नासिक के नजदीक त्रयंबकेश्वर शिव मंदिर से चुराया था। ये हीरा 1500 से 1817 तक भगवान शिव की आंख के रूप में मूर्ति में लगा था। जिसे ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों ने चुरा लिया था। युद्ध समाप्त होने के बाद अंग्रेजों ने पेशवा बाजीराव को हीरा लौटा दिया। जिसे अंग्रेज कर्नल जे ब्रिंग्स ने बाद में हासिल कर लिया। इसके बाद इस हीरे को लंदन भेज दिया दया। जहां से इसे 1818 में हीरों का व्यापार करने वाली ब्रिटिश कंपनी रुंदेल एंड ब्रिज ने खरीदा। इस कंपनी ने आईडोल आई को 1818 में फिर से तराशा और वेस्टमिंस्टर के राजकुमार रॉबर्ट ग्रॉसवेनर की पोशाक में लगा दिया। जहां से बाद में किसी अमेरिकी व्यापारी ने 1927 में इसे खरीद लिया और अमेरिका ले गया। तब से ये हीरा कई व्यापारियों के पास गया और फिलहाल ग्रीनविच के व्यापारी एडवर्ड जे हैंड के पास है। जिन्होंने आखिरी बार 1970 में इसे खरीदा था। इस हीरे का नाम नासाक डायमंड भी है, जिसके नाम पर ब्रिटिश एयरवेज कंपनी ने दिसंबर 1982 में खरीदे अपने एक हवाई जहाज का नाम ‘द नासाक डायमंड’रखा।


    ब्लू होपः द ब्लू होप भारतीय मूल के सर्वाधिक चर्चित हीरों में से एक है। इसे एक फ्रांसीसी व्यापारी 1650 ईस्वी के आसपास भारत से चुराकर फ्रांस ले गया था। वहां से फ्रांस के महाराजा लुई 14वें ने ये हीरा खरीद लिया। इसके बाद ये लुई 15वें, लुई 16वें के पास रहा। और फिर नेपोलियन के पास भी रहा। यहां से 1812 के आसपास ब्लू होप को अंग्रेज व्यापारी ने खरीद लिया। और कई हाथों से होता हुआ ये इंग्लैंड के राजा जॉर्ज चतुर्थ के पास पहुंचा। हालांकि आधिकारिक रूप से इसे ब्रिटिश राजशाही गहनों में जगह नहीं मिली। यहां से 1830 ईस्वी के आसपास ब्रिटिश बैंकर थॉमस होप ने इसे खरीदा और 1839 में प्रदर्शनी में जगह दी। यहां से सालों बाद कई व्यापारियों के हाथों से होता हुआ ब्लू होप 1905 के आसपास अमेरिका पहुंच गया। जहां इसके कई मालिक बने, लेकिन ये हीरा किसी के पास भी नहीं टिका। आखिर में इसे न्यूयॉर्क के स्मिथसोनियन म्यूजियम को दे दिया गया। जहां ये हीरा साल के 364 दिन लोगों के देखने के लिए रखा रहता है।


    मनहूस ओर्लोवः ये हीरा पुडुचेरी के मंदिर से चोरी हुआ और भगवान ब्रह्मा की मूर्ति से निकाला गया। इसे ब्रह्मा की तीसरी आंख के रूप में मूर्ति में लगाया गया था। यहां से इसे चोरों ने किसी तरह से यूरोप पहुंचा दिया और इसे कई लोगों ने अपने पास रखा, लेकिन लंबे समय तक कोई नहीं रख सका। क्योंकि इस हीरे को जो भी अपने पास रखता, उसकी अकाल मौत हो जाती थी। 1932 में जे डब्ल्यू पेरिस ने किसी अमेरिकी व्यक्ति से इसे खरीदा। लेकिन बाद में उन्होंने न्यूयॉर्क की एक बिल्डिंग से कूदकर आत्महत्या कर ली। इसके बाद में रूस की राजकुमारियों लिओनिला गैलिस्टाइन और नादिया वाइजिन ओर्लो ने इसे खरीदा। जिसके बाद इस हीरे का नाम ब्लैक ओर्लोव पड़ा। क्योंकि इस हीरे को रखने वाले की अकाल मौत होने की कहानी इसके साथ ही जुड़ गई थी। दोनों ने 1940 के दशक में ऊंची बिल्डिंग से कूदकर जान दे दी। इसके बाद इसे चार्ल्स एफ. विंसन ने खरीदा और 3 हिस्सों में कटवाकर तरशवाया, ताकि इसके साथ मौत के खेल को खत्म कर सकें। उन्होंने इसे 108 हीरों के गुच्छों के साथ हार में जड़वा दिया। बाद में इसे 2004 में अमेरिका से पेंसिलवेनिया के हीरा व्यापारी डेनिस पेट्मिजास ने खरीद लिया, और कई प्रदर्शनियों में शामिल किया।


    ग्रेट मुगलः भारत के सबसे बड़े हीरे की बात करें तो नाम आता है ग्रेट मुगल का। गोलकुंडा की खान से 1650 में जब यह हीरा निकला तो इसका वजन 787 कैरेट था। यानी कोहिनूर से करीब छह गुना भारी। कहा जाता है कि कोहिनूर भी ग्रेट मुगल का ही एक अंश है। इस हीरे को अमीर जुमला ने मुगल सम्राट शाहजहां को पारिवारिक संबंधों के चलते भेंट किया था। जिसके बाद ये मुगल सल्तनत का हिस्सा बना। कहा जाता है कि शाहजहां ने इसे तरशवाने में उस समय 10 हजार रुपये खर्च किए। जिसके बाद इसे 6 भागों में बांटा गया। इसे शाहजहां से पुत्र औरंगजेब ने 1665 में फ्रांस के जवाहरात के व्यापारी को दिखाया था, जिसने इसे अपने समय का सबसे बड़ा रोजकट हीरा बताया था। इस हीरे का इतिहास 1739 तक ही ज्ञात है। कहा जाता है कि इसे ईरानी आक्रमणकारी नादिर शाह कोहिनूर, दरिया-ए-नूर के साथ अपने साथ ईरान ले गया। कहते हैं कि इस हीरे को छिपाने के लिए इसके कई टुकड़े कर दिए गए। लेकिन फिलहाल ये हीरा कहां है, ये किसी को नहीं मालूम।
    देखें: विदेशी तिजोरियों में कैद भारत के 10 बेशकीमती हीरे!

    Tags: Kohinoor

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