सवा सौ साल पुरानी पार्टी की जड़ता दूर करने में जुटे 50 साल के राहुल गांधी

सवा सौ साल पुरानी पार्टी की जड़ता दूर करने में जुटे 50 साल के राहुल गांधी
राहुल गांधी कांग्रेस की पंरंपरागत राजनीति को बदलना चाहते हैं.

Rahul Gandhi 50th Birth Anniversary: कांग्रेस (Congress) के ढांचे में बदलाव की सोच पुराने कांग्रेसियों के लिए तकलीफदेह थी. अन्य राजनीतिक दलों का नेतृत्व पीढ़ी दर पीढ़ी बदल रहा था. लेकिन कांग्रेस के प्रमुख पदों पर पुराने चेहरे ही जमे थे. राहुल गांधी (Rahul Ganghi) ने इसे बदलने की कोशिश की है.

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कांग्रेस (Congress) के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी (Rahul Gandhi) की सोच उन पुराने कांग्रेसियों को कभी पसंद नहीं आई जो कि एक कोटरी बनाकर पार्टी को संचालित करने में लगे हुए थे. राहुल गांधी कांग्रेस की पंरपरागत राजनीति को बदलना चाहते हैं. अपने ड्राइंग रूम में पुराने कांग्रेसी उनकी सोच को झोला छाप (एजीओ) सोच का नाम देते हैं. व्यवस्था में व्याप्त जन विरोधी सोच. इसी सोच से अरविंद केजरीवाल एक कामयाब नेता के तौर पर उभर कर आए. लेकिन, राहुल गांधी आज भी अपनी पार्टी के लोगों की सोच बदलने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

कांग्रेस में एक बड़ा वर्ग आज भी ऐसा है, जिसकी सोच राहुल गांधी के मन में समाई कांग्रेस की अवधारणा से मेल नहीं खाती है. कांग्रेस में सुधार की कोशिश करते राहुल गांधी ऐसे राजनीतिक परिवार से हैं, जो देश की राजनीति में बेहद महत्वपूर्ण है. उन्हें अपनी पहचान बनाने के लिए कुछ करने की आवश्यकता भी नहीं है. पिता स्वर्गीय राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री रहे. दादी स्वर्गीय इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री के साथ-साथ अपने समय की सबसे ताकतवर राजनेता भी रहीं.

राहुल गांधी की राजनीति को करीब से देखने वाले पत्रकार रशीद किदवई का मानना है कि उनकी इच्छा कभी किसी पद को पाने की नहीं रही है. विरासत में उन्हें जो मिला, वह कम नहीं है. शायद इसी कारण वो कांग्रेस की राजनीति में आतंरिक सुधार के लिए कदम उठाने का साहस कर पाए.




पुरानी सोच को बदलने की कवायद
कांग्रेस के ढांचे में बदलाव की सोच पुराने कांग्रेसियों के लिए तकलीफदेह थी. अन्य राजनीतिक दलों का नेतृत्व पीढ़ी दर पीढ़ी बदल रहा था. लेकिन कांग्रेस के प्रमुख पदों पर पुराने चेहरे ही जमे थे. कांग्रेस कार्यसमिति पर भी ऐसे लोगों का कब्जा उन्होंने देखा जो चुनाव नहीं जीत पाते थे. राहुल गांधी अपने साथियों से भी (जिन्हें राजनीतिक गलियारों में राहुल बिग्रेड के तौर पर जाना जाता है) यही अपेक्षा करते थे कि वे पद के बगैर राजनीति करें.

ज्योतिरादित्य सिंधिया, मिलिंद देवड़ा अथवा सचिन पायलट जैसे साथियों की नाराजगी भी इसी सोच के कारण बनी. उनके करीबी लगातार यह दबाव भी डालते रहते हैं कि कांग्रेस में भी सर्वोच्च स्तर पर नई युवा टीम को जगह मिलनी चाहिए. राहुल गांधी के लिए यह बदलाव करना आसान नहीं है. राहुल गांधी की इच्छा यदि प्रधानमंत्री बनने की होती तो शायद वो डॉ.मनमोहन सिंह को हटाकर बन भी सकते थे. लेकिन, वे केंद्र में मंत्री बनने को भी तैयार नहीं हुए.

