रेड्डी-नायडू परिवार में 35 साल से चल रही है सियासी जंग, फिर भड़की चिंगारी

D P Satish | News18Hindi
Updated: September 11, 2019, 5:32 PM IST
रेड्डी-नायडू परिवार में 35 साल से चल रही है सियासी जंग, फिर भड़की चिंगारी
आंध्र प्रदेश की सियासत में जगन मोहन रेड्डी और चंद्रबाबू नायडू के बीच लंबे समय से जंग चल रही है, जिसके अभी थमने की कोई उम्‍मीद नहीं है.

जगन सरकार (Jagan Government) ने तेलुगु देसम पार्टी (TDP) कार्यकर्ताओं को गुंटूर (Guntur) के नजदीक अत्‍माकुर की ओर बढ़ने से रोका. इससे चुनावों में बुरी तरह हारी टीडीपी के कार्यकर्ताओं के मनोबल पर बुरा असर पड़ा है.

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बेंगलुरु. आंध्र प्रदेश (Andhra Pradesh)  में गुंटूर (Guntur) के नजदीक अत्‍माकुर की ओर बढ़ रहे टीडीपी कार्यकर्ताओं के मार्च के कारण नायडू और रेड्डी परिवारों (Naidu and Reddy Families) के बीच 35 साल से चली आ रही सियासी जंग की चिंगारी फिर भड़क गई है. आंध्र प्रदेश की जगन मोहन रेड्डी सरकार (Jagan Mohan Reddy Government) ने चंद्रबाबू नायडू (Chandrababu Naidu) की तेलुगु देसम पार्टी (TDP) के कार्यकर्ताओं को अत्‍माकुर की ओर बढ़ने से रोक दिया. पार्टी ने आरोप लगाया है कि इससे टीडीपी कार्यकर्ताओं के मनोबल पर बुरा असर पड़ा है. राज्‍य की जगन सरकार उसके कार्यकर्ताओं का मानसिक उत्‍पीड़न कर रही है. बताया जाता है कि चंद्रबाबू नायडू सरकार के दौर में टीडीपी कार्यकर्ताओं ने अत्‍माकुर के लोगों पर कथित तौर पर अत्‍याचार किए थे.

चुनावी हार के बाद गायब हुए लोकेश ने किया मार्च का नेतृत्‍व
चंद्रबाबू नायडू के बेटे एन. लोकेश (N. Lokesh) अपने पहले विधानसभा चुनाव (Maiden Assembly Election) में बहुत बुरी तरह हार गए थे. इसके बाद वह सार्वजनिक कार्यक्रमों और आम लोगों की नजरों से गायब ही हो गए थे. आश्‍चर्यजनक तरीके से उन्‍होंने लोगों के सामने आकर वाईएसआर कांग्रेस (YSRCP) के खिलाफ टीडीपी के मार्च का नेतृत्‍व किया. लोगों का कहना है कि रेड्डी-नायडू परिवारों की सियासी अदावत अभी कुछ साल और चलने की उम्‍मीद है. अत्‍माकुर मुद्दे कसे लेकर ये दोनों परिवार एक बार फिर आमने-सामने आ गए हैं.

वाईएसआर और चंद्रबाबू नायडू साथ पहुंचे थे आंध्र विधानसभा

बहुत कम लोगों को पता होगा कि डॉ. राजशेखर रेड्डी (Dr. Rajshekhar Reddy) और चंद्रबाबू नायडू 1978 में कांग्रेस (Congress) के टिकट पर एकसाथ आंध्र प्रदेश विधानसभा पहुंचे थे. दोनों तत्‍कालीन टी. अंजैया सरकार में जूनियर मिनस्टिर बनाया गया. दोनों के बीच बहुत अच्‍छे संबंध थे. चंद्रबाबू नायडू ने 1984 में अपने ससुर और तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री एनटी रामाराव (NT Rama Rao) की तेलुगु देसम पार्टी में शामिल होने के लिए कांग्रेस छोड़ दी. इसी समय वाईएसआर आंध्र प्रदेश कांग्रेस के सबसे युवा अध्‍यक्ष बनाए गए. इसे बाद आंध्र प्रदेश की सियासत में ये दोनों दोस्‍त सियासी दुश्‍मन बन गए.

डॉ. राजशेखर रेड्डी और चंद्रबाबू नायडू 1978 में कांग्रेस के टिकट पर एकसाथ आंध्र प्रदेश विधानसभा पहुंचे थे.


1999 तक दोनों के बीच तीखी नहीं हुई थी सियासी अदावत
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वाईएसआर के 1989 से 1999 तक सांसद बने रहने तक रेड्डी और नायडू परिवारों के बीच सियासी अदावत ज्‍यादा तीखी नहीं हुई थी. नायडू के दूसरी बार मुख्‍यमंत्री बनने पर 1999 में वाईएसआर विधानसभा में विपक्ष के नेता बने. नायडू उस समय केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्‍व वाली एनडीए सरकार (NDA Government) को अपने इशारों पर चला रहे थे. दूसरे शब्‍दों में कहा जाए तो उस समय उनकी सियासी ताकत बहुत बढ़ गई थी.

