साड़ी खतरे में कब थी जो आप उसे बचाने निकल पड़े

साड़ी कॉरसेट जैसा सख्‍त, तीखा परिधान कभी नहीं था. यह तो छह मीटर लंबा एक कपड़ा था, जिसे स्त्रियों ने तरह-तरह से लपेटकर अपनी देह को सजाया. साड़ी में हमेशा से एक किस्‍म की सरलता थी, एक लय थी, एक प्रवाह था.

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: July 18, 2019, 1:59 PM IST
साड़ी खतरे में कब थी जो आप उसे बचाने निकल पड़े
फोटो स्रोत: डिजाइनर आयुष केजरीवाल के इंस्‍टाग्राम वॉल से साभार
Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: July 18, 2019, 1:59 PM IST
इंगमार बर्गमैन की फिल्‍म ‘क्राइज एंड व्हिसपर्स’ देखते हुए पहली बार उस पोशाक की हकीकत समझ में आई, जो विक्‍टोरियन समय की कहानी वाली ब्रिटिश और यूरोपियन फिल्‍मों में औरतें पहना करती थी और जिस पर मैं जी-जान से फिदा थी. बर्गमैन को हर वो चीज पर्दे पर दिखाने से परहेज नहीं था, जो जीवन में होती थी. न देह, न कपड़े. उस फिल्‍म की नायिका सिर से लेकर पांव तक ढंकी हुई है. हाथों तक में दस्‍ताने हैं और चेहरे पर जालीदार नकाब. छातियों और कमर को कसकर बांधे हुए वो कपड़ा कमर के नीचे एक ऐसा घेरा बनाता है कि वो अपने चारों ओर पांच फीट जगह घेरती चलती है. जैसे जापानी छाते में पर्दा टांककर उसे कमरे में उल्‍टे बांध दिया गया हो. रेशम की डिजाइनदार लेसों से सजाई गई वो सफेद पोशाक सुंदर तो बहुत लगती थी. पहले मुझे लगता था कि वो गाउन जैसा कुछ है, जिसके नीचे सिर्फ ब्रा पहनकर उसे सिर से घुसा लिया गया है, जैसे हम नाइटी पहनते हैं. तब कौन जानता था कि ये कपड़ा पहनना और उतारना किसी अकेले के बस की बात नहीं.

नायिका ने जब कपड़े उतारने शुरू किए तो समझ में आया कि उसका एक हड्डी का शरीर कपड़े की कितनी सख्‍त और तंग पर्तों में दबा हुआ था. ब्रा के जैसा एक तंग ब्‍लाउज, उस पर एक छोटी शमीज, फिर एक लंबा फ्रॉक जैसा कपड़ा, पैरों में कमर तक के लेस वाले स्‍टॉकिंग्‍स, उस पर पेटीकोट जैसा एक कपड़ा और सबसे आखिर में वो लेसों वाला लहीम-शहीम गाउन, जिसके फीते ऐसे कस-कसकर बांधे जाते, जैसे हम दौड़ने से पहले जूते के फीते बांधते हैं. लड़की सांस रोके खड़ी होती और पीछे से एक औरत उसे इतना खींचती कि छातियां दबकर सपाट लगने लगतीं. फीते कमर तक बंधे होते. पेट इतना दबा हुआ, मानो अंतडि़यों से चिपका दिया गया हो. उस पोशाक को कॉरसेट कहते थे.

उस जमाने की फिल्‍मों में किसी को बाथरूम जाते नहीं दिखाया गया, लेकिन उस पोशाक को देखकर मन में पहला सवाल यही आता था कि इस लड़की को अगर अचानक हाजत आ गई तो वो क्‍या करेगी.
18वीं सदी के मध्‍य तक तकरीबन पूरे यूरोप में पहनी जाती रही महिलाओं की इस पोशाक को यूरोपीय नवजागरण और खासतौर पर नारीवाद के उदय ने कुछ ज्‍यादा इज्‍जत नहीं बख्‍शी. 19वीं सदी की शुरुआत यूरोप में फेमिनिस्‍ट मूवमेंट की भी शुरुआत थी. अब कॉरसेट और कमर को माचिस की तीली जैसा दिखाने वाले एंपायर सिलवेट (Empire silhouette) की जगह घुटने तक की स्‍कर्ट और ढीले-ढाले टॉप ने ले ली थी. ये वही समय था, जब अमेरिका की एक कंपनी ने पहली बार औरतों के लिए ब्रा बनाई और वो बहुत तेजी से पॉपुलर भी हुई.