जयपुर के भाषण से बेचैन हुए थे पुराने नेता
राहुल गांधी वर्ष 2013 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष बने थे. जयपुर अधिवेशन में उन्होंने कांग्रेस संगठन चलाने की अपनी सोच को जाहिर किया. राहुल गांधी ने अपने भाषण में साफ तौर पर कहा कि नेताओं को उनके प्रदर्शन के आधार पर जिम्मेदारी दी जाएगी. राहुल गांधी की मंशा है कि दो किस्म के लोग कांग्रेस पार्टी के शीर्ष पर रहें. पहले वो लोग जिन्हें जनता अपना वोट देकर सांसद अथवा विधायक चुनती है. दूसरे वे लोग जो विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ माने जाते हैं. वे टेक्नोक्रेट भी हो सकते हैं और ब्यूरोक्रेट भी.

rahul gandhi, rajnath singh

राहुल गांधी के ईद-गिर्द ऐसे लोगों को सक्रिय भी देखा गया. इनमें सैम पित्रोदा अथवा जयराम रमेश जैसे नाम उल्लेखनीय हैं. राहुल गांधी अक्सर ऐसे लोगों के साथ संवाद करते हुए भी दिखाई देते हैं. लॉकडाउन के दौरान उन्होंने रिजर्व बैंक के पूर्व गर्वनर रघुराम राजन और उद्योगपति राजीव बजाज से बात कर अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव को जाना.

बरकतउल्ला विश्विद्यालय भोपाल के अर्थशास्त्र विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष एचएस यादव कहते हैं कि राहुल गांधी को संपूर्णता में देखा जाना चाहिए. वो अकेले नहीं हैं. एक पार्टी हैं. उनके साथ अर्थशास्त्री भी हैं और तकनीकी विशेषज्ञ भी. यादव, राहुल गांधी को एक परिपक्व राजनेता के तौर पर देखते हैं.

कोरोना को लेकर फरवरी में माह में दी गई राहुल की चेतावनी सही निकली. संगठन में चुनाव के पक्षधर राहुल गांधी राहुल गांधी की गतिविधियों का पूर्व अनुमान लगाना आसान नहीं होता. संसद में जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास जाकर उनके गले मिले थे, उससे पूरा देश चौंक गया था.

राहुल गांधी ने जब से कांग्रेस संगठन को देखना शुरू किया तो वे यह जानकर हैरान हुए कि अधिकांश महत्वपूर्ण पद ऐसे नेताओं के पास हैं, जिनका अपना कोई जनाधार नहीं है. राहुल गांधी ने पूर्व चुनाव आयुक्त जे.एम. लिंगदोह और फेम संस्था के साथ मिलकर कांग्रेस में संगठनात्मक चुनाव की प्रक्रिया प्रारंभ की. इस कड़ा विरोध भी उन्हें पार्टी के भीतर झेलना पड़ा. लेकिन, वो इससे पीछे नहीं हटे.

छात्र संगठन और युवा संगठन में पदाधिकारी चुनाव के जरिए ही आते हैं. राहुल गांधी की इन संगठनों में चुनाव कराने की जिद से चिंतित कई कांग्रेसी नेताओं पर अपना राजनीतिक भविष्य बचाने के लिए फर्जी सदस्यता कराने के आरोप भी लगे. जिसके कारण राहुल गांधी का संगठन चुनाव कराने का उद्देश्य पूरी तरह सफल नहीं हो सका. राहुल गांधी का नया लुक भी लोगों को चौंका रहा है.