2004 के चुनावों में वाईएसआर ने चंद्रबाबू नायडू को दी करारी शिकस्‍त
आंध्र की राजनीति में कद्दावर नेता के तौर पर पहचाने वाले वाईएसआर ने अपने विश्‍वास को डगमगाने नहीं दिया था. उन्‍होंने 2004 के चुनावों में नायडू को जबरदस्‍त पटखनी दी. ये वाईएसआर और कांग्रेस के लिए बड़ी जीत थी. नायडू को इस सदमे से बाहर निकलने में कई महीने लग गए. इसके बाद दोनों के संबंधों में कड़वाहट आ गई. वाईएसआर 2009 में सत्‍ता पर दोबारा काबिज हो गए. उस दौरान काफी लोगों कहने लगे थे कि आंध्र प्रदेश में नायडू की सियासी जमीन दरक चुकी है. नायडू 2004 से 2009 के बीच करीबी-करीब हर दिन वाईएसआर और उनके बेटे जगनमोहन रेड्डी को भ्रष्‍ट व अपराधी बताकर हमला करते थे. वाईएसआर भी उन पर पलटवार करते रहते थे.

2014 में टीआरएस को तेलंगाना का गठन कराने में मिली सफलता
वाईएसआर के सितंबर 2009 में हेलीकॉप्‍टर दुर्घटना में निधन के बाद आंध्र प्रदेश के लोग अजीबो-गरीब हालात में फंस गए. राज्‍य में फैली अराजकता का फायदा उठाते हुए टीआरएस 2014 में राज्‍य को दो हिस्‍सों में बंटवाने में सफल हो गई. आंध्र प्रदेश के बंटवारे के बाद एक अलग राज्‍य तेलंगाना बना. पिता की मौत के बाद गुस्‍साए जगन ने अपनी अलग पार्टी बनाने के लिए कांग्रेस छोड़ दी. इसके बाद उन्‍होंने टीडीपी से सत्‍ता हासिल करने के लिए वाईएसआर कांग्रेस बनाई. उन्‍होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने उनके और वाईएसआर के समर्थकों के साथ धोखा किया.

2012 में नायडू ने जगन को निपटाने के लिए कांग्रेस की ली मदद
नायडू को जब महसूस हुआ कि वाईएसआर का बेटा उनके लिए बड़ी चुनौती बन सकता है तो उन्‍होंने 2012 में जगन को आय से अधिक संपत्ति के मामले में जेल भेजने के लिए नई दिल्‍ली में कांग्रेस आलाकमान की मदद ली. इसके बाद जगन ने हैदराबाद की जेल में नायडू से बदला लेने की कसम खाई. इसके बाद 2014 में हुए लोकसभा और विधानसभा चुनावों में नायडू ने राज्‍य की सत्‍ता में फिर वापसी की. इससे झटका खाए जगन को नायडू से बदले के लिए पांच साल और इंतजार करना पड़ा.

वाईएसआर कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव 2019 और विधानसभा चुनाव 2019 में शानदार सफलता हासिल की.


2019 के चुनावों में जगन मोहन रेड्डी ने  टीडीपी से छीन ली सत्‍ता
जगन ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्‍व वाली केंद्र सरकार से मजबूत संबंध बनाए. इसके बाद 2018 में नायडू के एनडीए को छोड़ने से वाईएसआर कांग्रेस को काफी मदद मिली. जगन ने नायडू और उनके बेटे लोकेश के खिलाफ जंग छेड़ दी. इसके बाद वाईएसआर कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव 2019 और विधानसभा चुनाव 2019 में शानदार सफलता हासिल की. सत्‍ता में आने के बाद नायडू ने पार्टी कार्यकर्ताओं से वादा किया कि उनकी सरकार नायडू सरकार के दौरान टीडीपी द्वारा उन पर किए गए अत्‍याचारों की जांच कराएगी.

निकट भविष्‍य में थमती नहीं दिख रही दोनों परिवारों की अदावत
जगन की इस घोषणा के बाद दोनों के बीच अब एक बार फिर सियासी प्रतिद्वंद्विता सतह पर आ गई है. 70 वर्षीय चंद्रबाबू नायडू ने पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा कि उनका बेटा लोकेश उनके हक की लड़ाई जारी रखेगा. उनके प्रतिद्वंद्वी अभी 46 साल के हैं, जबकि लोकेश अभी सिर्फ 36 साल के हैं. लिहाजा, निकट भविष्‍य में तो इन दोनों परिवारों के बीच सियासी लड़ाई थमने की कोई उम्‍मीद नजर नहीं आ रही है. दोनों दलों के कार्यकर्ताओं में उम्‍मीद है, लेकिन बड़ी तादाद में लोग कह रहे हैं कि लाकेश जगन के सामने कहीं नहीं ठहरते.

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First published: September 11, 2019, 4:39 PM IST
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