• Home
  • »
  • News
  • »
  • nation
  • »
  • राइट ब्रदर्स का नहीं, भारत में बना था पहला प्लेन!

राइट ब्रदर्स का नहीं, भारत में बना था पहला प्लेन!

1864 में जन्मे शिवकर बापूजी ने जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स में पढ़ाई की। जिसके बाद वो यहीं पर पढ़ाने भी लगे। कहते हैं इस दौरान वो लगातार नई चीजों के बारे में सोचते रहते थे।

1864 में जन्मे शिवकर बापूजी ने जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स में पढ़ाई की। जिसके बाद वो यहीं पर पढ़ाने भी लगे। कहते हैं इस दौरान वो लगातार नई चीजों के बारे में सोचते रहते थे।

1864 में जन्मे शिवकर बापूजी ने जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स में पढ़ाई की। जिसके बाद वो यहीं पर पढ़ाने भी लगे। कहते हैं इस दौरान वो लगातार नई चीजों के बारे में सोचते रहते थे।

  • Share this:
    नई दिल्ली। अमेरिका के कैलिफोर्निया में 17 दिसंबर 1903 के दिन 12 सेकेंड में जो कुछ हुआ, उसने करवट लेती सदी के शुरुआती सालों में ही कई सदियों से संजोई उम्मीदों, आकांक्षाओं, ख्वाहिशों और सपनों को पंख दे दिए। पूरी दुनिया में राइट ब्रदर्स का डंका बज गया। आखिर इससे पहले दुनिया ने इंसान को इस तरह हवा में उड़ते नहीं देखा था।

    12 सेकेंड के कारनामे ने 120 फुट की उड़ान ने इतिहास रच दिया। लेकिन, क्या उस दिन कैलिफोर्निया की धरती या कहें आसमान में जो कुछ हुआ वो पहले हो चुका था? क्या 1903 से पहले ही उड़ चुका था विमान? क्या राइट ब्रदर्स से पहले ही कोई और शख्स कर चुका था विमान की ईजाद?

    कुछ दस्तावेजों पर यकीन करें तो राइट ब्रदर्स से ठीक 8 साल पहले, 1895 में मुंबई के चौपाटी बीच पर एक मशीन ने उड़ान भरी थी। वो भी पूरे 1500 फीट तक और जिस शख्स ने इस जादू से लगने वाले करतब को अंजाम दिया। उसका नाम इतिहास की कम ही किताबों में दर्ज है। वो शख्स थे शिवकर बापूजी तलपड़े।

    कहते हैं कि तलपड़े के इस शाहकार को देखने और उनकी हौसला अफजाई करने उस वक्त के दो बड़े नाम भी चौपाटी पहुंचे थे। कानून के महाज्ञाता जस्टिस महादेव गोविंद रानाडे और बड़ौदा के महाराजा सयाजी राव गायकवाड़ इतिहास को बनता देख रहे थे। कहा तो ये भी जाता है कि महाराजा सयाजी राव, तलपड़े से इतने प्रभावित थे कि लगातार उनकी आर्थिक मदद भी करते थे ताकि वो अपनी रिसर्च में लगे रहें और एक दिन देश का नाम ऊंचा करें।

    शिवकर बापूजी ने न गायकवाड़ को निराश किया और न ही उस मुल्क को, जिसकी मिट्टी और जिसके प्राचीन ग्रंथों से ही सीखकर वो इस रास्ते पर चले थे जो आसमान में खुलता था। आसमान में उड़ान भरने वाले अपने सपने को शिवकर बापूजी ने नाम दिया ‘मारुतसखा’ यानी हवा का दोस्त। वो हवा का दोस्त ही तो था जिसने हवा से ऐसी पक्की दोस्ती गांठी कि उसके डैनों पर सवार होकर 1500 फीट तक उड़ गया।

    समंदर के किनारे जितने लम्हे लिखे जाते हैं। लहरें हर लम्हे को मिटा जाती हैं, लेकिन 1895 में शिवकर बापूजी तलपड़े ने विमान उड़ाकर जो इतिहास रचा वो कुछ हिस्सों में आज भी जिंदा है। आज ये बहस फिर उठी है कि आखिर क्यों भारत उस महान वैज्ञानिक की विरासत को संजोने की कोशिश नहीं करता?