18वीं सदी की स्त्रियां ऐसे कॉरसेट पहना करती थीं
18वीं सदी की स्त्रियां ऐसे कॉरसेट पहना करती थीं


अब पूरे यूरोप में आपको कॉरसेट सिर्फ इतिहास की किताबों, पीरियड फिल्‍मों, आर्ट गैलरियों और संग्रहालयों में ही देखने को मिलेगा. कोई औरत कॉरसेट तो क्‍या, उसका कोई लाइटर वर्जन भी नहीं पहनती.

क्‍या न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स औरतों के कपड़ों के इतिहास को इसी चश्‍मे से देख रहा था, जब उसे ये इलहाम हुआ कि भारत में दक्षिणपंथियों के सत्‍ता में आने के साथ साड़ी एक बार फिर चलन में आ गई है. इंडियन फैशन इंडस्‍ट्री पर राइट विंग सरकार का दबाव है कि हमारी पारंपरिक पोशाक साड़ी को बढ़ावा दिया जाए. मानो 21वीं सदी के हिंदुस्‍तान में कॉरसेट की तरह साड़ी भी अब सिर्फ संग्रहालयों में पाई जा रही थी. सिर्फ इतिहास की किताबों और पीरियड फिल्‍मों में ही देखने को मिलती थी. ये तो सच था कि जीवन के हर मर्ज की दवा इतिहास में खोजने वाले राइट विंग ने संस्‍कृत, गौमूत्र और गोबर के पुनरुद्धार का बीड़ा उठा रखा था, लेकिन अब तक हमें नहीं पता था कि इस सूची में साड़ी भी शामिल है.
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न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स ने साड़ी को इतिहास क्‍या बताया, ट्विटर साड़ी पहने हुए औरतों की तस्‍वीरों से पट गया है. और ये वो औरतें नहीं हैं, जो पैर में आलता लगाती हैं, सावन सोमवार का व्रत रखती हैं और ससुर जी को देखते ही पट से साड़ी के अंचरे से मुंह ढंक लेती हैं. ये वो औरतें हैं, जिनकी जिंदगी यूरोप के फेमिनिस्‍ट मूवमेंट पर लिखी गई किताबों ने बदली है. जो मर्दों की तरह नौकरी करती हैं और संपत्ति की मालिक हैं. लेकिन साड़ी उनके लिए यूरोप के स्‍कर्ट और स्‍पेगिटी की तरह ही रोजमर्रा का पहनावा है.

फोटो स्रोत: डिजाइनर आयुष केजरीवाल के इंस्‍टाग्राम वॉल से साभार
फोटो स्रोत: डिजाइनर आयुष केजरीवाल के इंस्‍टाग्राम वॉल से साभार


सच तो ये है कि भारत में साड़ी कभी इतिहास हुई ही नहीं. मैंने जब से होश संभाला है, अपनी मां और आसपास की सभी औरतों को हमेशा साड़ी में ही देखा. वो ऐसा कपड़ा था, जिसका आंचल पकड़कर हम लटका करते, मां के खुले पेट से मुंह सटाकर हवा निकालते और गड़गड़ की आवाज करते. शलवार-कुर्ता या नाइटी पहनने वाली मांओं के बच्‍चों को मां के खुले पेट पर मुंह से बाजा बजाने का ये सुख हासिल नहीं. मां की साड़ी बचपन में हमारे सपनों की पोशाक थी. हम अपनी फ्रॉक फेंककर मां की साड़ी पहनने की जिद करते. और मां किसी पुरानी सूती साड़ी को फाड़कर हमारे लिए छोटी साड़ी बना देती, जिसे पहनकर बचपन में कभी हम टीचर, तो कभी डॉक्‍टर बना करते.

