लड़के नहीं बल्कि लड़कियों को गोद ले रहा है 'न्यू इंडिया'

महिला एंव बाल विकास मंत्रालय के आंकड़े कहते हैं कि भारत में लोग अब लड़कों से ज्यादा लड़कियों को गोद ले रहे हैं.

Ankit Francis | News18Hindi
Updated: February 12, 2019, 3:10 PM IST
लड़के नहीं बल्कि लड़कियों को गोद ले रहा है 'न्यू इंडिया'
(प्रतीकात्मक फोटो)
Ankit Francis | News18Hindi
Updated: February 12, 2019, 3:10 PM IST
भारतीय समाज में लड़कियों को लेकर कई तरह का भेदभाव मौजूद रहा है. आज़ादी के बाद से ही लड़कियों को गर्भ में ही न मार दिया जाए, उन्हें लड़कों की तरह पढ़ने की आज़ादी मिले और नाबालिग बच्चियों की शादी न करा दी जाए, इसके लिए कानून बने हैं, सरकारी योजनाएं लागू की गईं और जागरूकता अभियान भी चलाए गए. हालांकि 'न्यू इंडिया' में लड़कियों के साथ भेदभाव वाला ये ट्रेंड कुछ बदलता नज़र आ रहा है. महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के आंकड़े कहते हैं कि भारत में लोग अब लड़कों से ज्यादा लड़कियों को गोद ले रहे हैं.

क्या कहते हैं आंकड़े ?
भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की तरफ से जारी आंकड़ों की मानें तो 2015 से लेकर 2018 के बीच कुल 11,649 बच्चों को गोद लिया गया था. इनमें से 6,962 लड़कियां थी, जबकि लड़कों की संख्या 4,687 थीं. आंकड़ों से साफ़ है कि इन तीन सालों में गोद लिए गए बच्चों में से 60% से ज्यादा लड़कियां थीं.



गोद लेने से पहले होने वाले इंटरव्यू में बच्चा चुनने के सवाल के जवाब में भी ज़्यादातर मां-बाप ने लड़कियों को ही अपनी पहली पसंद बताया था. साल 2015-16 में कुल 3,011 बच्चों को गोद लिया गया, जिनमें 1,855 लड़कियां थीं. साल 2016-17 में 3,210 बच्चों को गोद लिया गया, जिनमें से 1,915 लड़कियां थीं. साल 2017-18 (दिसंबर 2018 तक) में 3,276 बच्चों को गोद लिया गया जिनमें से 1943 लड़कियां थीं.



विदेशों में ये आंकड़ा और भी ज्यादा
भारतीय बच्चों के विदेशों में होने वाले अडॉपशन के मामले में लड़कियों को गोद लेने का आंकड़ा और भी ज्यादा है. 2015 से लेकर 2018 के बीच कुल भारत से कुल 2,310 बच्चों को विदेशों में गोद लिया गया, जिनमें से 1,594 यानी करीब 69% लड़कियां थीं. सांसद तेज प्रताप सिंह यादव, एलआर शिवरामे और अनुज बाला के सवालों के जवाब में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने ये आंकड़ा 8 फरवरी को लोकसभा में बताया कि लड़कियों को गोद लेने में ज्यादा से ज्यादा रुचि ले रहे हैं, जो कि एक बेहद अच्छा लक्षण है.
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सेंट्रल अडॉपशन रिसोर्स अथोरिटी (CARA) की मेंबर प्राजक्ता कुलकर्णी का भी कहना है कि ये बेहद अच्छा लक्षण है कि समाज में अब लड़कियों को लेकर व्याप्त भेदभाव ख़त्म होने लगा है. हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि ऊपर-ऊपर से भले ही ये ऐसा दिख रहा हो कि लड़कियों को लेकर मानसिकता बदल रही है लें इस मामले में बारीकी से थोड़ी छानबीन और रिसर्च की भी ज़रुरत है कि ऐसा क्यों हो रहा है.

बच्चा गोद लेने के लिए क्या ज़रूरी है ?
गोद लेने वाले माता-पिता का शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से स्थिर होना जरूरी है. उनके लिए आर्थिक रूप से सक्षम होना जरूरी है. बच्चा गोद लेने के समय उन्हें कोई जानलेवा बीमारी नहीं होनी चाहिए. इसके अलावा गोद लेने से पहले शादीशुदा जोड़े के लिए जरूरी है कि उनकी शादी के कम से कम दो साल हो चुके हों. मतलब उन्होंने स्थाई वैवाहिक संबंधों के कम से कम दो साल पूरे कर लिए हों. गोद लेने से पहले माता-पिता दोनों की रजामंदी जरूरी है. यह विकल्प सिर्फ शादीशुदा जोड़ों तक सीमित नहीं है. सिंगल लोग भी, चाहे स्त्री हों या पुरुष, अगर चाहें तो बच्चे गोद ले सकते हैं. हालांकि एक अकेली महिला लड़का या लड़की गोद ले सकती है, लेकिन अकेला पुरुष किसी बच्ची को गोद नहीं ले सकता है.



गोद लेने वाले माता-पिता किसी भी धर्म के, अनिवासी भारतीय और यहां तक कि भारत के बाहर रहने वाले गैर-भारतीय भी हो सकते हैं. वे सभी जुवेनाइल जस्टिस एक्ट (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन), 2015 के तहत एक बच्चे को अपनाने के पात्र हैं. विकलांग भी अपनी अक्षमता की प्रकृति और सीमा पर विचार करते हुए बच्चा गोद लेने के पात्र हैं. गे या लेस्बियन जोड़े भी गोद ले सकते हैं, लेकिन सिंगल पेरेंट के रूप में, परिवार के रूप में नहीं.

अगर बच्चे की उम्र चार साल है, तो माता-पिता दोनों की उम्र का जोड़ 90 वर्ष होना चाहिए. एक शिशु, एक बच्चा या एक बड़ा बच्चा गोद लिया जा सकता है. लेकिन ऐसे में बच्चे की उम्र बढ़ने के साथ ही माता-पिता की उम्र का जोड़ भी बढ़ता जाएगा. बच्चे और गोद लेने वाले माता-पिता में से प्रत्येक की उम्र में न्यूनतम अंतर 25 साल से कम नहीं होना चाहिए. अगर बच्चा गोद लेने वाले की उम्र बहुत ज्यादा है, तो शिशु या छोटे बच्चे को पालना मुश्किल हो सकता है. ऐसे में एजेंसियां एक बड़े बच्चे को गोद लेने का सुझाव दे सकती हैं.
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