JNU और DU के चुनावों को अलग बनाती हैं ये 5 बातें

जेएनयू और डीयू दिल्ली के दो छोर पर मौजूद हैं और पॉलिटिकल कल्चर, चुनाव कराने और लड़ने के तरीकों में भी ये दो छोर ही नज़र आते हैं.

Ankit Francis | News18Hindi
Updated: September 7, 2018, 2:01 PM IST
JNU और DU के चुनावों को अलग बनाती हैं ये 5 बातें
JNU और DU में क्या अलग है ?
Ankit Francis | News18Hindi
Updated: September 7, 2018, 2:01 PM IST
जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी (JNU) और दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) दोनों में ही स्टूडेंट यूनियन इलेक्शन की तैयारियां जारी हैं. JNU में 14 सितंबर को वोटिंग है जबकि DU में 12 सितंबर को वोटिंग होनी है. ये दोनों यूनिवर्सिटी दिल्ली के दो छोर पर मौजूद हैं और पॉलिटिकल कल्चर, चुनाव कराने और लड़ने के तरीकों में भी ये दो छोर ही नज़र आते हैं. डीयू में जहां एनएसयूआई और एबीवीपी का दबदबा रहता है वहीं जेएनयू छात्र राजनीति में अब भी लेफ्ट का सबसे मजबूत किला है. जानिए आखिर क्यों इतने अलग हैं ये दोनों चुनाव...

1. प्रेजिडेंशियल डिबेट
ये शब्द आपने अमेरिकी चुनावों के दौरान सबसे ज्यादा सुना होगा लेकिन जेएनयूएसयू इलेक्शन मतदान से दो दिन पहले रात भर कैंपस में आप इसका मज़ा भी ले सकते हैं. ये डिबेट काफी मशहूर है और इसे सुनने सिर्फ यूनिवर्सिटी के ही नहीं बाहर के भी काफी लोग पहुंचते हैं. इसमें सभी कैंडिडेट अपनी बात और मैनिफेस्टो छात्रों के सामने रखते हैं और बाद में सवाल जवाब का भी एक सत्र होता है. डीयू में ऐसा कोई कल्चर नहीं है हालांकि प्रचार के दौरान भाषण और सभाएं होती हैं.



जेएनयू की प्रेजिडेंशियल डिबेट कभी-कभी चुनावों का पूरा रुख भी बदल कर रख देती हैं. बता दें कि साल 2015-16 में कन्हैया कुमार जब चुनाव में खड़े हुए तो उनका संगठन AISF बाकी लेफ्ट संगठनों AISA और SFI के मुकाबले काफी कमज़ोर नज़र आ रहा था लेकिन प्रेजिडेंशियल डिबेट के भाषण ने सब बदल कर रख दिया. इस डिबेट में यूनिवर्सिटी और छात्रों से जुड़े मुद्दों के आलावा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के मुद्दों पर भी जमकर चर्चा होती है. इस साल 12 सितंबर की रात को प्रेजिडेंशियल डिबेट है.

2. जेएनयू में रात नहीं होती
हालांकि 9 फरवरी 2016 को जेएनयू में हुई घटना के बाद काफी कुछ बदल गया है और कैंपस में रात भर खुलने वाले ढाबे भी अब 11 बजे ही बंद हो जाते हैं लेकिन फिर भी इस कैंपस में रात होना मुमकिन नहीं. खासकर चुनाव के दौरान तो चहल-पहल और बढ़ जाती है. जेएनयू में ज्यादातर चुनाव प्रचार रात को होता है.
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यहां तक कि जेएनयू का नाइट कैंपेन काफी लोकप्रिय भी है. रात में हॉस्‍टल्स के मेस में सभाएं होती हैं और रणनीतियां भी बनाई जाती हैं. इसके उलट डीयू में अधिकांश चुनाव प्रचार कॉलेज टाइम में और दिन में होता है. रोजाना कैंपस और कॉलेजों में आने वाले छात्र चुनाव प्रचार की कमान संभालते हैं और छात्रों से संपर्क साधते हैं. किसी भी आम चुनाव की तर्ज पर यहां प्रचार होता है.

3. राजनैतिक पार्टियों का दखल
डीयू में चुनाव कांग्रेस बनाम बीजेपी की ही तर्ज पर होता रहा है. एनएसयूआई और एबीवीपी ही दो प्रमुख ताकत होती हैं जबी लेफ्ट ज्यादातर तीसरी ताकत की तरह सामने आती है. आम आदमी पार्टी के उदय के बाद CYSS भी एक संगठन के बतौर कैंपस में जगह बना रही है. डीयू में संरक्षण राजनीतिक पार्टियों के बड़े नेता हमेशा से ही प्रचार के लिए आते रहे हैं.