मैंने मां या मौसी को कभी ऐसे आईने के सामने खड़े होकर, पंखा बंद करके, सामने चार सेफ्टी पिन सजा के, बड़े करीने और नजाकत से उसे कमर में खोंसते, प्‍लीट बनाते आधे घंटे तक साड़ी पहनते नहीं देखा. वो तो एक मिनट में गोल-गोल घुमाकर साड़ी खोंस लेतीं. उन्‍हें उतना ही वक्‍त लगता, जितने मुझे नाइटी पहनने में लगेगा. उनके लिए साड़ी वैसे ही थी, जैसे जिमनास्‍ट के लिए ऊंची कूद. बाएं हाथ का खेल. उस पारंपरिक परिवेश में पैदा हुई लड़कियों ने बाद में भले ही घरवालों के खिलाफ बगावत का बिगुल बजा रखा हो या जींस पहनने के लिए घर में लड़ाई की हो और पहला मौका पाते ही सबसे पहले जींस पहनी हो, लेकिन साड़ी उनकी जिंदगियों से कभी नदारद नहीं हुई. वो उनकी अवचेतन की स्‍मृतियों में थी और मौका पाते ही जिंदगी में आ गई. साड़ी का नाम उन चीजों की लिस्‍ट में भी कहीं नहीं था, जिसे जिंदगी से रिजेक्‍ट किया जाना था.

हिंदुस्‍तान में साड़ी का इतिहास इतना पुराना है कि इसके शुरुआती निशान सिंधु घाटी सभ्‍यता तक में मिलते हैं. साड़ी बेसिकली थी क्‍या, 5-6 मीटर का एक लंबा कपड़ा, जिसका इस्‍तेमाल औरतें अनेक तरीकों से अपनी देह ढंकने के लिए करती थीं. वक्‍त के साथ साड़ी का रूप बदलता रहा है. साड़ी के साथ ब्‍लाउज और पेटीकोट का चलन 19वीं सदी के बाद की देन है. हिंदुस्‍तान के अलग-अलग हिस्‍सों में बीसियों अलग तरीकों से साड़ी पहनने का चलन है.

फोटो स्रोत: डिजाइनर आयुष केजरीवाल के इंस्‍टाग्राम वॉल से साभार
फोटो स्रोत: डिजाइनर आयुष केजरीवाल के इंस्‍टाग्राम वॉल से साभार


वेस्‍टर्न कपड़ों ने जब पूरी दुनिया में अपनी जगह बनाई तो भारत भी उससे अछूता नहीं रहा. लेकिन ऐसा नहीं है कि वेस्‍टर्न कपड़ों के आते ही हमने उसे सिर-माथे पर बिठा लिया था. 60-70 की दशक की फिल्‍मों में कॉलेज और ऑफिस जा रही हिरोइन भी साड़ी पहने नजर आती थी. स्‍कर्ट पहनने वाली लड़की या ऑफिस की सेक्रटरी होती या वैंप कैरेक्‍टर. और वो भी अकसर क्रिश्चिन होती थी, फिल्‍म की नायिका नहीं. उस जमाने में मुहल्‍ले में गाउन पहनकर दरवाजे पर खड़ी होने वाली औरतों से साड़ी वाली औरतें डाह करतीं और कहतीं, “वो तो बड़ी एडवांस हैं.” 80 का दशक आते-आते हिंदुस्‍तानी घरों में बेटियां भले साड़ी से शलवार-कुर्ते पर शिफ्ट हो गई हों, लेकिन बहू के लिए दुनिया अभी बहुत नहीं बदली थी. तकरीबन एक और दशक बाद जब बहुओं के साड़ी से शलवार-कुर्ते पर शिफ्ट होने की बारी आई तो सासों ने इसे अपनी गौरव कथा की तरह पेश किया, “भई हमारे यहां तो बहुएं शलवार-कुर्ता पहनती हैं, सिर पर पल्‍ला रखने की भी जरूरत नहीं.”

