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त्रिपुरा में इन 34000 लोगों को कैसे मिली नई ज़िंदगी की उम्मीद?

अमित पांडेय | News18Hindi
Updated: January 26, 2020, 10:39 PM IST
त्रिपुरा में इन 34000 लोगों को कैसे मिली नई ज़िंदगी की उम्मीद?
23 साल पहले जातीय हिंसा की वजह से ब्रू रियांग समुदाय के 5000 परिवार जिनकी तादात उस वक्त 30000 थी वो मिजोरम से त्रिपुरा आए थे

न्यूज18 की टीम उन घरों में भी गई जहां पिछले 23 साल से ब्रू रियांग शरणार्थी ( (Bru Reang Community) रह रहे थे. एक कमरे में 10-15 लोगों का रहना उनके लिए आम बात है.

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  • Last Updated: January 26, 2020, 10:39 PM IST
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मिज़ोरम. त्रिपुरा राज्य का नार्थ कंचनपुर सब डिवीजन. ठीक इससे सटा है मिजोरम (Mizoram) का मामि इलाका. पिछले 15 दिनों से इस इलाके में सरकारी गाड़ियों की आवाजाही एकाएक बढ़ गई है. अधिकारी से लेकर मंत्री तक सब इस इलाके का दौरा कर चुके हैं, क्योंकि इसी जगह रह रहे ब्रू रियांग समुदाय (Bru Reang Community) के लोगों को एक ऐतिहासिक समझौते के बाद जिन्दगी जीने की नई उम्मीद मिली है. 23 साल पहले जातीय हिंसा की वजह से ब्रू रियांग समुदाय के 5000 परिवार जिनकी तादात उस वक्त 30000 थी वो मिजोरम से त्रिपुरा आए थे, लेकिन नए राज्य में कोई कानूनी कागजात न होने की वजह से यहां शरणार्थी बन गए और खानाबदोश की जिन्दगी जीने लगे. अब इस समझौते ने इन शरणार्थियों को त्रिपुरा के स्थायी नागरिक बनने का मौका दिया है. इन्हीं शरणार्थियों का जिक्र रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात कार्यक्रम में भी किया.

क्या है ब्रू रियांग समझौता?
16 जनवरी को गृहमंत्री अमित शाह की मौजूदगी में यह समझौता हुआ. ब्रू रियांग समझौता चार पक्षों के बीच की सहमति है. ये हैं मिजोरम, त्रिपुरा, केन्द्र सरकार और इस समुदाय के प्रतिनिधि. इस समझौते के बाद 1997 में जो 30000 ब्रू रियांग समुदाय के लोग त्रिपुरा आए थे और जिनकी तादाद अब करीब 34000 हो गई है उन्हें प्रशासन की मदद से त्रिपुरा के नार्थ कंचनपुर इलाके के शरणार्थी कैंप में स्थायी तौर पर बसाया जाएगा. इसके तहत प्रशासन इनको जमीन और वित्तीय मदद मुहैया करवाएगा. इन 34000 ब्रू रियांग शरणार्थियों के लिए केन्द्र सरकार ने 600 करोड़ रुपए का बजट भी बनाया है.

यहां ये लोग मुश्किल जिंदगी जी रहे हैं


न्यूज18 पहुंचा ब्रू रियांग शरणार्थी कैंप में
न्यूज़18 देश के उन चुनिंदा न्यूज चैनलों में से एक है जो इस कैंप में पहुंचा. यह शरणार्थी कैंप त्रिपुरा मिजोरम सीमा पर है. दिल्ली से करीब 2500 किलोमीटर का सफर तय करते हम इस दुर्गम इलाके में पहुंचे. इस शरणार्थी कैंप का इलाका शुरू होते ही अंदाजा हो जाता है कि यहां सिर्फ अस्थायी बसावट ही है. पहाड़ियों पर छोटी- छोटी लकड़ियों की झोपड़ी, उसमें से निकलते लोग जिनके हाथ में है पानी इकट्ठा करने के लिए खाली बर्तन, जो कि उनके लिए दिन की सबसे बड़ी चुनौती होती है. पास के झरने या कुएं से पानी निकालने के बाद फिर सरकारी राशन का कोटा उनके लिए पेट भरने की एकमात्र उम्मीद होता है..न्यूज18 की टीम उन घरों में भी गई जहां पिछले 23 साल से ब्रू रियांग शरणार्थी रह रहे थे. एक कमरे में 10-15 लोगों का रहना उनके लिए आम बात है.

