आपातकालीन दौर की कहानी, पत्रकार की जुबानी

श्रवण शुक्‍ला | News18India.com
Updated: October 15, 2015, 8:15 PM IST
आपातकालीन दौर की कहानी, पत्रकार की जुबानी
आपातकाल की 40वीं पर तमाम लोग उस दौर को याद कर रहे हैं। जब इंदिरा गांधी के एक इशारे पर पूरा देश थम गया था। आपातकाल के दौर में ‘पत्रकारिता’ से होना सबसे बड़ी गलती मानी जाती थी, और जमकर पत्रकारों का दमन होता था।

आपातकाल की 40वीं पर तमाम लोग उस दौर को याद कर रहे हैं। जब इंदिरा गांधी के एक इशारे पर पूरा देश थम गया था। आपातकाल के दौर में ‘पत्रकारिता’ से होना सबसे बड़ी गलती मानी जाती थी, और जमकर पत्रकारों का दमन होता था।

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नई दिल्ली। आपातकाल की 40वीं पर तमाम लोग उस दौर को याद कर रहे हैं। जब इंदिरा गांधी के एक इशारे पर पूरा देश थम गया था। आपातकाल के दौर में ‘पत्रकारिता’ से होना सबसे बड़ी गलती मानी जाती थी, और जमकर पत्रकारों का दमन होता था। उस 21 माह के दौर में शम्भूनाथ शुक्ल खुद अपना अखबार निकाला करते थे, पर बाद में जनसत्ता के संपादक पद से सेवानिवृत्त हुए।

शम्भूनाथ शुक्ल कहते हैं कि उस समय मैं कानपुर में हुआ करता था। हमारा नौजवान खून उबाल मारता था। पत्रकारिता से जुड़े थे, तो सामाजिक बदलाव और क्रांति का जिम्मा अपनी ही जिम्मेदारी समझते थे। हमनें संपूर्ण क्रांति और जेपी से लेकर मजदूरों के आंदोलन को खूब छापा। अखबार का नाम था ‘नया मोर्चा’। जो साप्ताहिक था। पर कानपुर में एक जाना माना नाम बन चुका था।

शम्भूनाथ शुक्ल बताते हैं कि आपातकाल का विरोध हमने भी किया था। तब हम एक अखबार निकालते थे 'नया मोर्चा' के नाम से। हम इस साप्ताहिक अखबार की 500 कापी छापते थे। लागत आती थी ढाई सौ रूपये। 8 आने प्रति कापी की दर से खुद ही साइकिल पर लाद कर बेच आते थे। खुद ही संपादक, खुद ही प्रकाशक और स्वयं का लिखा कंटेंट तथा हॉकर भी खुद ही। कानपुर में आईआईटी और मेडिकल कालेज के छात्र अपने रेगुलर ग्राहक थे।

आपातकाल लगते ही सभी पत्रकारों की जब धरपकड़ शुरु हुई, तो हमारे साथी भूमिगत हो गए। शम्भूनाथ शुक्ल अपने साथियों मोना, सुमन, दिनेश का नाम लेते हुए कहते हैं वो आपातकाल के दौर पर कहां रहे, उन्हें नहीं पता। पर जब आपातकाल का दौर खत्म हुआ, और नागरिक अधिकार खुले में अपनी सांसे लेने लगे। तब तक वो खुद विवाह बंधन में बंध चुके थे।

आपातकाल के दौर को याद करते हुए शम्भूनाथ शुक्ल बताते हैं कि उस समय पुलिस और नौकरशाहों के पास अथाह शक्ति थी। कोई छोटी सी बात पर भी विरोध कर दे, तो मीसा लगाकर अंदर कर दिया जाता था। हालांकि आम लोगों को इससे कोई मतलब नहीं था। कानपुर की ही बात करूं तो सबकुछ सामान्य था। तब राशन और चीनी सरकारी दुकानों पर मिलते थे। सभी दुकानें समय पर खुलने लगी। सरकार के डंडे की वजह से कालाबाजारी पर पूर्ण नियंत्रण लग गया। गुंडे-बदमाश सभी भूमिगत हो गए।

शम्भूनाथ कहते हैं कि मेरा घर यमुना किनारे पड़ता था। चंबल का इलाका भी ज्यादा दूर नहीं था। वहां आपातकाल से पहले डकैतों की तूती बोला करती थी। पर उस दौर में डाकुओं की भी बोलती बंद थी। अपराध मानों थम सा गया हो। दरअसल, आंतरिक आपातकाल दो ही वजहों से ज्यादा बदनाम हुआ। पहली वजह तो राजनीतिक थी। जब विपक्ष के सभी नेताओं को जेल में ठूंस दिया गया। सामाजिक कार्यकर्ताओं से बोलने की आजादी छिन गई। विरोध करने पर जेल भेजा गया। और दूसरी वजह थी नसबंदी। हालांकि मेरे सामने ऐसी कोई घटना नहीं हुई, पर एक-दो नौजवानों के बारे में सुना तो काफी दुख हुआ।

इतना सबकुछ होकर भी आम जनता खुश थी। या कहें कि शांत थी। इंदिरा गांधी को लगने लगा था कि देश उन्हें ही मसीहा मान चुका है। उन्हें लगता था कि जनता उनके साथ ही खड़ी रहेगी। क्योंकि सरकारी दमम के डर से सामाजिक अपराध पूरी तरह से थम से गए थे। दान-दहेज पूरी तरह से रुक गया था। 10 लोग बारात में जा सकते थे। कालाबाजारी करने वालों को जेल में भेज दिया गया। ऐसे में इंदिरा को लगा कि वो भारत में एक और सामाजिक क्रांति कर चुकी हैं। पर शायद वो गलत थी। और नतीजा चुनाव के बाद सामने भी आ गया।
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First published: June 25, 2015, 3:39 PM IST
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