धार्मिक मामलों में संविधान का कितना होगा दखल? सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की बेंच करेगी तय

धार्मिक मामलों में संविधान का कितना होगा दखल? सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की बेंच करेगी तय
महिलाओं के मंदिर या मस्जिद में जाने की अनुमति सुप्रीमकोर्ट करेगा तय

महिलाओं के मंदिर या मस्जिद में जाने की अनुमति, दाऊदी बोहरा औरतों का खतना और पारसी महिलाओं के फायर टेंपल में जाने की अनुमति - ये वह सारे पेचीदा मसले है जिन पर अब सुप्रीम कोर्ट विचार करेगा.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 13, 2020, 3:19 PM IST
  • Share this:
सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की बेंच ने सोमवार को इस मामले की सुनवाई शुरू की कि धार्मिक मामलों में संविधान का कितना होगा दखल होगा. नौ जजों की बेंच का गठन बहुत कम मामलों में होता है. ऐसा तभी किया जाता है जब कोई जटिल संवैधानिक मसले पर फैसला देना हो और इस पर कोई कानून मौजूद नहीं हो. तब सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच संविधान का व्याख्यान करती है. ऐसे फैसलों का दूरगामी असर होता है और उसका इस्तेमाल कई जटिल मामलों को सुलझाने के लिए किया जाता है.

मौजूदा मामले में सुप्रीम कोर्ट को तय करना है कि धर्म और संविधान का दायरा क्या है, इनकी लक्ष्मणरेखा क्या है और दोनों एक दूसरे में किस हद तक हस्तक्षेप कर सकते है. एक तरफ जहां आज के समाज में संविधान सर्वोपरि है. वहीं हमारा संविधान धार्मिक आजादी की भी सुरक्षा देता है. ऐसे में दोनों में समन्वय कैसे बनेगा.

मूल में है शिरूर मठ मामला
सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की बेंच ने 1951 में एक ऐतिहासिक फैसला दिया था. मामला था उडुपी जिले के शिरूर मठ के संचालन का. सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि सरकार द्वारा नियुक्त कमिश्नर को अधिकार होगा कि वह मठ से जुड़े पैसे और संचालन में दखल दे. ऐसा मठ के बेहतर संचालन और भ्रष्टाचार पर नजर रखने के लिए किया गया.
इस मामले में कोर्ट ने धर्म से जुड़े संस्थान को दो हिस्सों में बांट दिया. एक जो सीधे धर्म से जुड़ी मान्यता और तौर तरीके. दूसरा उस संस्थान का संचालन. कोर्ट ने कहा कि सरकार धर्म के अभिन्न अंग में हस्तक्षेप नहीं कर सकती लेकिन पैसे के लेनदेन और संचालन में सरकार का दखल हो सकता है. यहां कोर्ट ने धार्मिक संस्थान को दो हिस्सों में बांट दिया. इस फैसले को आज तक चुनौती नहीं दी गई. इसका असर धार्मिक संस्थान से जुड़े कई मामलों में पड़ा.



अब सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों का बेंच उस सात जजों के बेंच के आदेश पर विचार करेगा. सुप्रीम कोर्ट ये देखेगा की धार्मिक संस्थान के मामलों में भारत के संविधान का कितना दखल होगा.

भारत का संविधान हर नागरिक को समानता का अधिकार देता है. यानी किसी धर्म या लिंग या किसी और वजह से भेद भाव नहीं किया जा सकता. वही संविधान धर्म की आज़ादी देता है जिस में कहा गया है कि सरकार किसी के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगी.

तो सवाल ये है कि अगर किसी मंदिर या मस्जिद को एक धार्मिक संस्थान संचालित कर रहा है और उनकी मान्यता के अनुसार वहां किसी महिला का प्रवेश नहीं हो सकता तो क्या सरकार उसमें हस्तक्षेप कर सकती है. यहां धार्मिक संस्था की आज़ादी का मान रखा जाएगा या फिर महिला की समानता का अधिकार सर्वोपरि होगा.

अब सुप्रीम कोर्ट ऐसे मामलों के लिए विस्तार से आदेश देगा. फिलहाल सुप्रीम कोर्ट तीन मामलों को मुख्य बिंदु की तरह लेगा. इसमें मंदिर या मस्जिद में महिलाओं का प्रवेश, दाऊदी बोहरा औरतों का खतना और पारसी महिलाओं का फायर टेंपल में प्रवेश.

सुप्रीम कोर्ट में कई मामले लंबित है जिसमें मांग कि गई है कि महिलाओं को मस्जिद और हर मंदिर में जाने की अनुमति दी जाए. एक याचिका में बोहरा महिलाओं के खतने पर रोक लगाने की मांग की गई है. पारसी महिलाएं जो अपने धर्म से बाहर शादी कर लेती हैं उन्हें फायर टेंपल में जाने की आज़ादी नहीं है. इस प्रथा को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला कई अन्य मामलों को भी सुलझाने में मदद करेगा. हालाकि फिलहाल कोर्ट ने बहु विवाह और हलाला जैसे मामलों पर विचार करने से मना कर दिया है.

कोर्ट ने आज आदेश दिया कि इस मामले से जुड़े सभी वकील तीन हफ्तों में आपस में बातचीत कर बताएं की इस पर किस तरह से बहस की जाएगी.

ये भी पढें : सबरीमाला विवाद के लिए सीजेआई बोबडे ने क्‍यों बनाई 9 जजों की संविधान पीठ
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज

corona virus btn
corona virus btn
Loading