अब वक्‍त बदल गया है. अब कपड़ों का चरित्र के साथ ऐसा डायरेक्‍ट कनेक्‍शन नहीं रहा. अब साड़ी से लेकर बिकनी तक सब हिरोइन ने ही पहन रखे हैं और इससे संस्‍कारों पर आंच भी नहीं आ रही. साड़ी अब भी मौजूद है, बस उसकी सूरत बदल गई है. फुल आस्‍तीन के बंद गले वाले ब्‍लाउज की जगह ऐसे ब्‍लाउज ने ले ली है, जो लगता है मानो ब्‍लाउज नहीं, ब्रा ही हो. अब हिरोइन या तो बर्फीली वादियों में शरीर को छिपाने और दिखाने का खेल खेलने, कमर और पीठ के सेक्‍सी उतार-चढ़ाव दर्शाने के लिए साड़ी पहनती है या फिर शादी के मंडप में. वो साड़ी पहनकर ऑफिस नहीं जा रही और न ही डेट पर.

फोटो स्रोत: डिजाइनर आयुष केजरीवाल के इंस्‍टाग्राम वॉल से साभार
फोटो स्रोत: डिजाइनर आयुष केजरीवाल के इंस्‍टाग्राम वॉल से साभार


साड़ी पहनकर डेट पर जाने वाली लड़कियां तो आसपास भी नहीं ही हैं, लेकिन आसपास ऐसी बहुत सी लड़कियां हैं जिनकी वार्डरोब में टंगी साडि़यों का हर चौथे-पांचवे दिन नंबर आ ही जाता है. जो साड़ी के साथ इतनी सहज हैं कि उनके लिए दफ्तर जाने से पहले साड़ी पहनना कोई सालाना आयोजन नहीं है. न ही वो ऐसी अदाएं दिखाती फिरती हैं कि साड़ी पहनकर तो मुझसे काम ही नहीं होता, कि सारा ध्‍यान साड़ी में ही लगा रहता है. हिरोइन ने भले लाल साड़ी के साथ लाल रंग की ब्रा पहन रखी हो, असल में इन लड़कियों ने उस मां के जमाने के तंग ब्‍लाउज को भी अलविदा कह दिया है. अब ब्‍लाउज एक ऐसा थोड़ा ढीला, ढंका और आरामदायक कपड़ा है, जिससे होकर आसानी से सांस आती-जाती है. वो पीठ और कमर के दर्शनार्थ नहीं है. साड़ी में देह ढंकी है, फिर भी वो बहुत सेक्‍सी है क्‍योंकि हमारा मानना है कि जो मजा छिपाने में है, वो दिखाने में नहीं.

2000 साल पुराना यह भारतीय परिधान साड़ी कॉरसेट नहीं है. यह इतिहास में कभी विलुप्‍त नहीं हुआ. ये कॉरसेट जैसा आफती, सख्‍त, तीखा परिधान कभी था भी नहीं. यह तो छह मीटर लंबा एक कपड़ा था, जिसे स्त्रियों ने तरह-तरह से लपेटकर अपनी देह को सजाया. साड़ी में हमेशा से एक किस्‍म की सरलता थी, एक लय थी, एक प्रवाह था. उसे पहनकर देह संगीत सरीखी हो जाती. देह पर फिसलता हुआ एक ढीला हवादार कपड़ा. हवा में उड़ता पल्‍लू. जिस सिम्‍त मुड़ती हो हवा, उसी सिम्‍त मुड़ता, उड़ जाता. हवा से बातें करता साड़ी का आंचल. वो गाना भी है न- “आंचल न छोड़े मेरा, पागल हुई है पवन.” और कौन परिधान है ऐसा, जो पगलाई पवन के साथ खुद भी पगलाए. जींस तो कैसी तीखी, कठोर, बदन से चिपकी हुई. जैसे गुस्‍से में ऐंठी हुई हो. जींस पहनकर देह भी गुस्‍साई-गुस्‍साई सी हो जाती है. साड़ी पहनकर ऐसे पसर जाती है, जैसे तट पर पसरा नदी का पानी. उसी में फिसलती, बलखाती. ऐसी अदाएं किसी और पोशाक में कहां.

हजार नए कपड़े आए-गए, साड़ी जहां थी वहीं है. वो वहां पेड़ की सबसे ऊंची डाल पर हवा में इतरा रही है, किसी गड्ढे में नहीं दबी पड़ी कि परंपराओं को बचाने निकली सेना खोदकर निकालेगी.

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First published: July 18, 2019, 1:55 PM IST
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