निर्भया कांड: 16 दिसंबर 2012 से 20 मार्च 2020 तक कानून की संकरी गलियों में न्‍याय की कहानी

निर्भया कांड: 16 दिसंबर 2012 से 20 मार्च 2020 तक कानून की संकरी गलियों में न्‍याय की कहानी
दिल्ली के गैंगरेप व हत्या मामले में निर्भया के चारों दोषियों को तिहाड़ जेल में आज सुबह 5.30 बजे एक साथ दी गई फांसी.

Nirbhaya Gang Rape Case: सामूहिक बलात्‍कार की घटना होने से लेकर दोषियों को फांसी पर लटकाए जाने तक देश ने कानून की बहुत सी बारीकियां और न्‍याय तक पहुंचने की तंग गलियों को देखा.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 20, 2020, 7:53 AM IST
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नई दिल्ली. पिछले एक दशक में देश के सबसे दुर्दांत और सबसे चर्चित सामूहिक बलात्‍कार और हत्‍या के मामले (Nirbhaya Gang Rape Case) में आखिरकार शुक्रवार को आखिरी फैसला अमल में आ गया. एक लड़की जिसके साथ चलती बस में चार लोगों ने बलात्कार किया था और उसके बाद उसकी दर्दनाक हत्‍या कर दी थी, आखिर उसके दोषियों को देश में उपलब्‍ध सबसे बड़ी सजा दे दी गई. सामूहिक बलात्‍कार की घटना होने से लेकर दोषियों को फांसी पर लटकाए जाने तक देश ने कानून की बहुत सी बारीकियां और न्‍याय तक पहुंचने की तंग गलियों को देखा.

अगर इस घटनाक्रम को पहले दिन से शुरू करें तो याद आएगा कि जब सबसे पहली बार लोगों को इस सामूहिक बलात्‍कार के बारे में पता चला तो देश में गुस्‍सा फैला. जैसे जैसे इस बलात्‍कार के ब्‍योरे और उसमें लड़की पर किया गया शारीरिक जुल्‍म सामने आया देश इस बर्बरता से सहर गया. जब लोग गुस्‍से में उबल रहे थे तब उस समय की सरकार और डॉक्‍टरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि किसी तरह लड़की के प्राण बचाए जाएं. उसे पहले दिल्‍ली के एम्‍स में और फिर सिंगापुर इलाज के लिए भेजा गया. लेकिन कुछ दिन की जंग के बाद आखिर उसने प्राण त्‍याग दिए.

इसके साथ ही पूरे देश में लगातार प्रदर्शन होने लगे. इन प्रदर्शनों ने इस बलात्‍कार काड को इंटरनेशननल खबर बना दिया. यही वह समय है जब दुनिया के अखबारों में दिल्‍ली को बलात्‍कार की राजधानी तक लिखा गया. यह वह दौर था जब दिल्‍ली को बलात्‍कार की राजधानी कहे जाने को लेकर देश में कोई विवाद नहीं हुआ. तब सबका ध्‍यान इसी बात पर रहा कि अगर अपराध हुआ है तो उसकी सजा मिलनी चाहिए. उसे अनावश्‍यक राष्‍ट्रवाद की दृष्टि से नहीं देखा गया.



कानून की दूसरी बारीकी हमने यह देखी कि जिस लड़की के साथ हुए जुल्‍म ने पूरी दुनिया को सिहरा दिया, उसका नाम आज तक कोई नहीं जान सका. हमारे देश के कानून में यह व्‍यवस्‍था है कि बलात्‍कार पीडि़त और उसके परिवार का नाम उजागर नहीं किया जाता. उस लड़की को मीडिया के एक वर्ग ने निर्भया नाम दिया और इस मामले को धीरे धीरे इसी नाम से जाना जाने लगा. यहां तक कि सरकार ने भी यौन उत्‍पीड़न का शिकार होने वाली लड़कियों के लिए जो राहत कोष बनाया उसका नाम भी निर्भया फंड रख दिया गया.
लेकिन यह मामला इतना चर्चित हुआ और लंबा खिंचा कि पीडि़ता के परिवार ने अपना नाम न छिपाना ही श्रेयस्‍कर समझा. इसलिए हमने देखा कि धीरे धीरे निर्भया की मां आशा देवी सार्वजनिक रूप से टीवी और अखबारों में दिखने लगीं. यह एक किस्‍म का अलग मामला था इसलिए कानून की जड़ व्‍याख्‍याओं से बाहर आकर निर्भया की मां को सार्व‍जनिक होना पड़ा.


अगर पाठकों को याद हो तो इसी बलात्‍कार कांड के बाद उपजे गुस्‍से ने देश के सामने भीड़ के कानून का डर पैदा किया. टेलीविजन चैनलों पर जिस तरह लोग बलात्‍कारियों के गुप्‍तांग काटने या उन्‍हें चौराहे पर सरेआम फांसी देने या उनकी मॉब लिंचिंग करने की मांग कर रहे थे, उससे लोगों में एक नई मानसिकता पनपी. इस घटना के बाद कई ऐसे मामले सामने आए जहां लोगों ने बलात्‍कार या छेडछाड़ के शक में संदिग्‍धों को पीट पीटकर मार डाला. यह कानून पर अविश्‍वास और भीड़ तंत्र की चाह की एक सामूहिक बानगी बना.

