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स्वाइन फ्लू से दहशत, टेमीफ्लू सिर्फ बड़े स्टोर्स पर!

स्वाइन फ्लू से दहशत, टेमीफ्लू सिर्फ बड़े स्टोर्स पर!

स्वाइन फ्लू यानि एच1एम1 इन्फ्लूएंजा के नाम पर बवाल जारी है। सरकार खासी चिंतित है, लोग परेशान हैं। संक्रमण की संभावना भर से ही लोगों में दहशत है।

स्वाइन फ्लू यानि एच1एम1 इन्फ्लूएंजा के नाम पर बवाल जारी है। सरकार खासी चिंतित है, लोग परेशान हैं। संक्रमण की संभावना भर से ही लोगों में दहशत है।

स्वाइन फ्लू यानि एच1एम1 इन्फ्लूएंजा के नाम पर बवाल जारी है। सरकार खासी चिंतित है, लोग परेशान हैं। संक्रमण की संभावना भर से ही लोगों में दहशत है।

    नई दिल्ली। स्वाइन फ्लू यानि एच1एम1 इन्फ्लूएंजा के नाम पर बवाल जारी है। सरकार खासी चिंतित है, लोग परेशान हैं। संक्रमण की संभावना भर से ही लोगों में दहशत है। राम मनोहर लोहिया जैसे बड़े सरकारी अस्पतालों में स्वाइन फ्लू की दवा टेमीफ्लू का स्टॉक खत्म हो चला है। लोग प्राइवेट अस्पतालों की ओर भागने को विवश हो रहे हैं। सरकारी नियमों की कड़ाई की वजह से छोटे स्टोर्स पर ये दवा मिल नहीं सकती और लोगों को बड़े अस्पताल के डॉक्टरों के सामने जेब खाली करनी पड़ती है। ये हालत सिर्फ राजधानी की नहीं है, बल्कि राजधानी से लगे शहरों की भी है। प्रशासन आंख मूंदे पड़ा है। प्राइवेट अस्पतालों में आम लोगों के लिए कोई जगह नहीं है।

    ऐसी परिस्थिति में लोग बचाव को ही बेहतर मान रहे हैं। लोगों ने भीड़ भाड़ वाली जगहों पर जाने से कतराना शुरू कर दिया है। वे मॉस्क लगाकर ही बाहर निकलने में बेहतरी समझ रहे हैं। बड़े अस्पतालों में स्वाइन फ्लू के लिए अलग वॉर्ड तो बनाए गए हैं, लेकिन वो व्यवस्था नहीं दिखती, जो प्राइवेट अस्पतालों में है। एम्स और सफदरजंग अस्पतालों की स्थिति की बात करें, तो यहां हर सुबह हजारों की भीड़ अपनी तमाम समस्याओं के साथ आती है। लोग मास्क लगाए देखे जा रहे हैं। मास्क के लिए वो जेब भी ढ़ीली कर रहे हैं, साथ ही दहशत भी है कि वो कहीं स्वाइन फ्लू की चपेट में न आ जाएं।

    डॉ राम मनोहर लोहिया अस्पताल में स्वाइन फ्लू का बेहतर तरीके से इलाज चल रहा था। हालांकि कुछ समय टेमीफ्लू की कमी की वजह से यहां मरीजों को खासी दिक्कतों को सामना करना पड़ा। यहां कई मौते हो चुकी हैं। बीच में तमाम रोगियों के परिजनों ने उन्हें अन्य अस्पतालों तक पहुंचाया।

    दिल्ली में लोगों को आरएमएल, एम्स, एलएनजेपी जैसे अस्पतालों के अलावा सिर्फ बड़े प्राइवेट अस्पतालों पर ही निर्भर रहना पड़ रहा है। लोगों को मजबूरन अपोलो, फोर्टिस, मैक्स जैसे प्राइवेट और महंगे अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है। लेकिन जो लोग आर्थिक रूप से मजबूत नहीं हैं, उन्हें सरकारी अस्पतालों का ही सहारा है। दिल्ली से सटे नोएडा की बात करें, तो सरकारी अस्पतालों का बुरा हाल है। प्राइवेट अस्पताल भी सीधे मरीजों को भर्ती नहीं कर रहे हैं।