जान बचाकर भागे थे हमइन्ही शरणार्थियों में से एक है दयाराम ने कहा 'मैं जब 9 साल का था तब अपने पिता के साथ मिजोरम से जान बचाकर, भागकर यहां आया. ये बात 1997 की है. पांच दिन लगे थे हमें मिजोरम से यहां तक पहुंचने में, हम तो जंगल में बस चलते ही जा रहे थे, क्या होगा हमारा, हम कहां जा रहे हैं ये किसी को नहीं पता था. खैर जैसे तैसे हम यहां पहुंचे. यहां स्थानीय लोगों से उस वक्त मानवता के आधार पर हमें मदद मिली. हम कच्चा घर बनाकर रहने लगे हमें यह नहीं पता था कि आगे हमारा क्या होग. 2010 में सरकार की घोषणा के बाद हमें कुछ उम्मीद की किरण तो नजर आए लेकिन बात वही की वही रह गई. अब जब यह समझौता हुआ है तो हमें उम्मीद है कि हमें नौकरी मिलेगी हमारा अपना घर होगा और कम से कम हमारे बच्चों को तो यह नहीं देखना पड़ेगा'. देवीलाल की तरह ही इस कैंप में 5000 परिवार ऐसे हैं जिनके अंदर यह उम्मीद की किरण जगी है.

1997 में ये सब यहां भाग कर आए थे


क्या है सरकार के इंतजाम इन ब्रू रियांग शरणार्थियों के लिए
पिछले 6 महीनों से सरकारी अधिकारियों का कंचनपुरा इलाके के 6 शरणार्थी कैंपों का दौरा लगातार जारी है. एक-एक परिवार के सदस्य से जानकारी ली जा रही है ताकि राशन कार्ड, आधार कार्ड और बैंक कार्ड की डिटेल में उनका नाम सही सही अंकित हो. दरसल सरकार और इन शरणार्थियों के प्रतिनिधियों के बीच एक समझौता हुआ है जिसके तहत हर परिवार को 40 फीट लंबा और 30 फीट चौड़ा आवासीय प्लॉट दिया जाएगा, 400000 का फिक्स डिपाजिट, 2 साल तक हर महीने ₹5000 और तय मात्रा में मुफ्त राशन. साथ ही डेढ़ लाख रुपए इनको दिया जाएगा अपना घर बनाने के लिए. इसके अलावा राज्य सरकार की और केंद्र सरकार की सारी कल्याणकारी योजनाएं तय कार्यक्रम के मुताबिक कैंपों में इन शरणार्थियों के लिए चलाई जाएंगी.

क्या कहती है सरकार
16 जनवरी को गृह मंत्री अमित शाह ने इसे देश का ऐतिहासिक समझौता करार दिया था. यही बात राज्य के मुख्यमंत्री बिप्लब देब भी कहते हैं. न्यूज़ 18 से खास बातचीत में उनका कहना है, 'मेरी जानकारी में तो ऐसा कभी नहीं आया कि 34000 लोगों को इस स्तर पर बसाने की कवायद की गई. केंद्र सरकार के मार्ग निर्देशन में राज्य सरकार प्रतिबद्ध है इन लोगों को तय कार्यक्रम के मुताबिक इस राज्य का स्थाई नागरिक बनाने के लिए.

अब जगी है नई जिंदगी की उम्मीद


क्या है चुनौतियां?
ब्रू रियांग शरणार्थी त्रिपुरा में जिस कंचनपुर सबडिवीजन के इलाके में बसे हैं वहां की आबादी है करीब एक लाख और अब इन 34000 लोगों को स्थायी नागरिकता देने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. ऐसे में स्कूल, अस्पताल, बिजली सार्वजनिक परिवहन और नौकरी के साधन मुहैया करवाना सरकार के लिए बड़ी चुनौती है. वजह यह है कि इस सबडिवीजन का मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर यहां की आबादी के हिसाब से है ऐसे में ब्रू रियांग समुदाय के लोगों को इन सुविधाओं की सख्त दरकार है.

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First published: January 26, 2020, 10:19 PM IST
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