जब यह पता चला कि निर्भया बलात्‍कार का एक आरोपी नाबालिग है और उसे सजा नहीं दी जा सकती तो इस गुस्‍से ने देश के कानून में बदलाव कराया. हालांकि वह आरोपी तो छूट गया लेकिन इस तरह के क्रूर अपराधों के लिए 16 साल के किशोरों को भी दंड देने की व्‍यवस्‍था भारतीय कानून में कर दी गई. भीड़ के दबाव में इस बात की ज्‍यादा परवाह नहीं की गई कि इस कानून को बनाने से अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर भारत की न्‍यायप्रियता की छवि पर कैसा असर पड़ेगा. क्‍योंकि गुस्‍सा कैसा भी हो लेकिन उससे यह बात नहीं पलट जाती कि दुनिया लगातार राज्‍य की ओर से दिए जाने वाले दंड को कम से कम बर्बर और अमानवीय बनने की दिशा में आगे बढ़ रही है.

एक जमाना तो वह भी था जब लोगों को बड़े अपराधों में सलीब पर टांग का जिंदा जला दिया जाता था, और भीड़ जलते हुए अपराधी की चीखों का तमाशा देखती थी. लेकिन धीरे धीरे न्‍याय सुधारकों को यह समझ में आया कि अपराध के लिए अपराधी को सजा दी जानी है, न कि उसके साथ वैसी हरकत की जानी है जिसमें राज्‍य का व्‍यवहार भी अपराधी जैसा हो जाए.


इसके बाद कानून की लंबी प्रक्रिया चली. निचली अदालत से लेकर सु्प्रीम कोर्ट तक हर अदालत में आरोपियों पर दोष सिद्ध होता गया और उनकी फांसी की सजा बरकरार रही. उसके बाद राष्‍ट्रपति को दी गई दया की अर्जी भी खारिज हो गई. लेकिन इसके बाद भी फांसी में लंबा समय लगा. चारों दोषी कभी सुप्रीम कोर्ट में, कभी दुबारा राष्‍ट्रपति के पास तो कभी निचली अदालत किसी न किसी नुक्‍ते को लेकर अपील करते रहे और हर बार उनकी अपील सुनी गई. जब अपीलों की यह भील भुलैया लंबी होने लगी और फांसी की मुकर्रर तारीख कई बार टाली गई तो एक बार फिर पीडि़ता के परिवार का दुख और गुस्‍सा बढ़ने लगा.

पीडि़ता के परिवार में फांसी में देरी को अपने साथ अन्‍याय बताया. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दोषियों के भी मानवाधिकार हैं. जिसका जीवन राज्‍य का दंडशास्‍त्र लेने वाला है, उसे अपना जीवन बचाने का हर प्रयास करने की छूट है. इसलिए फांसी में कोई जल्‍दबाजी नहीं हुई. सारे कानूनी विकल्‍पों के पूरी तरह समाप्‍त होने के बाद ही दोषी फांसी के तख्‍ते तक ले जाए गए.


जाहिर है कि 16 दिसंबर 2012 को जब निर्भया बलात्‍कार की घटना पहली बार पता चली थी तो उसका ब्‍योरा सुनकर बहुत दुख और गुस्‍सा आया ही था. लेकिन आज आठ साल बाद जब सुबह सुबह फांसी चढ़ने की खबर सुन रहे हैं तब भी कोई बहुत खुशी नहीं हो रही है. न्‍याय हम सब चाहते हैं लेकिन सारी सच्‍चाई जाने के बाद किसी के प्राण हरण करने की सूचना अंतत: खुशी तो नहीं देती है. क्‍योंकि आठ साल के लंबे समय में वह गुस्‍सा और बदले की भावना ठीक वैसे ही नहीं रह जाते. इसीलिए तो कानून की देवी की आंखों पर पट्टी बांधी गई है. वह हर्ष विषाद से दूर रहकर सिर्फ इंसाफ सुनाती है.

हालांकि कहने वाले यह भी कहते हैं कि इंसाफ के तराजू पर जाने कैसे साधन संपन्‍न लोग थोड़ी रियायत पा जाते हैं, जबकि आर्थिक सामाजिक रूप से कमजोर अपराधी को ऐसी मुरवत्‍त नहीं मिल पाती. इसीलिए दुनिया के बहुत देश फांसी की सजा को खत्‍म ही कर चुके हैं. शायद भारत में भी यह किसी दिन खत्‍म हो जाए, लेकिन जब तक यह सजा है, कम से कम ऐसे अपराधों में तो वह दी ही जाएगी

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