    नोएडा में मेट्रो अस्पताल, कैलाश अस्पताल, मैक्स अस्पतालों में स्वाइन फ्लू से निपटने की पूरी तैयारियां हैं। यहां मरीज आ भी रहे हैं। हालांकि सूत्रों का कहना है कि बड़े अस्पताल आम लोगों के इलाज की जगह कॉर्पोरेट पॉर्टनर्स को दवाइयां पहुंचाने में ज्यादा दिलचस्पी ले रहे हैं। इसकी वजह भी है कि उनके कॉर्पोरेट पॉर्टनर्स उनके साथ रहें, और आवश्यकता से अधिक दवाइयां ज्यादा दामों में बिक भी जाएं।

    हालांकि छोटे स्टोर्स में टेमीफ्लू की बेहद कमी हैं। एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि एक सामान्य चिकित्सक मित्र ने बताया कि उनके पास इलाज के लिए आ रहे एक मरीज को उन्होंने कुछ टेस्ट लिख दिए और उस मरीज के परिजनों ने तत्काल एक प्राइवेट अस्पताल से संपर्क साधा। इस कॉर्पोरेट अस्पताल ने उन्हें पंद्रह दिन विशेष निगरानी में रखा और सारे टेस्ट करवा डाले अंत में बताया कि आपको स्वाइन फ्लू नहीं है। पर यह बताने के लिए उस कॉर्पोरेट अस्पताल ने उनके करीब साढ़े आठ लाख स्वाहा करवा दिए।

    पत्रकार महोदय का कहना है कि ऐसी बीमारी तो इन कॉर्पोरेट अस्पतालों का पूरा कायाकल्प कर डाल रही है। अब जाकर सरकार ने घोषणा की है कि स्वाइन फ्लू के टेस्ट की फीस तय कर दी गई है मात्र साढ़े चार हजार रुपए। यानी जुकाम का भी डॉक्टर अब टेस्ट कराया करेंगे और साढ़े चार हजार का तीस फीसदी तो लेंगे ही। भारत में इलाज कराना अब सामान्य मरीज के बस की बात नहीं। जुकाम की बीमारी भी जी का जंजाल बना करेंगी। भारत जैसे उष्ण कटिबंधीय जलवायु वाले देश में जुकाम कॉमन बीमारी है लेकिन लोकहितकारी सरकार ने जुकाम को राजरोग बना दिया।

    कुल मिलाकर समूचे दिल्ली-एनसीआर में स्वाइन फ्लू का कहर भले ही हो, लेकिन संभावना दिखते ही टेमीफ्लू दिए जाने की प्रवृत्ति से लोगों में खौफ है। आम आदमी मास्क लगाकर ही बाहर निकलने में बेहतरी समझ रहा है। हालत ये है कि मेट्रो या बसों में किसी को छींक आती है, तो लोग खुद ब खुद 2 फुट की दूरी बना लेते हैं। ऐसे में प्रशासन का ढ़ीला रवैया तमाम सवाल खड़े करता है।

    सवाल ऐसे, जिनका जवाब जरूरी है। लोग पूछते हैं कि क्या बेहतर इलाज का हक सिर्फ पैसे वालों को ही है? आखिर सरकारी अस्पतालों में बेहतर इलाज की व्यवस्था कब होगी? क्या कभी स्वास्थ्य सेवाओं में बराबरी की स्थिति बन जाएगी? या किसी भी गंभीर बीमारी के सामने आते ही उसके महामारी का रूप धरने की संभावना हमेशा बनी ही रहेगी, जैसे स्वाइन फ्लू 2009-10 और अब 2014-15 में महामारी का रूप ले चुकी है।

    Tags: AIIMS, Swine flu

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