    हैरानी सिर्फ इस बात को लेकर नहीं है कि शिवकर बापूजी ने सैकड़ों लोगों की मौजूदगी में इतिहास रच दिया था। हैरानी इस बात को लेकर भी है कि कई मिनटों तक हवा में मंडराने वाले 'मारुतसखा' में वो बैठे ही नहीं थे। अपने सपनों की उड़ान को वो नीचे से ही नियंत्रित कर रहे थे। यानी, आप इसे दुनिया का पहला विमान ही नहीं पहला ड्रोन भी मान सकते हैं।

    तमाम दस्तावेजों की मानें तो ये पूरी घटना 'पुणे केसरी' नाम के अखबार ने छापी थी। आज तक ये साफ नहीं हो पाया है कि फ्यूल के तौर पर शिवकर बापूजी तलपड़े ने अपने विमान में क्या इस्तेमाल किया? लेकिन कुछ शोधकर्ता मानते हैं कि वो लिक्विड मर्करी थी जिसने उस मशीन को 1500 फीट की ऊंचाई तक पहुंचा दिया।

    कौन थे शिवकर बापूजी तलपड़े?
    शिवकर बापूजी तलपड़े मुंबई के मशहूर सर जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स के कला विभाग में तकनीकी शिक्षक थे। संस्कृत भाषा में उनकी गहरी रुचि थी और यही वजह थी कि वो अक्सर प्राचीन भारतीय शास्त्रों की तरफ भी मुड़ते रहे। इस दौरान उड़ते हुए पंछी हमेशा उनका ध्यान खींचते रहे।

    1864 में जन्मे शिवकर बापूजी ने जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स में पढ़ाई की। जिसके बाद वो यहीं पर पढ़ाने भी लगे। कहते हैं इस दौरान वो लगातार नई चीजों के बारे में सोचते रहते थे। उनके दिमाग में हमेशा विमान बनाने का इरादा उमड़ घुमड़ करता रहता। इसी दौरान तमाम शास्त्रों को परखने के बाद उनके हाथ आया महर्षि भारद्वाज का लिखा ‘वैमानिक शास्त्र’।

    भारद्वाज के ‘वैमानिक शास्त्र’ को दुनिया का पहला एयरक्राफ्ट मेन्युअल माना जाता है। जिसके सिद्धांतों के आधार पर एक नहीं कई तरह के विमानों की रचना की जा सकती है। ‘वैमानिक शास्त्र’ में विमान निर्माण से संबंधित 8 अध्याय हैं। इसमें 3 हजार श्लोक दर्ज हैं। 96 खंडों में विमान बनाने की प्रक्रिया मौजूद है। इसके अलावा पाइलट के लिए 32 तरह के सिस्टम की जानकारी होना जरूरी बताया है।

    माना जाता है कि महर्षि भारद्वाज के इसी वैमानिक शास्त्र से तलपड़े को वो जानकारी हासिल हुई जिसके बाद वो अपने दिमाग में उठती पहेलियों को सुलझाते हुए कागज पर विमान के डिजाइन को उतार सके। इसके बाद वो वक्त भी आया जब 1895 में ये डिजाइन कागज से निकलकर जमीन पर उतरा और उसके बाद हवा से बातें करते ‘मारुतसखा’ का निर्माण भी हो गया।

    हालांकि, शुरुआत में ये इतना आसान नहीं था। ऐसे हजारों लोग थे जिन्होंने तलपड़े का मजाक उड़ाया। लेकिन, हारना विजेताओं को कहां गवारा होता है इसीलिए तलपड़े भी अपने मिशन में लगे रहे और आखिरकार उसे अंजाम तक पहुंचाकर ही दम लिया। ‘मारुतसखा’ से जुड़े शोध में तलपड़े की पत्नी लक्ष्मीबाई भी उनकी सहयोगी रहीं। दोनों ने एक टीम की तरह काम किया और दुनिया का सबसे पहला विमान बनाने में कामयाबी हासिल की।

    पढ़ें Hindi News ऑनलाइन और देखें Live TV News18 हिंदी की वेबसाइट पर. जानिए देश-विदेश और अपने प्रदेश, बॉलीवुड, खेल जगत, बिज़नेस से जुड़ी News in Hindi.

    विज्ञापन
    विज्ञापन

    विज्ञापन

    टॉप स्टोरीज