चुनावी दंगल में BJP से 31 सीट पीछे रहे नीतीश के सामने अब सबसे बड़ा लीडरशिप टेस्ट

नीतीश कुमार के लिए ये कार्यकाल बड़ा लीडरशिप टेस्ट साबित होने वाला है. (तस्वीर नीतीश कुमार की फेसबुक वॉल से साभार)
नीतीश कुमार के लिए ये कार्यकाल बड़ा लीडरशिप टेस्ट साबित होने वाला है. (तस्वीर नीतीश कुमार की फेसबुक वॉल से साभार)

नीतीश (Nitish Kumar) अब भी सीएम हैं लेकिन गठबंधन में बीजेपी (BJP) कहीं ज्यादा मजबूत है. वहीं चिराग पासवान (Chirag Paswan) केंद्र में एनडीए का हिस्सा हैं. उन्होंने चुनाव के दौरान नीतीश कुमार पर जमकर निशाना साधा है. अब गठबंधन में एक छोटी पार्टी के मुखिया के तौर पर नीतीश कुमार का इस कार्यकाल में एक कठिन टेस्ट होना है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 17, 2020, 6:07 AM IST
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नई दिल्ली. नीतीश कुमार (Nitish Kumar) ने पहली बार तकरीबन 20 साल पहले बिहार के मुख्यमंत्री (Bihar CM) के तौर पर शपथ ली थी. तब उनकी सरकार मात्र सात दिनों तक चली थी. हालांकि उसके बाद साल 2005 में वो जब दूसरी बार सत्ता में आए तब से लगातार 'शासन की चाबी' उनके हाथों में रही है. अगर नीतीश कुमार अपना यह कार्यकाल भी पूरा करते हैं तो वो बिहार के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री (Longest Serving CM) बने रहने वाले नेता बन जाएंगे.

हालांकि राजनीतिक विश्लेषक यह भी कह रहे हैं कि नीतीश कुमार का यह कार्यकाल चुनौतीपूर्ण भी हो सकता. इस टर्म में उनकी लीडरशिप का सबसे बड़ा टेस्ट हो सकता है. क्योंकि जो जेडीयू बिहार में हमेशा बीजेपी के 'बड़े भाई' वाली हैसियत में रही वो इस बार सीटों के मामलें में कहीं पीछे छूट गई है. जेडीयू के पास बीजेपी से 31 सीटें कम आई हैं. इसके बावजूद बीजेपी ने अपनी बात पर कायम रहते हुए नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया है.

कैसे बनाए कोर वोटर, सत्ता पर रखी अपनी मजबूत पकड़
दरअसल 2005 में मुख्यमंत्री बनने के साथ ही नीतीश कुमार को यह बात समझ आ गई थी कि सिर्फ कुर्मी वोटबैंक के सहारे सत्ता में लंबे समय तक नहीं टिका जा सकता. यही वजह है कि उन्होंने महिलाओं/लड़कियों को लेकर कई तरह की सरकारी योजनाएं चलाईं जिनकी राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा हुई. इनमें फ्री साइकिल, फ्री यूनिफॉर्म और स्कॉलरशिप जैसी कई चीजें शुरू की गईं. महिलाओं को निकाय चुनावों में आरक्षण दिलवाया. यही वजह है कि साइलेंट वोटर कही जाने वाली महिलाओं को नीतीश कुमार का कोर वोटर माना जाता है. इस बार के चुनाव में नीतीश की 'राजनीतिक प्रतिष्ठा' बचाने में इस वोट बैंक की बड़ी भागीदारी मानी जा रही है.
इसके अलावा नीतीश कुमार ने अतिपिछड़ा और महादलित सेक्शन बनाकर उन्हें पंचायत और निकाय चुनावों में आरक्षण दिलवाया. यह समूह भी नीतीश कुमार का परंपरागत वोटर माना जाता रहा है.



इस बार बड़ी है चुनौती
2005 के चुनाव के बाद 2010 का चुनाव हो या फिर 2015, दोनों में ही जेडीयू का प्रदर्शन शानदार रहा. लेकिन इस बार के चुनाव प्रचार नीतीश कुमार के लिए शायद सबसे कठिन रहे. कोरोना काल में हुए इस चुनाव में लॉकडाउन के दौरान अप्रवासी मजदूरों की मुश्किलें बिल्कुल ताजा थीं. नीतीश कुमार को चुनाव के आखिरी चरण में यह तक कहना पड़ा कि यह उनका आखिरी चुनाव है.

माना जा रहा है कि उनकी इस अपील का भी बड़ा असर हुआ. लेकिन आखिरकार जब नतीजे आए तो जेडीयू के खाते में 43 तो बीजेपी के खाते में 73 सीट थी. एनडीए के पास पूर्ण बहुमत तो आया लेकिन जेडीयू का राजनीतिक कद गठबंधन में कमजोर हुआ. नीतीश अब भी सीएम हैं लेकिन गठबंधन में बीजेपी कहीं ज्यादा मजबूत है. वहीं चिराग पासवान केंद्र में एनडीए का हिस्सा हैं. चिराग पासवान ने चुनाव के दौरान नीतीश कुमार पर जमकर निशाना साधा है. अब गठबंधन में एक छोटी पार्टी के मुखिया के तौर पर नीतीश कुमार के इस कार्यकाल में एक कठिन टेस्ट होना है. हालांकि यह नीतीश कुमार ही हैं जो बीते सालों में तमाम बातों के बावजूद सीएम की कुर्सी अपने पास बरकरार रखने में कामयाब रहे हैं.

(सुहास मुंशी की स्टोरी से इनपुट्स के साथ.)
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