हालांकि जेएनयू में भी नेता आते रहे हैं और इस बार एनएसयूआई ने सलमान खुर्शीद, शशि थरूर और पी चिदंबरम को बुलाया था जबकि एबीवीपी ने असम के मुख्यमंत्री सर्बानन्द सोनोवाल, अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू और मणिपुर के मुख्यमंत्री श्री एन बिरेन सिंह को बुलाकर इसे नेशनल बनाने की कोशिश की. बहरहाल इस सब के बावजूद जेएनयू में जीत का पूरा दारोमदार प्रत्याशी के ही ऊपर रहता है और लेनिन या कन्हैया की जीत इस बात का सबूत भी है.

4. चुनावी मुद्दे
डीयू में स्टूडेंट इलेक्शन के मुद्दे पूरी तरह छात्र कैंपस, हॉस्‍टल और कॉलेज की समस्‍याओं के आस-पास ही होते हैं. यहां पार्टी के मेनिफेस्टो में भी पीने के पानी, हॉस्टल और परिवहन की सुविधाएं मुहैया कराने जैसे वादे किए जाते हैं. उधर जेएनयू में भाषणों, चुनाव प्रचार और प्रेजिडेंशियल डिबेट में भी राष्‍ट्रीय समस्‍याओं, अंतरराष्‍ट्रीय संबंधों, समाधानों, केंद्र और राज्‍य सरकार की नीतियों, विदेश नीतियों पर भी बहस की जाती है.



हालांकि ऐसा नहीं है कि जेएनयू में छात्रों के मुद्दे पर बात नहीं की जाती, यहां भी छात्रों के जुड़े मुद्दे जोर-शोर से उठाए जाते हैं. पिछड़े तबके और इलाकों से आने वाले छात्रों को एंट्रेस में डिप्राइवेशन पॉइंट दिलाने के आंदोलन छात्रसंघ की हो देन था जिसका गरीब-पिछड़े इलाकों से आने वाले छात्रों को काफी फायदा भी हुआ. जेएनयू में हॉस्‍टलर्स की प्रतिभागिता चुनावों में ज्‍यादा रहती है. चूंकि वहां ज्‍यादातर छात्र हॉस्‍टल में रहते हैं, लिहाजा कक्षाओं के अलावा हॉस्‍टल में भी छात्र संघ चुनाव के दौरान चुनावी माहौल रहता है. इसके उलट डीयू में डे-स्‍कॉलर्स ज्‍यादा हैं. ऐसे में चुनाव, प्रचार, अभियान की जिम्‍मेदारी से लेकर सहभागिता तक डे स्‍कॉलर्स ज्‍यादा होते हैं. उम्‍मीदवार भी ज्‍यादातर डे-स्‍कॉलर्स ही होते हैं.

5. प्रचार अभियान पर खर्च और तरीका
लिंगदोह कमेटी की सिफारिशें लागू हो जाने बावजूद भी डीयू में चुनाव प्रचार अभियान में जबरदस्‍त पैसे खर्च किए जाते हैं. चुनाव प्रचार में सेलिब्रिटी बुलाने से लेकर कंसर्ट कराने, रॉक बैंड बुलाने, फिल्‍में दिखाने, वाटर पार्क ले जाने की गतिविधियां भी होती हैं. छात्रों की पार्टियां चलती हैं. बैनर, पोस्‍टर और विज्ञापनों पर खर्च होता है.



दूसरी तरफ जेएनयू में बेहद शांत तरीके से चुनाव प्रचार होता है और बहस-चर्चाएं इसके केंद्र में रहती हैं. जेएनयू में प्रचार पोस्‍टर, बैनर, वन टू-वन बात करके और भाषणों के माध्‍यम से किया जाता है. इसमें डीयू की अपेक्षा पैसा कम खर्च होता है. डीयू में दिल्‍ली यूनिवर्सिटी स्‍टूडेंट्स यूनियन इलेक्‍शन के अध्‍यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव, सहसचिव और कोषाध्‍यक्ष के अलावा विभिन्‍न कॉलेजों के अलग-अलग पदाधिकारी होते हैं. जबकि जेएनयू में चार प्रमुख पदों के अलावा विभिन्‍न विषय विभाग प्रमुख चुना जाता है.
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