राजीव गांधी (फाइल फोटो)


पिता राजीव गांधी की सोच कुछ हद तक राहुल गांधी की कार्यशैली में दिखाई देती है. राजीव गांधी की इच्छा थी कि सरकार जो पैसा जनता के लिए भेजती है, वह पूरा उस तक पहुंचे. इस सोच को प्रदर्शित करने वाली राजीव गांधी की उन लाइनों का उल्लेख आज भी विरोधी करते हैं कि जनता के पास सौ में से सिर्फ पंद्रह पैसा पहुंचता है. विरोधी इसका उल्लेख नकारात्मक तौर करते हैं. लेकिन, राजीव गांधी की सोच व्यवस्था को ठेकेदारों और दलालों से मुक्त करने की थी. राहुल गांधी भी इसी सोच पर आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हैं.

राजनीति में अपराधीकरण रोकने के लिए डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार द्वारा जारी किए गए अध्यादेश को राहुल गांधी ने दिल्ली के प्रेस क्लब में फाड़ दिया था. राहुल गांधी के इस एक्शन की खूब आलोचना भी हुई. लेकिन, जिस कारण यह अध्यादेश उन्होंने फाड़ा था, उसके कारणों पर खुलकर चर्चा नहीं हुई. राहुल गांधी ने अध्यादेश फाड़कर यह संदेश तो दे दिया कि वो राजनीति में अपराधीकरण के पक्ष में नहीं हैं. लेकिन, जब उनकी पार्टी ने सुरेश कलमाड़ी और अशोक चाव्हाण जैसे लोगों को टिकट दिया तो उन्हें आलोचना का भी सामना करना पड़ा.

कांग्रेस के भीतर ही उनकी सोच स्वीकार नहीं हुई. राहुल गांधी कांग्रेस में नैतिक मूल्यों को भी बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं. कांग्रेस में इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभृमि भी रही है. लोकसभा चुनाव में जब कांग्रेस पार्टी बुरी तरह पराजित हो गई तो राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद छोड़ने में देरी नहीं की. वो चाहते थे कि जहां-जहां भी कांग्रेस को पराजय का सामना करना पड़ा है, जिम्मेदार वहां के पदाधिकारी हैं चाहे वे प्रदेशाध्यक्ष हो अथवा मुख्यमंत्री अपने-अपने पदों से त्यागपत्र दे दें. राहुल गांधी की इस सोच को कोई समर्थन कांग्रेस के भीतर नहीं मिला. उल्टा उन्हें इस्तीफा वापस लेने की सलाह दी गई, जिसे उन्होंने स्वीकार नहीं किया.



मुख्य विपक्षी नेता की भूमिका निभाते राहुल गांधी
वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक गिरिजा शंकर कहते हैं कि अकेले राहुल गांधी ऐसे नेता हैं, जो यह अहसास करते रहते हैं कि देश में कोई विपक्षी दल और उसका नेता भी है. जब तमाम नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व के आगे मौन धारण कर लिया हो तब देश में केवल राहुल गांधी ही आवाज उठाते दिखाई देते हैं. गिरिजा शंकर कहते हैं कि राहुल गांधी परंपरा से हटकर राजनीति करने की कोशिश कर रहे हैं. कई बार उनका कमजोर होमवर्क इसमें बाधा बन जाता है.

प्रोफेसर एचएस यादव कहते हैं कि राहुल गांधी की छवि योजनाबद्ध रूप से खराब की जा रही है. जबकि वो अपनी बात पूरी स्पष्टता से जनता के सामने रखते हैं. पिछले साल हुए लोकसभा चुनाव के बाद देश की विपक्षी राजनीति में नेतृत्व का अभाव देखा गया है. कई नेता उम्र के कारण घर बैठ गए तो कुछ व्यक्तिगत कारणों से विपक्ष की आवाज नहीं बनना चाहते. ऐसे में राहुल गांधी विपक्षी भूमिका के जरिए संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं. कोरोना के मामले में जब मोदी सरकार की आलोचना हुई तो राहुल गांधी खुलकर सरकार के साथ खड़े नजर आए. पुलवामा जैसे हादसों में भी राहुल गांधी का नजरिया सकारात्मक विपक्षी नेता का था.
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